अपने खास सॉस के जरिये रेडी-टू-कुक मार्केट में धूम मचा रही है मुंबई की यह कंपनी

By Bhavya Kaushal
February 15, 2022, Updated on : Wed Feb 16 2022 08:00:40 GMT+0000
अपने खास सॉस के जरिये रेडी-टू-कुक मार्केट में धूम मचा रही है मुंबई की यह कंपनी
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साल 2013 में देब मुखर्जी ने महसूस किया कि वे एक निवेश बैंकर के रूप में अपने करीब एक दशक के लंबे करियर से दूर जाना चाहते हैं। उन्होंने अपने पिता को 40 वर्षों तक हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री में काम करते हुए देखा था, यही कारण था कि वे फूड बिजनेस में आना चाहते थे।


उन्होंने 2014 में उन्होने सेरेस हॉस्पिटैलिटी की शुरुआत की, जो क्विक सर्विस रेस्तरां (क्यूएसआर) श्रृंखला थी। अगले पांच वर्षों में देब ने इसे पूरे महाराष्ट्र में 45 आउटलेट तक बढ़ा दिया। साल 2019 में, देब ने महसूस किया कि एक F&B कंपनी को स्केल करने के लिए निरंतरता बनाए रखना सबसे जरूरी है और यह सबसे कठिन काम था।


देब ने योरस्टोरी को बताया,

“जब आप एक रेस्तरां चेन को बड़ा करना शुरू करते हैं, तो गुणवत्ता गिर जाती है क्योंकि हर स्थान एक अलग शेफ द्वारा चलाया जा रहा होता है। और इसलिए स्वाद जगह के हिसाब से बदल जाता है, फिर चाहे आप कितनी भी कोशिश कर लें।”


देब और उनकी टीम ने एक ऐसे समाधान पर काम करना शुरू किया जो यह सुनिश्चित करे कि "बिना किसी विशिष्ट कौशल के भोजन तैयार किया जा सके। उन्हें इसमें असली सफलता तब मिली जब निजी इक्विटी फंड ब्लूस्टोन कैपिटल ने सेरेस को श्रीलंका में क्लाउड किचन व्यवसाय स्थापित करने में मदद करने के लिए आमंत्रित किया। इस प्रोजेक्ट के लिए, सेरेस ने खाने के लिए तैयार उत्पादों की एक सिरीज़ शुरू की, जैसे कि बिरयानी, दक्षिण भारतीय चेट्टीनाड, बर्मी खाओ सुए और इसी के साथ और भी बहुत कुछ।


जब इन उत्पादों ने विदेश में अच्छी वृद्धि देखी, तो देब ने भारत में उसी कॉन्सेप्ट को लागू करने का फैसला किया। मैनुफेक्चुरिंग 100 प्रतिशत महाराष्ट्र और गुजरात में स्थित चार यूनिट्स के माध्यम से किया जाता है। पिछले महीने सेरेस ने 25 लाख रुपये की कमाई की थी। 

विफलता को सफलता में बदलना

सेरेस फूड्स ने शुरुआती निवेश के रूप में 5.5 करोड़ रुपये के साथ अपनी यात्रा शुरू की थी। हालांकि, ग्राहकों को खोजने के मामले में ब्रांड को एक कठिन समय सामना करना पड़ा। देब कहते हैं, “हमने बटर चिकन और पालक पनीर की ग्रेवी के लिए उत्पाद पेश किए। लेकिन हमें जल्द ही एहसास हुआ कि हम एमडीएच या आईडीसी किचन जैसे मसाला ब्रांडों के साथ प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं।” यह प्रतिस्पर्धा सरेस के लिए काफी भारी पड़ी।


इसके बाद देब ने अपना ध्यान नॉन-वेज बाजार पर केंद्रित कर दिया। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार 75 प्रतिशत भारतीय मांसाहारी हैं। इसने सह-संस्थापकों को एक कदम पीछे हटने और नॉन-वेज श्रेणी में एक विशिष्ट उत्पाद लाइन का पता लगाने के लिए मजबूर किया। इसके बाद कंपनी ने लाल मास, मस्टर्ड फिश, नल्ली निहारी और अन्य जैसे व्यंजनों के लिए लिक्विड मसाला पेश किया।


खाना पकाने की प्रक्रिया के बारे में बताते हुए देब कहते हैं, “आपको प्याज को काटने और पारंपरिक खाना पकाने की तरह अलग से मसाला डालने की ज़रूरत नहीं है। आपको बस इतना करना है कि पैकेट की सामग्री को एक पैन में डालें, थोड़ा पानी डालें और इसे 15 मिनट तक पकने दें।"


ओरिएंटल श्रेणी में सेरेस ने 'मोई सोई' सॉस जैसे ब्लैक बीन सॉस, मंचूरियन स्टिर फ्राई सॉस और बहुत कुछ अन्य सॉस लॉन्च किए हैं। सेरेस सॉस के अलावा रेडी टू ईट मोमोज और चिकन कटलेट भी ऑफर करता है।

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Ceres Foods के सह-संस्थापक (दाएं से बाएं): जगमनदीप सिंह, देब मुखर्जी और अमित मांगे

