ये स्टार्टअप हर किसी को अंग्रेजी सिखा बना रहे रोजगार के लायक

By Rashi Varshney
February 25, 2019, Updated on : Thu Sep 05 2019 07:31:24 GMT+0000
 ये स्टार्टअप हर किसी को अंग्रेजी सिखा बना रहे रोजगार के लायक
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हैदराबाद में एनगुरु सेंटर

दिल्ली में एक ऑटो रिक्शा चालक, पचास वर्षीय किशन कुमार, आसानी से अपने यात्रियों के साथ अंग्रेजी में बातचीत कर लेते हैं। किशन का कहना है कि इससे उन्हें अधिक सवारी मिलने लगी। क्योंकि वह विदेशियों और प्रोफेशनल्स के साथ अंग्रेजी में अच्छी तरह से बातचीत करने में सक्षम हैं। ये याद करते हुए कि उन्हें अच्छी क्वालिटी एजुकेशन नहीं मिली, किशन कहते हैं, "जब मैं छोटा था तब से, हमेशा से ही मैं अंग्रेजी सीखना चाहता था लेकिन बिहार का तो आपको पता ही है।"


एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (एएसईआर) 2018 से पता चलता है कि ग्रामीण भारत में कक्षा 8 के प्रत्येक छात्र में से एक भी कक्षा 2 की पाठ्य पुस्तक नहीं पढ़ सकता है। भारत में लाखों लोगों के लिए किशन की तरह, अंग्रेजी में बात करने की क्षमता का मतलब है कि उनके पास नौकरी पाने का बेहतर मौका है। लाखों लोगों की इच्छाओं से उत्साहित, भारत में कुछ मुट्ठी भर टेक स्टार्टअप जैसे कि इंग्लिश हेल्पर, इंग्लिश बोलो, मल्टीभाषी, किंग्स लर्निंग, आदि तकनीक की मदद से 80 प्रतिशत से अधिक गैर-अंग्रेजी बोलने वाले लोगों की आवश्यकता को पूरा कर रहे हैं। किशन कहते हैं कि उन्होंने एंड्रॉइड प्ले स्टोर पर एक ऐप के जरिए अंग्रेजी सीखना भी शुरू कर दिया है। किशन अब बेहतर इनकम की उम्मीद में ऐप-आधारित टैक्सी सर्विस के लिए ड्राइविंग शुरू करने की इच्छा रखते हैं।


केपीएमजी की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में ऑनलाइन लर्निंग मार्केट 2021 तक 42 प्रतिशत तक बढ़ने का अनुमान है, जिससे यह 29 मिलियन डॉलर का उद्योग बन जाएगा। रिपोर्ट में कहा गया है, "ऑनलाइन भाषा सीखने वालों में ज्यादातर लोग अंग्रेजी सीखने वाले हैं।" इंग्लिश हेल्पर नाम के स्टार्टअप का मुख्यालय गुरुग्राम में है। ये स्टार्टअप यूजर्स को प्रौद्योगिकी के माध्यम से अंग्रेजी सीखने में मदद। इसके ग्लोबल सीईओ संजय गुप्ता कहते हैं, “अंग्रेजी महत्वाकांक्षा की भाषा है। यह छात्रों को उच्च शिक्षा के लिए तैयार करती है, उनके नौकरी के अवसरों को बढ़ाती है और लोगों को सामाजिक रूप से सशक्त बनाती है।” पहली बार अंग्रेजी सीखने वाले लोगों पर केंद्रित 'मल्टीभाषी' की संस्थापक अनुराधा अग्रवाल का मानना है कि ग्रामीण भारत में अब इंटरनेट और स्मार्टफोन तक लोगों की पहुंच आसान है। वे कहती हैं, "यह अगले दस लाख उपयोगकर्ताओं को टार्गेट करने का सही समय है"।


शिक्षकों को पढ़ाने के लिए सीखने की आवश्यकता है

इंग्लिश हेल्पर (EnglishHelper) भारत में राइट टू रीड (RightToRead) जैसे कुछ प्रमुख कार्यक्रम ऑफर करता है, जहां छात्रों को अंग्रेजी टेक्स्ट बुक के मल्टी-सेंसरी (multi-sensory) AI प्रौद्योगिकी-आधारित पढ़ने के तरीके से अवगत कराया जाता है। यह 2011 में बोस्टन स्थित संज्ञानात्मक वैज्ञानिक (cognitive scientist) और सीरियल उद्यमी वेंकट श्रीनिवासन द्वारा शुरू किया गया था, जिसे बाद में संजय गुप्ता ने इसके वैश्विक सीईओ के रूप में ज्वाइन किया। पांच साल पहले 100 स्कूलों में शुरू हुए राइट टू रीड पायलट प्रोजेक्ट से, अब 27 राज्यों में 2.5 मिलियन छात्रों को शामिल किया जा चुका है। हाल ही में, कंपनी ने महाराष्ट्र सरकार के साथ राज्य भर के 65,000 से अधिक स्कूलों में राइट टू रीड को लागू करने के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए।


