Success Story: सिक्योरिटी गार्ड से सॉफ्टवेयर इंजीनियर तक, Zoho के अब्दुल अलीम की कहानी
Zoho के अब्दुल अलीम की कहानी बताती है कि अगर जज़्बा सच्चा हो, तो कोई भी शुरुआत छोटी नहीं होती. 1000 रुपये से सफर शुरू करने वाले अलीम ने सिक्योरिटी गार्ड से सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनने तक की प्रेरक यात्रा तय की, साबित करते हुए कि हुनर डिग्री से बड़ा है.
कभी-कभी ज़िंदगी हमें वहीं ले जाती है जहां से हम अपनी असली मंज़िल शुरू करते हैं, बस शर्त यह है कि हम रुकें नहीं. यह कहानी है अब्दुल अलीम (Abdul Alim) की, एक ऐसे युवा की जिसने मुश्किल हालात में भी उम्मीद नहीं छोड़ी. जहां ज़्यादातर लोग हालात को दोष देते हैं, वहीं अलीम ने हालात को सीढ़ी बना लिया.
एक समय था जब वे Zoho कंपनी के ऑफिस में बतौर सिक्योरिटी गार्ड (security guard) नौकरी करते थे. दरवाज़े पर खड़े होकर दूसरों को अंदर आते-जाते देखते थे. लेकिन आज, वही अलीम उसी ऑफिस में बैठकर कोड लिखते हैं, सॉफ्टवेयर (software engineer) बनाते हैं और लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा बन चुके हैं.
इन दिनों सोशल मीडिया पर उनकी कहानी तेजी से वायरल हो रही है. लिंक्डइन पर साझा की गई अपनी पोस्ट में अब्दुल अलीम ने बताया कि उन्होंने अपनी यात्रा Zoho कंपनी में सिक्योरिटी गार्ड के रूप में शुरू की थी. आत्मनिर्भरता और लगातार सीखने के जुनून के दम पर उन्होंने बिना किसी कॉलेज डिग्री के ही Zoho में सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट इंजीनियर की पोस्ट हासिल की.
यह कहानी सिर्फ एक इंसान की सफलता नहीं, बल्कि यह विश्वास है कि सच्ची लगन, सीखने की चाह और मेहनत किसी भी डिग्री या सर्टिफिकेट से कहीं ज्यादा ताकतवर होती है.
₹1000 से शुरू हुई नई ज़िंदगी
साल 2013 में, अब्दुल अलीम के पास सिर्फ ₹1000 थे और कोई ठिकाना नहीं था. तमिलनाडु के एक छोटे से गांव से निकले अलीम नौकरी की तलाश में निकले और दो महीने तक सड़कों पर भटके. आखिरकार उन्हें Zoho कंपनी में सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी मिली.
वह नौकरी भले ही छोटी थी, लेकिन किस्मत ने वहीं से एक बड़ा मोड़ लिया.
एक दिन, Zoho के एक सीनियर कर्मचारी ने अलीम में कुछ खास देखा, जिज्ञासा, विनम्रता और सीखने की इच्छा. बातचीत के दौरान पता चला कि अलीम को स्कूल के दिनों में थोड़ी बहुत HTML आती थी. सीनियर ने सोचा, “क्यों न इसे थोड़ा और सिखाया जाए?”
उस दिन से अलीम की ज़िंदगी बदलने लगी.
12 घंटे की ड्यूटी, सीखने की लगन
दिनभर सुरक्षा ड्यूटी के बाद रात को वह कोडिंग सीखते. थकान के बावजूद उनका जोश कभी कम नहीं हुआ. धीरे-धीरे उन्होंने सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट के बेसिक सीखे और आठ महीनों में एक छोटा-सा ऐप बना दिया.
जब उनके मेंटर शिबु एलेक्सिस ने यह ऐप अपने मैनेजर को दिखाया, तो सभी हैरान रह गए. अलीम को इंटरव्यू देने का मौका मिला.
अलीम ने सिर्फ 10वीं तक पढ़ाई की थी, इसलिए वह पहले थोड़ा घबराए. लेकिन जब उन्हें बताया गया कि Zoho में डिग्री से ज्यादा हुनर की कद्र होती है, तो उन्होंने हिम्मत जुटाई और इंटरव्यू दिया. वह पास हो गए.
Zoho ने उन्हें सॉफ्टवेयर इंजीनियर की जॉब दी. आज, अब्दुल अलीम आठ साल से कंपनी में काम कर रहे हैं और हर दिन अपनी सफलता के लिए शुक्रगुज़ार हैं.
Zoho की सोच: डिग्री नहीं, कौशल मायने रखता है
Zoho के फाउंडर श्रीधर वेंबू (Sridhar Vembu) पहले भी कह चुके हैं कि उनकी कंपनी में डिग्री की कोई अनिवार्यता नहीं है. वे कहते हैं, “हम कौशल, जिज्ञासा और व्यावहारिक सोच को सबसे ऊपर रखते हैं.”
उनकी यह नीति ही अलीम जैसे लोगों को मौका देती है. जोश और सीखने की ललक रखने वालों को आगे बढ़ने का मंच देती है.
वेंबू का मानना है कि आने वाले समय में उनकी कंपनी के अधिकतर कर्मचारी ऐसे होंगे जिनके पास डिग्री नहीं होगी, लेकिन हुनर, मेहनत और लगन होगी.
अब्दुल अलीम की कहानी सिर्फ एक इंसान की नहीं, बल्कि उन लाखों युवाओं की उम्मीद है जो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने देखते हैं. उन्होंने साबित किया कि कभी-कभी किस्मत मौके नहीं देती, लेकिन मेहनत और लगन रास्ता बना देती है.
आज, जब सोशल मीडिया पर डिग्री और सर्टिफिकेट को लेकर चर्चाएं होती हैं, तब अलीम जैसे लोग यह याद दिलाते हैं कि सच्चा टैलेंट किसी कागज़ पर नहीं, बल्कि इंसान की लगन में लिखा होता है.
उनकी कहानी यह भी दिखाती है कि कंपनियां जैसे Zoho, जो कौशल को प्राथमिकता देती हैं, समाज में एक नई सोच ला रही हैं. एक ऐसी सोच जिसमें हर इंसान को उसकी मेहनत के बल पर पहचान मिल सके.
अब्दुल अलीम ने न केवल अपनी ज़िंदगी बदली, बल्कि यह भी साबित किया कि सपने देखने की कोई सीमा नहीं होती. ₹1000 से शुरू हुई यात्रा आज लाखों लोगों के दिलों तक पहुंच चुकी है. अगर आप भी कभी सोचते हैं कि आपके पास साधन नहीं हैं, तो अलीम की कहानी याद करें. क्योंकि असली सफलता वहीं से शुरू होती है, जहां ज़्यादातर लोग हार मान लेते हैं.



