जब सुधा मूर्ति को एक युवा लड़की में दिखी अपनी झलक और झट से बुला लिया था ऑफिस

सुधा मूर्ति एक ऐसी हस्ती हैं, जो किसी पहचान की मोहताज नहीं हैं। वह एक बिजनेसवुमन, एजुकेटर, लेखिका और फिलान्थरोपिस्ट होने के साथ-साथ इन्फोसिस फाउंडेशन की चेयरपर्सन भी हैं।

जब सुधा मूर्ति को एक युवा लड़की में दिखी अपनी झलक और झट से बुला लिया था ऑफिस

Sunday May 22, 2022,

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बात साल 2020 की है. वह साल जब भारत समेत पूरी दुनिया कोविड19 महामारी के कहर का सामना कर रही थी. सैनिटाइजर, मास्क, ग्लव्स, राशन, खाना, बेड और साथ ही पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट (PPE) किट्स को मुहैया कराने की कोशिशें जारी थीं. PPE किट्स की घोर जरूरत के साथ-साथ कमी भी थी. भारत की दिग्गज इन्फोसिस फाउंडेशन (Infosys Foundation) के लिए भी PPE किट हासिल करना आसान नहीं था। PPE किट की जरूरत को देखते हुए फाउंडेशन ने इंपोर्टेड किट का ऑर्डर दिया। वे महंगे तो थे ही, साथ ही बहुत देर से भी आ रहे थे. ऐसे में इन्फोसिस फाउंडेशन ने मेड इन इंडिया PPE किट्स पर ध्यान देना शुरू किया लेकिन चुनौती यह थी कि उचित मूल्य पर इतनी कुशलता से, जल्दी और अच्छी गुणवत्ता वाले किट्स कौन उपलब्ध कराएगा?

इस सब के बीच अचानक से इन्फोसिस फाउंडेशन की चेयरपर्सन सुधा मूर्ति (Sudha Murty) की नजर एक ईमेल पर पड़ती है. वह एक युवा लड़की की ईमेल थी. उसमें लिखा था, 'मेरी एक छोटी सी गारमेंट फैक्ट्री है, जिसमें 50 कर्मचारी काम करते हैं. हम आपके द्वारा हमें दी जाने वाली किसी भी डिजाइन की मैन्युफैक्चरिंग और उत्पादन में उत्कृष्ट हैं। यदि आप हमें कच्चा माल और एक इंपोर्टेड PPE किट प्रदान कर सकते हैं, तो हम उसी के जैसा बना देंगे। मैं एक छोटे से शहर से हूं और मेरे पास वर्किंग कैपिटल नहीं है, हालांकि मेरे पास प्रतिभा और ज्ञान है। अगर आप मुझे मिलने का समय दे सकते हैं तो मुझे इस बारे में और विस्तार से बताने में खुशी होगी.'

क्यों सुधा मूर्ति को लड़की में दिखी अपनी झलक

उस ईमेल को पढ़कर सुधा मूर्ति को वह वक्त याद आया जब उन्होंने 50 साल पहले JRD टाटा को एक लेटर लिखा था, बिना किसी कनेक्शन के. उस वक्त सुधा IISc बेंगलुरु से कंप्यूटर साइंस में मास्टर्स के फाइनल ईयर में थीं. IISc परिसर में उन्हें ऑटोमोबाइल कंपनी टेल्को [अब टाटा मोटर्स] में एक स्टैंडर्ड जॉब का विज्ञापन दिखा था, जिसमें कहा गया था कि कंपनी को युवा, होनहार, मेहनती और उत्कृष्ट शैक्षणिक पृष्ठभूमि वाले इंजीनियरों की जरूरत है. साथ ही एक और लाइन भी लिखी थी- 'महिला उम्मीदवारों को आवेदन करने की आवश्यकता नहीं है.' बस फिर क्या था सुधा ने इस भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाने की सोची और गुस्से में सीधा टाटा ग्रुप के प्रमुख जेआरडी टाटा को लेटर लिख डाला. जेआरडी टाटा ने वह लेटर पढ़ा भी था और उसी के बाद सुधा मूर्ति के लिए Tata Motors के साथ जुड़ने का रास्ता खुला था.

फिर उस युवती को बुलाया ऑफिस

सुधा मूर्ति को ईमेल वाली उस युवा लड़की में खुद की झलक दिखाई दी और उन्होंने उसे ऑफिस बुलाया। लड़की सभी जरूरी दस्तावेजों के साथ उनके ऑफिस में आई। सुधा मूर्ति के साथ आमने सामने की बातचीत में भी उसने वही बात दोहराई, जो ईमेल में लिखी थी कि वह उसे दिए गए किसी भी डिजाइन की नकल कर सकती है. उसी गुणवत्ता वाले प्रॉडक्ट का उत्पादन कर सकती है और जहां चाहें वहां डिलीवर कर सकती है. सवालों का जवाब देते हुए उसने बताया कि वह डिजाइनिंग में डिप्लोमा किए हुए है. सुधा मूर्ति उससे सवाल करती गईं और वह पूरे आत्मविश्वास के साथ जवाब देती गई. उसने यह भी दावा किया कि अगर गुणवत्ता पसंद नहीं आई तो वह पेमेंट को किस्तों में वापस कर देगी.

