आजीबाईची शाला: एक अनोखा स्कूल जहां पढ़ती हैं दादियां
आजीबाईची शाला – जहाँ दीवारों पर सिर्फ अक्षर नहीं लिखे जाते, बल्कि उम्मीद, आत्मविश्वास और जीवन का दूसरा अध्याय लिखा जाता है.
सोचिए… किसी बच्चे का पहला स्कूल का दिन कितना खास होता है. हाथ में नई किताबें, बैग में पेंसिल और कॉपी, और दिल में सपनों की दुनिया. लेकिन अगर यही पहला स्कूल का दिन 4 या 5 साल की उम्र में नहीं, बल्कि 70 या 90 साल की उम्र में आए, तो? सुनकर हैरानी होती है, पर महाराष्ट्र (Maharashtra) के ठाणे (Thane) जिले के एक छोटे से गाँव में यह सपना हकीकत बन चुका है.
यहाँ हर दोपहर गुलाबी साड़ी (Pink Saree) पहने दादियाँ (Dadis) स्कूल बैग (School bag) लेकर निकलती हैं. उनकी आँखों में वही चमक होती है, जो किसी छोटे बच्चे की पहली क्लास में दिखाई देती है. फर्क बस इतना है कि ये छात्राएँ पोती-पोतों की उम्र की नहीं, बल्कि उनकी दादियाँ हैं. यही है ‘आजीबाईची शाला’ (Aajibaichi Shala) — दादियों का स्कूल (Grandmothers’ School), जहाँ उम्र नहीं, बल्कि सीखने की चाह मायने रखती है.
मार्च 2016 में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस (International Women’s Day) के दिन, गाँव की बुज़ुर्ग महिलाओं ने एक दिल छू लेने वाली इच्छा जताई — “हमें धार्मिक ग्रंथ खुद पढ़ने हैं, दूसरों से पढ़वाना नहीं.”
न्यूज़18 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, स्थानीय शिक्षक और समाजसेवी योगेंद्र बांगड़ (Yogendra Bangar) ने उनकी यह आवाज़ सुनी और ठान लिया कि इनके लिए स्कूल खोलेंगे. मोतिराम दलाल चैरिटेबल ट्रस्ट (Motiram Dalal Charitable Trust) ने मदद का हाथ बढ़ाया और गाँव की गलियों में उम्मीद का नया सूरज उग आया.
शुरुआत में इस स्कूल में 27 छात्राएँ थीं, उम्र 60 से 90 साल. कई ने कभी पेंसिल तक नहीं पकड़ी थी. किसी की आँखों की रोशनी धुंधली थी, तो किसी के हाथ काँपते थे. लेकिन सीखने की लगन इतनी प्रबल थी कि कोई रुकावट उन्हें रोक नहीं सकी.
कक्षा में कविताएँ गूंजतीं, पहाड़े दोहराए जाते, और हर बार गलती पर पूरी क्लास ठहाकों और तालियों से गूंज उठती. धीरे-धीरे गुलाबी साड़ी सिर्फ यूनिफॉर्म नहीं रही, बल्कि आत्मसम्मान और नए जीवन की पहचान बन गई.
छात्रा सीताबाई देशमुख हिंदुस्तान टाइम्स से पहले हुई बातचीत में कहती हैं, “कभी नहीं सोचा था कि ज़िंदगी में स्कूल जाने का मौका मिलेगा. बचपन में गरीबी और समाज ने लड़कियों को यह हक नहीं दिया. लेकिन आज मुझे लगता है जैसे मैंने नया जन्म लिया हो.”
उनकी पोती अनुष्का भी उनकी साथी बन गई. वह मुस्कुराते हुए कहती है, “दादी का होमवर्क कराने में बहुत मज़ा आता है. अब हम साथ-साथ पढ़ते हैं.”
इन दादियों की यह यात्रा अकेले की नहीं है. इनके परिवार, खासकर पोते-पोतियाँ, इनके सबसे बड़े सपोर्टर बने. वे उनका बैग पैक करते, स्कूल छोड़ने जाते और साथ में पढ़ाई करवाते.
वहीं मोतिराम दलाल ट्रस्ट के संस्थापक दिलीप दलाल ने कहा, “दादियों को इस उम्र में पढ़ते देखना गर्व की बात है. यह नज़ारा दिल को छू लेता है.”
आज आजीबाईची शाला सिर्फ़ एक स्कूल नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए प्रेरणा है. इसने साबित कर दिया है कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती. ठाणे की इन दादियों ने दुनिया को सिखा दिया कि सपने कभी बूढ़े नहीं होते.
गाँव की गलियों से निकली यह गुलाबी क्रांति अब और गाँवों को प्रेरित कर रही है. और जब भी कोई कहे — “अब पढ़ने में देर हो गई है”, तो ठाणे की दादियाँ मुस्कुराकर जवाब देंगी — “देर आए, दुरुस्त आए.”
Edited by Ravi Pareek



