‘रुक जाना नहीं’ : रेलवे में गैंगमैन से IPS अफ़सर तक का सफ़र, राजस्थान के प्रहलाद मीणा की कहानी

By निशान्त जैन, IAS अधिकारी (गेस्ट ऑथर)
March 26, 2020, Updated on : Fri Aug 19 2022 18:48:21 GMT+0000
‘रुक जाना नहीं’ : रेलवे में गैंगमैन से IPS अफ़सर तक का सफ़र, राजस्थान के प्रहलाद मीणा की कहानी
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आज की कहानी में हम बात करेंगे राजस्थान के दौसा ज़िले के एक गाँव में ग़रीबी में पले-बढ़े ऊर्जावान युवक प्रहलाद मीणा की अविश्वसनीय कहानी, जिन्होंने अपनी यात्रा रेलवे में गैंगमैन की छोटी सी नौकरी से की और एक-के-बाद-एक क़दम बढ़ाते हुए आख़िरकार सिविल सेवा परीक्षा पास कर ओडिशा में IPS अधिकारी बने।


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प्रहलाद मीणा, IPS ऑफिसर



मैं राजस्थान राज्य के दौसा जिले के एक छोटे से गांव आभानेरी (रामगढ़ पचवारा) से हूं। ग्रामीण किसान परिवार से ताल्लुक रखता हूं। हमारे पास दो बीघा जमीन थी, जिसमें घर चला पाना मुश्किल था तो मां-पिताजी दूसरों के खेतों में बंटाई (साजे) में खेती करके परिवार को चलाते थे। 


हमारे क्षेत्र में शिक्षा के प्रति जागरूकता का अभाव था। मैं कक्षा में हमेशा प्रथम दर्जे का विधार्थी रहा फिर भी यह मुकाम तय करने की तो कभी सपने में भी नहीं सोचता था। मैंने अपनी 12वीं तक की पढ़ाई सरकारी स्कूल से ही की है। 10वीं कक्षा का परिणाम आया तुम्हें अपने स्कूल में प्रथम स्थान पर आया था। मेरा भी मन था और कई लोगों ने कहा कि मुझे साइंस विषय लेना चाहिए। मैं भी इंजीनियर बनने का सपना देखता था लेकिन, परिवार वालों की स्थिति ऐसी नहीं थी कि वह मुझे बाहर पढा सके और खर्चा उठा सके क्योंकि मेरे गांव के आसपास विज्ञान विषय का कोई स्कूल नहीं था। मैंने इन सब चीजों को भुलाकर वापस 11वीं में अपने सरकारी स्कूल में एडमिशन ले लिया था और मानविकी विषयों के साथ पढ़ाई जारी रही। 


12वीं में भी मैं अपने कक्षा में स्कूल में प्रथम स्थान पर रहा था लेकिन अब मेरी प्राथमिकता बदल गई थी अब मुझे सबसे पहले नौकरी चाहिए थी क्योंकि परिवार की इतनी अच्छी आर्थिक दशा नहीं थी कि वह मुझे जयपुर किराए पर कमरा दिला कर पढ़ा सके। 


आज मेरी सफलता के पीछे का जो सबसे बड़ा कारण है वह मेरे माता पिता द्वारा मुझे जयपुर के राजस्थान कॉलेज में प्रवेश दिलाना था क्योंकि वहां मेरी ऐसे अच्छे अच्छे दोस्तों से जानकारी हुई और मुझे विश्वास हो गया कि शायद सिविल सेवा में नहीं तो, पर मैं एक अच्छी नौकरी जरूर पा लूंगा।


 निम्न वर्गीय परिवार की पृष्ठभूमि से होने को ध्यान में रखते हुए, मेरे लिए एक अच्छी नौकरी खोजना बहुत महत्वपूर्ण था। बारहवीं कक्षा में था तब हमारे गांव से एक लड़के का चयन भारतीय रेलवे में ग्रुप डी (गैंगमैन) में हुआ था तो उस समय मैंने भी अपना लक्ष्य गैंगमैन बनने का बना लिया और तैयारी करने लग गया। बीए द्वितीय वर्ष 2008 में मेरा भारतीय रेलवे में भुवनेश्वर बोर्ड से गैंगमैन के पद पर चयन हो गया। मैंने पढ़ाई जारी रखी और उसी साल मेरा चयन भारतीय स्टेट बैंक में सहायक (एल डी सी) के पद पर हो गया। वहां नौकरी के साथ मेंने बी. ए. किया तथा आगे की पढ़ाई जारी रखी, 2010 में मेरा चयन भारतीय स्टेट बैंक में परीवीक्षाधीन अधिकारी के पद पर हो गया। 