सैंपल्स तैयार करने के लिए दिया 10 लाख का चेक

सुधा मूर्ति को वह लड़की दांव खेलने लायक लगी और उन्होंने रिस्क लिया. पहले उन्होंने उसे प्रोटोटाइप और एक छोटे से ऑर्डर के लिए 10 लाख रुपये का चेक दिया। भविष्य का कोई भी ऑर्डर, सैंपल्स की जांच के नतीजे पर निर्भर करने वाला था. 5 दिन बाद वह लड़की पहला प्रोटोटाइप लेकर फिर से सुधा मूर्ति के ऑफिस में थी. उन्होंने इसकी तुलना इंपोर्टेड PPE किट्स से की। यह उसे टक्कर देने वाला भी था और सस्ता भी। कुछ अस्पतालों और विश्वसनीय डॉक्टरों की प्रतिक्रया भी उन पर पॉजिटिव थी, यहां तक कि युवा लड़की के प्रॉडक्ट, इंपोर्टेड प्रॉडक्ट्स से उम्दा थे.

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फिर कहानी में आया एक दिलचस्प मोड़...

बस फिर क्या था, इन्फोसिस फाउंडेशन ने तुरंत उस युवा लड़की को एक बड़ा ऑर्डर दिया और वह उनकी नियमित सप्लायर बन गई। प्रॉडक्ट को लेकर उन डॉक्टरों या अस्पतालों से कोई शिकायत नहीं आई थी, जिन्हें प्रॉडक्ट डोनेट किए गए थे. हालांकि सुधा मूर्ति और उस लड़की की कहानी यहां खत्म नहीं हुई बल्कि कुछ ऐसा हुआ कि सुधा मूर्ति हैरान भी हुईं और बेहद खुश भी. हुआ यूं कि कुछ महीनों बाद वह लड़की फिर से सुधा मूर्ति से मिलने आई. इस बार वह अपने साथ उनके लिए खास तौर पर बनाई गई खजूर की पोली लेकर आई थी. लड़की की मां ने इसे बनाया था. सुधा मूर्ति को खजूर की पोली बहुत पंसद हैं और यह बात लड़की की मां जानती थी. जब सुधा मूर्ति ने पूछा कि तुम्हारी मां को यह कैसे पता जो सामने से जवाब आया कि वह उस सरला की बेटी है, जिससे सुधा मूर्ति 20 साल पहले साल 2000 में मिली थीं.

कौन है यह सरला...

वाकया साल 2000 का है. सुधा मूर्ति एक सप्ताह के लिए कर्नाटक की ट्रिप पर थीं. वह किसी होटल के बजाय ऐसे व्यक्ति के यहां रुकना चाहती थीं, जिसे वह जानती हों. इसलिए उन्होंने अपनी जान पहचान वाले एक डॉक्टर दंपति के यहां रुकने का फैसला किया. उस वक्त वह दंपति तीर्थयात्रा पर जा रहे थे और उन्होंने सुधा मूर्ति को अपनी भरोसेमंद हाउसकीपर सरला के साथ उनके घर में जब तक मर्जी हो तब तक रहने की पेशकश की थी. उस वक्त सरला की उम्र 30 से 40 के बीच थी, वह एक सड़क एक्सीडेंट में अपने पति को खो चुकी थी. सरला से बातचीत के दौरान सुधा मूर्ति को पता चला कि सरला अपनी बेटी को रिशेप्सनिस्ट बनाना चाहती है. उस वक्त सरला की बेटी स्वप्ना 5 साल की थी. स्वप्ना ही वह लड़की थी, जिसने सुधा मूर्ति को ईमेल भेजा था और फिर इन्फोसिस फाउंडेशन के लिए PPE किट्स की नियमित सप्लायर बन चुकी थी.

जब हकीकत जान भूल गईं अगली मीटिंग

स्वप्ना, सरला की बेटी है, यह जानकर सुधा मूर्ति बेहद खुश हुईं. इतनी ज्यादा कि अपनी अगली मीटिंग के बारे में भूल ही गईं. वह स्वप्ना से और ज्यादा बात करना चाहती थीं, और ज्यादा जानना चाहती थीं. चूंकि स्वप्ना को डिजाइनिंग और चीजें बनाना पंसद था, इसलिए अपने पैशन को फॉलो करते हुए स्वप्ना ने डिजाइनिंग बिजनेस शुरू करने की सोची. जब स्वप्ना को एक यह पता चला कि इन्फोसिस फाउंडेशन को PPE किट्स की जरूरत है तो, उसने सुधा मूर्ति को अप्रोच करने का फैसला किया. जब सुधा मूर्ति ने स्वप्ना से पूछा कि वह सरला की बेटी है, यह बात पहले क्यों नहीं बताई तो स्वप्ना का जवाब था कि वह चाहती थी कि सुधा मूर्ति का फैसला निष्पक्ष हो. वह खुद के दम पर इन्फोसिस फाउंडेशन से ऑर्डर हासिल करना चाहती थी.

फिर सरला से भी हुई मुलाकात

उस दिन स्वप्ना अकेली नहीं आई थी बल्कि अपनी मां सरला को भी साथ लाई थी. लेकिन मां को सुधा मूर्ति से मिलवाने से पहले वह उनकी इजाजत चाहती थी. सरला ऑफिस में ही है, यह जानकर सुधा मूर्ति ने झट से उन्हें केबिन में बुलाने को कहा. सरला से मिलकर सुधा मूर्ति बेहद खुश हुईं. उस वक्त सरला 50 की उम्र पार कर चुकी थी. सुधा मूर्ति को यह जानकर और भी ज्यादा खुशी हुई कि अब सरला ने खुद का कैटरिंग बिजनेस शुरू कर दिया है.

(सुधा मूर्ति बिजनेसवुमन, एजुकेटर, लेखिका और फिलान्थरोपिस्ट होने के साथ-साथ इन्फोसिस फाउंडेशन (Infosys) की चेयरपर्सन भी हैं. यह वाकया [email protected]: Dreams Meet Delivery किताब में सुधा मूर्ति द्वारा लिखे गए अंश से लिया गया है.)