काफी कुछ कहते हैं इस बार के सिविल सर्विसेज परीक्षा के परिणाम

यूपीएससी-2017 के रिजल्ट का आकलन...

भारत की सिविल सर्विसेज परीक्षा में पहली बार दर्ज किये गये उपरोक्त परिर्वतनों को राष्ट्र हित की नूतन बुनावट के रूप में देखा और माना जा रहा है। खास तौर पर इस परीक्षा में अपनी सफलता के झण्डे लहराते पूर्वोत्तर के छात्रों का प्रदर्शन। नतीजों में 25 ऐसे छात्रों का चयन हुआ है, जो पूर्वोत्तर के राज्यों से आते हैं। 

सांकेतिक तस्वीर

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 इसमें एक दर्जन से ज्यादा छात्र तो सिर्फ असम राज्य से हैं। दीगर है कि असम के 16 उम्मीदवारों ने बाजी मारी है तो अरुणाचल प्रदेश के चार और मणिपुर के तीन उम्मीदवार इस बार सिविल सेवा परीक्षा में चयनित हुए हैं। पूर्वोत्तर के छात्रों ने अपनी लगन और मेहनत से इस धारणा को झूठा साबित कर दिया है कि आईएएस-आईपीएस की परीक्षा उनके बूते की बात नहीं है।

भारत की सिविल सर्विसेज परीक्षा, अब वास्तविक अर्थों में अखिल भारतीय स्वरूप को प्राप्त हो रही है। पहले, दक्षिण भारतीय राज्यों फिर, उत्तर भारतीय राज्यों के प्रतिभागियों के दबदबे वाली यह प्रतिष्ठित परीक्षा, अब पूर्वोतर राज्यों के प्रतिभागियों की कामयाबी का भी अध्याय लिख रही है। पूर्वोत्तर ही क्यों, उग्रवाद से अनवरत जूझ रहे कश्मीर के छात्र लगातर कामयाबी दर कामयाबी हासिल कर सिविल सर्विसेज परीक्षा के अखिल भारतीय मायने को वास्तविक मुकाम अता करते नजर आ रहे हैं।

हाल ही में घोषित यूपीएससी सिविल सर्विसेज परीक्षा-2017 के नतीजों के परिणाम देश के बदलते सामाजिक और राजनीतिक परिवेश की नई व्याख्या कर रहे हैं। इस बार मेरिट लिस्ट में शामिल कुल 990 लोगों में 476 कैंडिडेट जनरल कैटेगरी के हैं, 275 ओबीसी, 165 एससी और 74 एसटी श्रेणी के हैं। इस बार के परिणाम अनेक खासियतों के समेटे हुये हैं। जहां आजाद भारत में पहली बार मुस्लिम समुदाय के 51 छात्रों ने सफलता हासिल की वहीं, पूर्वोत्तर राज्यों के कुल 23 उम्मीदवारों ने इस बार इस परीक्षा में सफलता का परचम लहराया। यही नहीं, जम्मू-कश्मीर जैसे उपद्रव और अलगाववाद से ग्रस्त राज्य से भी 15 उम्मीदवारों ने सफलता हासिल की है।

भारत की सिविल सर्विसेज परीक्षा में पहली बार दर्ज किये गये उपरोक्त परिर्वतनों को राष्ट्र हित की नूतन बुनावट के रूप में देखा और माना जा रहा है। खास तौर पर इस परीक्षा में अपनी सफलता के झण्डे लहराते पूर्वोत्तर के छात्रों का प्रदर्शन। नतीजों में 25 ऐसे छात्रों का चयन हुआ है, जो पूर्वोत्तर के राज्यों से आते हैं। इसमें एक दर्जन से ज्यादा छात्र तो सिर्फ असम राज्य से हैं। दीगर है कि असम के 16 उम्मीदवारों ने बाजी मारी है तो अरुणाचल प्रदेश के चार और मणिपुर के तीन उम्मीदवार इस बार सिविल सेवा परीक्षा में चयनित हुए हैं। पूर्वोत्तर के छात्रों ने अपनी लगन और मेहनत से इस धारणा को झूठा साबित कर दिया है कि आईएएस-आईपीएस की परीक्षा उनके बूते की बात नहीं है।

पूर्वोत्तर से इस बार सिविल सेवा परीक्षा में 41वीं रैंक हासिल कर, सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाली असम की बिपाशा कलिता कहती हैं कि 'कड़ी मेहनत, स्मार्ट वर्क, कंसिस्टेंसी और डेडीकेशन के फलस्वरूप ही मुझे यह कामयाबी हासिल हुई है। सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रहे दूसरे छात्रों से मैं कहना चाहूंगी कि वे प्रयास करते रहें, हौसला न छोड़ें। मेहनत और लगन से की गयी कोशिशें हमेशा कामयाब होती हैं। पूर्वोत्तर के परिप्रेक्ष्य में सिविल सर्विसेज परीक्षा को लेकर कलिता कहती हैं, 'निश्चित रूप से देश के दूसरे भागों की तुलना में पूर्वोत्तर में इस परीक्षा को लेकर जागरूकता की कमी रही है, लेकिन अब अधिक से अधिक लोग इस परीक्षा में शामिल हो रहे हैं। इस बार भी सिर्फ असम से 17 लोगों ने परीक्षा पास की है। मैं असम के इतिहास में पहली ऐसी शादीशुदा महिला हूं, जिसने यह परीक्षा पास की। लिहाजा, दूसरी लड़कियों को मैं कहना चाहूंगी कि वे इसके लिए प्रयास करें। जब मैं शादीशुदा होकर इसमें सफल हो सकती हूं, तो वे क्यों नहीं?