विभिन्न स्वादों की पेशकश

पहले कुछ महीनों के लिए सेरेस ने लगभग तीन महीनों तक चार शहरों में अपने उत्पादों का परीक्षण किया। आज, ब्रांड देश भर के 28 शहरों में मौजूद है। इसका सबसे बड़ा बाजार मुंबई के बाद पुणे, गोवा, गुड़गांव और कोलकाता है।


सेरेस का लगभग 90 प्रतिशत व्यवसाय ऑनलाइन चैनलों से आता है, जिसमें अमेज़न, फ्लिपकार्ट और उसकी अपनी वेबसाइट शामिल है, जबकि 10 प्रतिशत वितरकों के माध्यम से ऑफ़लाइन आता है।


सेरेस श्रीलंका और सऊदी अरब जैसे अंतरराष्ट्रीय बाजारों को सप्लाई करते हैं। आगे बढ़ते हुए अब कंपनी की दुबई और सिंगापुर में भी विस्तार करने की योजना है।


पूरे भारत में अपनी उपस्थिति स्थापित करने के बारे में बात करते हुए देब कहते हैं, "शुरुआत में हम बैंगलोर के अलावा दक्षिणी बाजार पर बहुत ध्यान केंद्रित नहीं कर रहे थे, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से हमारी कुछ बड़ी बिक्री चेन्नई से आ रही है।"


देब का दावा है कि लाल मास लिक्विड मसाला और ब्लैक बीन सॉस इस बाजार में सबसे ज्यादा बिकने वाले उत्पाद हैं। देब के अनुसार, चेन्नई में स्थानीय खिलाड़ियों का दबदबा है, यही वजह है कि D2C (डायरेक्ट-टू-कंज्यूमर) ब्रांड इस बाजार का पता लगाना चाह रहे हैं। देब का कहना है कि इस ट्रेंड ने सेरेस को और अधिक स्वादों के साथ आने के लिए प्रेरित किया है, विजिन्हें शेष रूप से दक्षिण भारतीय बाजार के लिए डिज़ाइन किया गया हो।


वे कहते हैं, "हमारा लक्ष्य उन व्यंजनों को चुनना है जो बहुत ही मूल हैं और जिन्हें घर पर बनाना मुश्किल है। जैसे विशेष 'बिहारी मटन करी', यह उन उत्पादों में से एक है जिस पर काम चल रहा है और इन्हें कुछ महीनों में लॉन्च किया जाएगा।”


अगस्त 2021 में 500 यूनिट्स की बिक्री से यह त्योहारी सीजन के दौरान धीरे-धीरे बढ़कर 900 यूनिट्स तक पहुंच गया है और इस महीने के अंत तक इसके 10,000 यूनिट्स तक पहुंचने की उम्मीद है। देब कहते हैं कि उन्हें जयपुर, नागपुर, इंदौर, लखनऊ, जम्मू और अन्य जैसे टियर II शहरों से भी बढ़ती मांग दिखाई दे रही है।

भारत में 'रेडी-टू-ईट' मार्केट

पिछले कुछ वर्षों में ‘रेडी-टू-ईट’ और फ़्रोजेन फूड श्रेणियों में तेज वृद्धि देखी गई है। रिसर्च एंड मार्केट्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय रेडी-टू-ईट फ़ूड बाज़ार 2018-2023 के दौरान 16 प्रतिशत से अधिक के CAGR से बढ़कर 2023 तक 647 मिलियन डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है।

भारत ने इस क्षेत्र में कई ब्रांड देखे हैं जैसे कि GRUhasutram और वाकाओ को महामारी के दौरान लॉन्च किया गया है और साथ ही पहले से स्थापित FMCG (फास्ट मूविंग कंज्यूमर गुड्स) प्लेयर्स जैसे पंसारी ग्रुप और गोयल ग्रुप ने फ्रोजन फूड स्पेस में आना शुरू कर दिया है।


देब गुणवत्ता वाले उत्पादों पर ध्यान केंद्रित करते हैं क्योंकि यह उन्हें आगे लेकर जाएगा। वे कहते हैं, “लंबे समय तक भारतीयों को वास्तव में फ्रोजन फूड्स श्रेणी पर भरोसा नहीं था। लेकिन आज बहुत सारे ब्रांड नए उत्पाद लेकर आ रहे हैं।” वे दिन गए जब भारतीय कीमत के बारे में अधिक संवेदनशील थे। वे कहते हैं, "आज, वे 20 या 30 प्रतिशत अधिक भुगतान करने के लिए तैयार हैं यदि आप उन्हें वैल्यू-एडेड और गुणवत्तापूर्ण प्रॉडक्ट की पेशकश करते हैं।" सेरेस के लक्षित ग्राहकों की आयु 25 से 45 वर्ष के बीच है। सह-संस्थापक कहते हैं, "मुझे लगता है कि अगले 10 वर्षों में यह इन अन्य श्रेणियों की तुलना में बहुत बड़ी श्रेणी हो सकती है।"


सेरेस की योजना अगले छह महीनों में 1 लाख यूनिट्स हर महीने और अगले 12-18 महीनों में 3 लाख यूनिट्स तक पहुंचने की है। देब आने वाले समय में अपनी मैन्युफैक्चरिंग क्षमताओं को बढ़ाने के लिए फंड जुटाने पर भी विचार कर रहा है।


Edited by Ranjana Tripathi

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