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मैंने कर्मचारी चयन आयोग द्वारा आयोजित होने वाली संयुक्त स्नातक स्तरीय परीक्षा दी तथा उसमें मुझे रेलवे मंत्रालय में सहायक अनुभाग अधिकारी के पद पर पदस्थापन मिला। चूंकि अब दिल्ली से मैं घर की सभी जिम्मेदारियों को बखूबी निभा रहा था और उस के साथ ही मेंने सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी भी आरंभ कर दी। 


मुझे एक बात पता थी—‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।’ मेरी इच्छा थी कि बस, एक बार सिविल सेवा परीक्षा पास ही करनी है और दुनिया को दिखाना है कि मैं भी यह कर सकता हूं जिससे कि कई छात्र है मेरे जैसे जो ग्रामीण क्षेत्र से आते हैं उनमें प्रतिभा है, लेकिन एक जो आत्मविश्वास होता है वह नहीं आ पाता और यह तभी आता है जब उनके जैसा कोई सफल होता है तभी उनको लगता है कि यह अगर हमारे गांव से, हमारे साथ पढ़ा हुआ, हमारे जितना ही बुद्धिमान था अगर यह इस परीक्षा को पास करता है तो शायद हम भी कर सकते हैं और यही आत्मविश्वास सिविल सेवा परीक्षा में बहुत जरूरी रहता है। 


परीक्षा में पास करने के पीछे मेरा एक यह लालच यह भी था कि मैं अपने पचवारा क्षेत्र से पहला सिविल सर्वेंट बनना चाहता था। 2015 की सिविल सेवा परीक्षा में में प्रारंभिक परीक्षा ही उत्तीर्ण नहीं कर पाया। आई.ए.एस. की परीक्षा में लगातार असफलताओं के बाद मेरे मन में यह धारणा प्रबल नहीं हुई कि मेरा लक्ष्य अब पूरा नहीं होगा और मैंने अपना प्रयास जारी रखा। इसके बाद मेरी अथक-अनवरत मेहनत सफल हुई। इस तरह मेरी सफलता की यात्रा में उतार-चढ़ाव की पगडंडी बहुत लंबी और संघर्ष भरी रही। लेकिन ‘अंत भला तो सब भला।’


मैंने 2015 के साल को बिना हताश हुए हिंदी साहित्य से MA करने लगाया तथा उस के साथ ही नेट जेआरएफ की तैयारी में लग गया। मेरा हिंदी साहित्य से नेट (जेआरएफ) हो गया। इसी साल में राजस्थान लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित की गई कॉलेज लेक्चरर परीक्षा में शामिल हुआ लेकिन इस परीक्षा में भी मैं साक्षात्कार के लिए चयनित होने से एक नंबर से रह गया, मुझे थोड़ी हताशा तो हुई लेकिन मुझे क्या पता था कि नियति को कुछ और ही मंजूर था।


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इस चीज का फायदा यह हुआ कि अगली बार जब मैं 2016 में सिविल सेवा परीक्षा में बैठा तो ना सिर्फ मेरा प्रारंभिक परीक्षा पास हुआ बल्कि फाइनल सिलेक्शन भी हुआ और भारतीय पुलिस सेवा में उड़ीसा कैडर आवंटित हुआ। फाइनल सिलेक्शन होने के पीछे मेरी मेहनत और मेरी मेहनत के अलावा निशांत सर के द्वारा लिखी गई निबंध की किताब जिसको पढ़ कर मेरे एकदम निबंध में डबल नंबर हो गये 2013 के 75, 2014 के 80 नंबर 2016 में 160 नंबर में बदल गए और शायद इन्हीं की किताब की बदौलत आज मैं यहां हूं। 


जो भी दोस्त तैयारी कर रहे हैं किसी भी कॉम्पटेटिव एग्ज़ाम की, उनको में एक व्यक्तिगत सलाह देना चाहता हूं कि वे तो आईएएस निशांत जैन सर की मोटिवेशनल किताब 'रुक जाना नहीं' ज़रूर पढ़ें।


मेरी ओर से सुझाव यह है कि एक ही विषय के लिए कई पुस्तकों के पीछे न भागें। याद रखें कि एक पुस्तक को दो बार पढ़ना दो पुस्तकों को एक बार पढ़ने से बेहतर है।





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गेस्ट लेखक निशान्त जैन की मोटिवेशनल किताब 'रुक जाना नहीं' में सफलता की इसी तरह की और भी कहानियां दी गई हैं, जिसे आप अमेजन से ऑनलाइन ऑर्डर कर सकते हैं।


(योरस्टोरी पर ऐसी ही प्रेरणादायी कहानियां पढ़ने के लिए थर्सडे इंस्पिरेशन में हर हफ्ते पढ़ें 'सफलता की एक नई कहानी निशान्त जैन की ज़ुबानी...')