अपने फौजी पिता का सपना पूरा करने के लिए बेटे ने गोद ले लीं 364 बेटियां

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लोसल (राजस्थान) के मोहनराम जाखड़ अपने दिवंगत फौजी पिता के सपनों को अंजाम तक पहुंचाने के लिए इस समय 364 गरीब बेटियां गोद लेकर अपने खर्च पर उनकी पढ़ाई-लिखाई करा रहे हैं। उनमें नेत्रहीन बेटियां भी हैं। वह 1100 बेटियों को 'पॉलीथिन मुक्त भारत' और 'बेटी पढ़ाओ' अभियान की शपथ भी दिला चुके हैं।


लोसल (राजस्थान) में  फौजी-पुत्र की मदद से पढ़ रहीं बेटियां

लोसल (राजस्थान) में फौजी-पुत्र की मदद से पढ़ रहीं बेटियां



सीमा पर देश की सीमा सुरक्षा करने वाले प्रहरियों में एक दिवंगत मांगूराम जाखड़ रिटायर होकर भी जाते-जाते अपने बेटे मोहनराम के कंधों पर ऐसी जिम्मेदारी डाल गए, जो देश की बेटियों के काम आए। इस तरह वह देश सेवा का नया पाठ पढ़ा गए। पिता का वह सपना आज मोहनराम सच साबित करने में जुटे हुए हैं।


उनके पिता तो अपनी बेटियों की अच्छी पढ़ाई की ख्वाहिश पूरी किए बिना ही दुनिया से चले गए लेकन नई पीढ़ी के लिए प्रेरक मोहनराम गरीबी के कारण पढ़ाई पूरी नहीं कर पाईं 364 बेटियों को गोद लेकर एक ट्रस्ट के माध्यम से पढ़ा-लिखा रहे हैं। नमें से 10 बेटियां तो सरकारी सेवाओं में डॉक्टर, कांस्टेबल, पंचायत सहायक, एएनएम, एलडीसी आदि बन चुकी हैं। पिता के सपने अंजाम तक पहुंचाने वाली ऐसी ही संतानें मिसाल बन जाती हैं।


पिछले साल अक्टूबर में मोहनराम ने 1100 बेटियों को एक साथ कन्याभोज कराया। इस अवसर पर बेटियों को पॉलीथिन मुक्त भारत और बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान की सफलता की शपथ दिलाई गई। इतना ही नहीं, यहां हर साल रक्षा बंधन पर गोद ली गईं मुस्लिम बेटियां पुलिस के जवानों को राखी बांध कर महिला सुरक्षा का वचन लेती हैं।


सीकर (राजस्थान) के लोसल निवासी मोहनराम जाखड़ बताते हैं कि उनके पिता मांगूराम जाखड़ वर्ष 1989 में नायब सूबेदार पद से सेना से रिटायर हो गए थे। घर-गृहस्थी की गाड़ी पार लगाने के लिए वह सन् 1997 में बंशीवाला महिला महाविद्यालय में गार्ड की नौकरी करने लगे। उन दिनों उन्होंने देखा कि स्कूल की तमाम बेटियां तो फीस जमा न कर पाने से बीच में ही बढ़ाई छोड़ दे रही हैं।


एक दिन अचानक उनके मन में आइडिया आया कि क्यों न वह ऐसी बेटियों की पढ़ाई के लिए खुद अपने स्तर से कोई ऐसा इंतजाम करें कि ऐसी लड़कियों का भी भविष्य देश की सीमा की तरह सुरक्षित हो सके। फिर क्या था, उन्होंने घर-परिवार में इस पर राय-मशविरा करने के बाद वर्ष 2014 में 'राज दुरुस्त शिक्षा' (आरडीएसएनजीओ) नाम से एक ट्रस्ट का गठन किया। शुरुआत में जिला शिक्षा अधिकारी देवलता चांदवानी की मौजूदगी में ट्रस्ट ने गरीब 11 बेटियों को गोद लिया। इनकी पढ़ाई का खर्चा नायक सूबेदार मांगूराम अपनी पेंशन और चौकीदारी से मिलने वाले पैसों से उठाते रहे।


मोहनराम बताते हैं कि वर्ष 2017 में उनके पिता का देहावसान हो गया। अब ट्रस्ट के माध्यम से गरीब बेटियों की पढ़ाई की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई। इस समय 'राज दुरुस्त शिक्षा' ट्रस्ट के सहयोग से गोद ली हुईं 364 बेटियों की पढ़ाई चल रही है। ट्रस्ट के सहयोग से पढ़ाई पूरी कर चुकीं 10 बेटियों को सरकारी नौकरियां मिल चुकी हैं।


संतोष घाटवा में एएनएम हैं तो राजपुरा निवासी रवीना दिल्ली में कांस्टेबल की नौकरी कर रही हैं। दो साल पहले आरडीएस एनजीओ (लोसल) द्वारा गोद ली गई बेटी सरिता कुमावत का एथलीट में राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में चयन हो गया था। उसने सीकर में हुई प्रतियोगिता में पहला स्थान प्राप्त कर संस्थान का नाम रोशन किया।


इसी तरह गोद ली हुई ममता भाटी को चैन्नई में ऑपरेशन कराकर आंखों की रोशनी संभव हुई।


मोहनराम कहते हैं,

"गरीब परिवार में बेटी होना पाप नहीं है। भाग्यशाली हैं वे माता-पिता, जिन्होंने बेटियों को जन्म दिया है। वह नेत्रहीन बेटियों को भी गोद लेकर उनकी पढ़ाई-लिखाई देखभाल कर रहे हैं।"

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