2018 में, कंपनी ने अंग्रेजी बोलने में सुधार करने के लिए EnglishBolo नामक एक ऐप लॉन्च किया। यह एक शानदार प्रोग्राम है जो रिमोट एरिया में स्थित शिक्षकों को सेल्फ-लर्निंग और लाइव वीडियो कक्षाएं प्रदान करता है। संजय आगे कहते हैं, “100 दिनों की अवधि में, लर्नर्स (सीखने वाले) 15-15 मिनट के 100 सेल्फ-लर्निंग लेसन्स लेते हैं और 10 क्लास अटेंड करते हैं। इन क्लासेस को दिन के किसी भी समय और सप्ताह के किसी भी दिन के लिए बुक किया जा सकता है। कम आय वाले लर्नर्स की सहायता के लिए इंग्लिशबोलो ने इंस्टालमेंट में पेमेंट का विकल्प भी दिया हुआ है।"


वे कहते हैं, “अंग्रेजी शिक्षकों की कमी है। दिलचस्प बात यह है कि शिक्षक, जो अंग्रेजी में कुशल हैं, वे भी शिक्षार्थियों को भाषा सिखाने के लिए संघर्ष करते हैं, और कक्षा से परे इन छात्रों को अकादमिक सहायता प्रदान नहीं कर सकते।" उनका कहना है कि ऐप उन युवाओं को टारगेट करता है जो रोpगार कमाने की उम्र के करीब हैं। संजय कहते हैं, ''लाभार्थियों में स्कूल शिक्षक, छात्र और साथ ही इंग्लिशबोलो के शिक्षक भी शामिल हैं।


पहली बार सीखने वाले (First-time learners)

छोटे शहरों और गांवों में पहली बार अंग्रेजी सीखने वालों पर फोकस्ड, जयपुर स्थित स्टार्टअप मल्टीभाषी (Multibhashi) अपने ऐप के माध्यम से हिंदी, बंगाली, असमिया, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, मराठी, पंजाबी, गुजराती और उड़िया सहित 11 स्थानीय भाषाएं बोलने वालों को अंग्रेजी सिखाता है। मल्टीभाषी की संस्थापक अनुराधा अग्रवाल कहती हैं कि इंटरनेट की सस्ती पहुंच ने ग्रामीण और सेमी-अर्बन भारत में आकांक्षाओं का बाजार खोल दिया है। मल्टीभाषी ऐप 'फिफी (Fifi)’ नामक एक बॉट के साथ काम करता है जो आपको सीखने की प्रक्रिया में मार्गदर्शन करता है। यह एक दोस्त से चैट करने जैसा है, जो आपको कुछ गलत उच्चारण करने पर ठीक कर देगा।


फिफी एक 24*7 बॉट है, और उपयोगकर्ता उसके सवालों के जवाब देकर, सुझाव मांग सकते हैं और चैट के माध्यम से मदद ले सकते हैं। इसके अलावा, इस ऐप में वॉइस-आधारित चैट बॉट भी है, जिसे रिदम (Rhythm) कहा जाता है, जो बिल्कुल आपके 'ग्रामर नाजी (grammar Nazi)’ दोस्त की तरह होगा, जो गलत अंग्रेजी बोलने पर आपको सही करता है। वे कहती हैं, "रिदम आपको आवाज के माध्यम से अंग्रेजी सीखने में मदद करता है।"


ऐप में कुछ फीचर्स मुफ्त हैं। शिक्षक के साथ वन-ओन-वन ऑनलाइन ट्रेनिंग जैसे एडवांस फीचर्स को 20 रुपये या उससे अधिक में खरीदा जा सकता है। दो साल पहले शुरू किया गया, मल्टीभाषी ऐप प्ले स्टोर पर 10,00,000 बार इंस्टॉल किया जा चुका है।


कक्षा बनाम ऑनलाइन (Classroom vs online)

