वैलेंटाइन डे स्पेशल: टाटा ग्रुप के चेयरमेन रतन टाटा ने बताई अपनी लव स्टोरी

यह लॉस एंजिल्स में हुआ, कॉलेज के बाद जब वे एक आर्किटेक्चर फर्म में नौकरी करने लगे, जहां उनके पास बहुत अच्छा समय था और सुंदर मौसम था, उनकी अपनी कार थी और वह अपनी नौकरी से प्यार करते थे, 1960 के दशक के मध्य में, जब टाटा 20 साल के थे।

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श्री रतन टाटा उन भारतीय कारोबारी नेताओं में से एक हैं जिन्होंने इस बात की वकालत की कि भारत में परोपकार को वंचित समुदायों के जीवन में बदलाव लाने के लिए डिजाइन किया जाए, न कि केवल इमारतें बनाने और मंदिरों को दान करने के लिए।


वैलेंटाइन डे की पूर्व संध्या पर अपनी निजी जिंदगी की दुर्लभ झलक देते हुए प्रसिद्ध उद्योगपति और टाटा ग्रुप के चेयरमेन 82 वर्षीय रतन टाटा ने कुछ निजी बातों का खुलासा किया जैसे कि उन्हें प्यार कैसे हुआ?, और वे "लगभग शादी कर चुके थे"


यह अमेरिका के लॉस एंजिल्स में हुआ, कॉलेज के बाद जब वे एक आर्किटेक्चर फर्म में नौकरी करने लगे, जहां उनके पास बहुत अच्छा समय था और सुंदर मौसम था, उनकी अपनी कार थी और वह अपनी नौकरी से प्यार करते थे, 1960 के दशक के मध्य में, जब टाटा 20 साल के थे।


श्री रतन नवल टाटा, Chairman Emeritus of Tata Sons and Chairman of the Tata Trusts

श्री रतन नवल टाटा, Chairman Emeritus of Tata Sons and Chairman of the Tata Trusts



उन्होंने कहा,

यह तब कि बात है जब मैं एलए (लॉस एंजिल्स) में था और मुझे प्यार हो गया और लगभग शादी हो गई। लेकिन तभी, मैंने कम से कम अस्थायी रूप से भारत वापस आने का फैसला किया, क्योंकि मैं अपनी दादी से दूर था जो लगभग 7 साल तक ठीक तरह से अपना ख्याल नहीं रख पाईं।


टाटा ग्रुप के चेयरमेन रतन टाटा ने फेसबुक पेज 'Humans of Bambay' पर पोस्ट करते हुए लिखा,

लेकिन 1962 के भारत-चीन युद्ध के कारण, उसके (प्रेमिका के) माता-पिता उसके (प्रेमिका के) इस कदम से खुश नहीं थे, और यह रिश्ता टूट गया।

यद्यपि उन्होंने उल्लेख नहीं किया है, लेकिन शायद उनकी इस अधुरी प्रेम कहानी के कारण ही उन्होंने पूरी तरह से अपने इस विशाल व्यापार वाले साम्राज्य को आगे बढ़ाने में खुद को समर्पित कर दिया और वह कुंवारे रह गए।


उन्होंने आगे कहा,

इसका कोई पछतावा नहीं था, मेरे पास एक खुशहाल बचपन था, लेकिन मैं और मेरा भाई (जिमी) जब बड़े हो रहे थे, तब हमने अपने माता-पिता (नवल एच. टाटा और सूनी टाटा) के तलाक के कारण बहुत सी रैगिंग और व्यक्तिगत परेशानियों का सामना किया, जो उन दिनों में इतना आम नहीं था जितना आज है।


इसके तुरंत बाद, जब उनकी मां ने दोबारा शादी की, तो स्कूल के लड़कों ने उनके बारे में सभी तरह की बातें कहना शुरू कर दिया, लगातार और आक्रामक रूप से, उन्होंने याद किया।





दादी से मिला सपोर्ट

हालाँकि, उस समय, उनकी दादी, नवजबाई सेठ टाटा ने दोनों भाइयों - रतन और जिमी - को पाल-पोषकर बड़ा किया और उन्हें हर कीमत पर गरिमा बनाए रखने की सीख दी, और जिंदगी की वह सीख आज तक उनके साथ रही हैं।


अपनी दादी के साथ, अपने मजबूत बंधन की यादों को साझा करते हुए, उन्होंने स्वीकार किया,

उन स्थितियों में से अधिकांश में “दूर हट जाना” शामिल था अन्यथा वे (रतन टाटा) उनके (स्कूल के लड़कों के) खिलाफ वापस लड़ते।


रतन टाटा ने आगे बताया,

मुझे याद है, दूसरे विश्व युद्ध के बाद, दादी, मुझे और मेरे भाई को गर्मियों की छुट्टियों में लंदन ले गई। उन्होंने वहाँ हमें नैतिक मूल्यों की सीख दी। वे हमें बताती थी कि, 'यह मत कहो', या 'चुप रहो', 'शांत रहो'। वह हमेशा हमारे साथ रही है।


टाटा ने कहा,

और उनसे ही हमने सीखा कि गरिमा और मान-मर्यादा सबसे जरूरी और सबसे ऊपर है, जो कि आज भी हमारे साथ हैं।


पिता से हुए मतभेद

अपने पिता के साथ हुए मतभेदों के बारे में बताते हुए टाटा ने कहा कि जब वह वायलिन बजाना चाहते थे, तो उनके पिता पियानो पर जोर देते थे, वह (रतन टाटा) एक अमेरिकी कॉलेज में पढ़ना चाहते थे, लेकिन उनके पिता ने ब्रिटेन में पढ़ाई करने पर जोर दिया, वह (रतन टाटा) चाहते थे कि वे खुद वास्तुकार (architect) बनें, लेकिन उनके पिता चाहते थे कि वे इंजीनियर बनें।


यहाँ एक बार फिर, उनकी दादी थी जो बचाव के लिए दौड़ी।


टाटा ने लिखा,

अगर यहाँ मेरी दादी नहीं होती, तो मैं अमेरिका में कॉर्नेल यूनिवर्सिटी (कॉलेज ऑफ आर्किटेक्चर, न्यूयॉर्क) से आर्किटेक्चर में स्नातक की डिग्री नहीं ले पाता। यह उनकी वजह से ही संभव हुआ। भले ही मैंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग के लिए दाखिला लिया, लेकिन मैंने वो छोड़कर आर्किटेक्चर में स्नातक की डिग्री ली।
छात्र जीवन के दौरान श्री रतन टाटा, Cornell University

छात्र जीवन के दौरान श्री रतन टाटा, Cornell University


हालांकि उनके पिता इस सब से काफी परेशान थे।


दादी के सपोर्ट को याद करते हुए रतन टाटा ने कहा,

मैं एक निष्पक्ष सा था, लेकिन मैं अंत में कॉलेज में अपना खुद का, स्वतंत्र व्यक्ति था, और यह मेरी दादी थी, जिन्होंने मुझे बोलने की हिम्मत दी थी कि मैं भी बोल सकता हूं।

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