हैलो इंग्लिश (Hello English) लगभग पांच करोड़ यूजर्स के साथ एक और लोकप्रिय ऑनलाइन मंच है, और भारत में अंग्रेजी क्षमताओं और नौकरी की आवश्यकताओं के बीच की खाई को पाटने की कोशिश कर रहा है। 23 स्थानीय भाषाओं से अंग्रेजी सिखाते हुए, कंपनी ने वैश्विक रूप से 55,000 शहरों, कस्बों और गांवों को छुआ है और उनमें से अधिकांश भारत के हैं। जयपुर में इसका मुख्यालय है। हैलो इंग्लिश एक मोबाइल-आधारित इंटरैक्टिव लर्निंग और मूल्यांकन प्लेटफॉर्म है, जो यूजर्स को दूसरी भाषा के रूप में अंग्रेजी सीखने में मदद करती है। हैलो इंग्लिश की सह-संस्थापक प्रांशु भंडारी कहती हैं कि ऐप हर यूजर्स के हिसाब से आकलन करता है, और फिर उनके लिए अनुकूल कंटेंट रेकमंड करता है। यह CEFR (वैश्विक मानकों) पर आधारित पाठ्यक्रम के साथ-साथ वास्तविक दुनिया का कंटेंट जैसे समाचार, वीडियो, वॉयस-लीड बातचीत, आदि भी ऑफर करता है।


प्रांशु बताती हैं, "भारत में, 800 मिलियन लोग प्रोडक्टिव एज ग्रुप में हैं, और केवल उनमें से 12 प्रतिशत ही अंग्रेजी बोल सकते हैं।" कंपनी का लक्ष्य प्रत्येक शिक्षार्थी को उसकी आयु, स्थान, भाषा, लिंग या सामाजिक-आर्थिक स्थिति के बावजूद, उसके फोन पर अंग्रेजी सीखने की क्षमता के साथ सशक्त बनाना है। वह यह भी कहती हैं कि सेंट्रल स्क्वायर फाउंडेशन द्वारा कमीशन एक स्वतंत्र वैज्ञानिक अध्ययन से पता चलता है कि हैलो इंग्लिश का उपयोग करने वाले शिक्षार्थी एक क्लासरूम ट्रेनिंग की तुलना में अंग्रेजी बोलने में 3.7 गुना अधिक शसक्त होते हैं। वह कहती है कि यह एप्स में 'गेमिफाइड' सीखने के अनुभव के कारण है, जो कि वर्चुअल रिवार्ड्स, रैंक और लीडरबोर्ड के साथ-साथ वाइस-साइज लर्निंग यूनिट्स, वॉयस-लेडेड प्रैक्टिस है।


यह प्लेटफार्म, बोली जाने वाली अंग्रेजी के लिए लेसन और स्पीच पहचान के टूल्स, अरबों वॉयस डेटा पॉइंट और चैट हेल्पलाइन जैसे अंग्रेज़ी भाषा के विशेषज्ञों, शब्दकोशों, आदि के साथ बातचीत करने के लिए प्रदान करता है। कंपनी का कहना है कि उसके कुछ प्रमुख ग्राहक, जैसे कि विप्रो, ताज होटल्स, एयरटेल, बजाज, डोमिनोज, मैकडॉनल्ड्स, वॉलमार्ट, फ्लिपकार्ट, इत्यादि, अपने एंटरप्राइज सोलूशन का उपयोग अपने वर्कफोर्स को ट्रेन करने के लिए करते हैं। आज, लगभग 7,000 संगठन, जिनमें राजस्थान और दिल्ली सरकार शामिल हैं वे इस प्लेटफॉर्म का उपयोग छात्रों और वोकेशनल्स ट्रेनीज को ट्रेन करने के लिए कर रहे हैं ताकि उनकी रोजगार में वृद्धि हो सके। प्रांशु इस तथ्य पर जोर डालते हुए कहती हैं कि हैलो इंग्लिश ऐप में बड़े पैमाने पर ऑफलाइन सपोर्ट है, जिसमें 90 प्रतिशत फीचर्स को काम करने के लिए डेटा कनेक्टिविटी की आवश्यकता नहीं है।


उद्योग आधारित रोजगार की जरूरत (Industry-based employability needs)


बेंगलुरु स्थित किंग्स लर्निंग, जो माइकल एंड सुसान डेल फाउंडेशन द्वारा समर्थित है, एनगुरु ( Enguru) नामक एक ऐप ऑफर करता है। यह ऐप यूजर्स को लेसन्स, सिम्युलेटेड कनवर्सेसन, गेम, वीडियो और लाइव क्वासेस के कॉम्बीनेशन के माध्यम से 28 भाषाओं से अंग्रेजी सीखने में सक्षम बनाता है। लेकिन जो बात इसे अलग बनाती है वह यह है कि यह यूजर्स को उनके उद्योग के आधार पर सीखने की अनुमति देकर उन्हें नौकरी के लिए तैयार करने पर केंद्रित है। उदाहरण के लिए, मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में काम करने वाले व्यक्ति को रिटेल इंडस्ट्री में काम करने वाले व्यक्ति की तुलना में अंग्रेजी शब्दों के विभिन्न सेटों को जानना होगा। किंग्स लर्निंग के संस्थापक और सीईओ अर्शन वकिल (Arshan Vakil), कहते हैं कि एनगुरु के पीछे का आधार यह है कि भारत में लोग अंग्रेजी को रोजगार के लिए एक उपकरण के रूप में सीखते हैं, और इसीलिए ऐप का कंटेंट इंडस्ट्री के लिए जरूरी अंग्रेजी पाठ्यक्रमों की पेशकश करके आवश्यकता से मेल खाता है, जो यूजर्स को अनुमति देता है कि वे अपने कैरियर के हितों से संबंधित जरूरी शब्दावली सीखें और अभ्यास करें।


हैलो इंग्लिश के फाउंडर प्रांशु भंडारी और निशांत पाटनी

वह आगे कहते हैं कि बिना किसी विज्ञापन के एक मुफ्त 'सामान्य अंग्रेजी' पाठ्यक्रम है, जिसमें 600 लेवल्स हैं। पेड कोर्स में रिटेल, होटल, बीपीओ, ईमेल राइटिंग और इंटरव्यू की तैयारी के लिए ट्रेनिंग आदि शामिल हैं। प्रत्येक पेमेंट कोर्स के साथ रिज्यूम-एडिट सुविधा के लिए मूल्य निर्धारण 50 रुपये से शुरू होता है, जिसमें पूरे कोर्स के लिए 499 रुपये की लागत से एक अंतिम मूल्यांकन और प्रमाण पत्र शामिल है।


कंपनी के पास उद्यमों के लिए एनगुरू का एक अलग वर्जन भी है, जो कंपनी और क्षेत्र के आधार पर विभिन्न कार्यक्रमों को पूरा करता है। एनगुरू के कुछ ग्राहकों में गोदरेज नेचर बास्केट, ओबेरॉय ग्रुप, बॉश (Bosch), टीसीएस, हिमालय, कैनन और ग्रासिम शामिल हैं। सीएसआर कार्यक्रम वे टाटा स्ट्राइव, मैजिक बस, Pratham's PACE centres, डॉ. रेड्डीज फाउंडेशन और ट्रेंट (TATA समूह का भी हिस्सा) में व्यावसायिक संस्थानों के माध्यम से शामिल हैं। एनगुरू ऐप का उपयोग करने के लिए, यूजर्स को एक प्लेसमेंट टेस्ट से गुजरना पड़ता है, जो उनके शुरुआती प्वाइंट की पहचान करता है।


एनगुरू ठाणे (मुंबई) में वोल्टास प्रायोजित टाटा स्ट्राइव सेंटर में छात्रों द्वारा उपयोग किया जा रहा है। अप्रैल 2014 में शुरू हुआ, एनगुरु एंड्रॉइड, आईओएस और JioPhone पर उपलब्ध है, और एंड्रॉइड पर 5.5 मिलियन डाउनलोड और JioPhone पर 23.5 मिलियन यूजर्स हैं। इंग्लिश हेल्पर के संजय ने आखिर में कहते हैं कि अंग्रेजी एक कठिन भाषा है, खासकर उन शिक्षार्थियों के लिए जो अपने रोजमर्रा के माहौल में अंग्रेजी का सामना नहीं करते हैं। वे कहते हैं, “इस प्रणाली से उभरने वाले युवा खुद को नुकसान में पाते हैं क्योंकि वे उच्च शिक्षा की खोज पर काफी विचार करते हैं। जो लोग रोजगार चाहते हैं, वे अंग्रेजी कौशल की कमी, जिसमें भाषा बोलने में असमर्थता शामिल है के कारण नौकरी के अवसरों को कम पाते हैं।” शायद यही समस्या है जिसे ये स्टार्टअप दूर करने की कोशिश कर रहे हैं।


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