बेरोजगारी के साथ-साथ आतंकवाद और अलगाववाद की समस्या झेलने वाले पूर्वोत्तर के राज्य मणिपुर की पूजा इलांग्बम ने बगैर किसी भी तरह की कोचिंग लिए 81वें रैंक के साथ जिस तरह से सफलता हासिल की है, वह आपने आपमें एक मिसाल है। साक्षात्कार के दौरान पूजा से मणिपुर में अलगाववादी संगठनों की समस्या और पड़ोसी राज्य अरुणाचल प्रदेश की जनजातियों के बारे में सवाल पूछे गए। न केवल सवाल पूछे गए, बल्कि आतंकवाद की समस्या के समाधान के लिए पूजा से सलाह भी मांगी गई, जिसके जवाब में उन्होंने कहा कि मणिपुर में चरमपंथियों की समस्या के समाधान के लिए युवाओं को रोजगार मिलना जरूरी हैं। जबकि सरकारी नौकरी तो केवल एक फीसदी लोगों को ही मिलती है, इसलिए उद्यम के साथ युवाओं का कौशल विकास होना चाहिए। मणिपुर में छोटे उद्योगों को बढ़ाने की आवश्कता है। उनका कहना था कि युवाओं को जब तक यह पता नहीं होगा कि आमदनी कैसे करें, तब तक वे विचलित होते रहेंगे।

पूजा बताती हैं, कि दरअसल मैं मणिपुर की परंपरागत हाथ से बनी साड़ी पहनकर इंटरव्यू देने पहुंची थी, शायद मेरी साड़ी पर उनका ध्यान गया और उन्होंने मुझसे मणिपुर और पूर्वोत्तर राज्यों के बारे में कई सवाल पूछे। मुझसे अरुणाचल प्रदेश की जनजातियों के बारे सवाल किए गए। पूजा इलांगबम कहती हैं, 'पहले पूर्वोत्तर के लोगों में सिविल सेवा परीक्षा को लेकर इतनी जागरूकता नहीं थी। अधिकांश माता-पिता अपने बच्चों को डॉक्टर-इंजीनियर बनाने की सोचते थे और इसी के लिए उन्हें बाहर पढ़ाई करने भेजते थे। लेकिन अब उनकी इस सोच में बदलाव आया है। वे अपने बच्चों को यूपीएससी की परीक्षा की तैयारी के लिए भी प्रोत्साहित करने लगे हैं। पूजा खुद की सफलता में भी अपने पिता के योगदान की बात कहती हैं। खास बात यह है कि पूजा ने अपने पहले ही प्रयास में यह परीक्षा उत्तीर्ण कर ली। न कोई कोचिंग और न कोई दूसरे तरह का टेस्ट। बस घर पर ही मन लगाकर पढ़ती रही।

पूर्वोत्तर राज्य के क्षेत्रों के उम्मीदवारों की सफलता के क्रम को सुभोजित भुइयां, जोकि स्वयं चयनित उम्मीदवार हैं, महज संयोग नहीं मानते हैं। सुभोजित कहते हैं, 'यह अचानक नहीं हुआ है। एक लम्बी प्रक्रिया रही है। बहुत सारी चीजें बदली हैं, तब जाकर ऐसे परिणाम मिल रहे हैं। इसमें मैं राज्य सरकार की भूमिका को भी सकारात्मक मानता हूं। सरकार यूपीएससी की प्रारंभिक परीक्षा पास करने वाले छात्रों को सवा लाख रुपये प्रोत्साहन राशि के तौर पर दे रही है ताकि वे आगे की तैयारी अच्छी तरह से कर सकें। साथ ही गुवाहाटी विश्वविद्यालय और असम एडमिनिस्ट्रेटिव स्टाफ कॉलेज में कोचिंग की व्यवस्था की जाती है। इसके अलावा अच्छे नतीजों से लोगों में भी इसे लेकर जागरूकता और गंभीरता आयी है।

दरअसल, इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता है कि दिल्ली के बरक्स पूर्वोत्तर राज्यों में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी लायक वातावरण नहीं है। संसाधनहीनता, अध्ययन सामग्री की अनु-उपलब्धता, सटीक मार्गदर्शन का अभाव जैसे अनेक बिंदु हैं, जो पूर्वोत्तर राज्यों के प्रतिभागियों की प्रत्याशिता को कमजोर करते हैं। हालांकि वक्त के साथ अब हालात में बदलाव देखे जा रहे हैं। असम में ही कई बड़े कोचिंग संस्थान हाल के वर्षों में खुले हैं। यही नहीं, पिछले दिनों दिल्ली बेस्ड आईएएस कोचिंग संस्थान, एएलएस और हेल्पिंग हैंड्स एनजीओ ने वर्ष 2018-19 के लिए पूर्वोत्तर के छात्रों को 2.2 करोड़ रुपये की सहायता देने की घोषणा की है। ये पैसे उन गरीब और प्रतिभाशाली स्नातक छात्रों को दिये जाएंगे, जो यूपीएससी परीक्षा के लिए कोचिंग करना चाहते हैं। बाकायदा इसके लिए उन छात्रों से आवेदन भी लिये गये ताकि उनमें से वाजिब छात्रों का चयन किया जा सके।

कुछ ऐसी ही बदलाव की बयार कश्मीर की फिजाओं में भी महसूस की जा रही है। आतंक और हिंसा की घटनाओं के साथ-साथ सियासी और सामाजिक तनाव झेलने वाले जम्मू-कश्मीर से भी इस बार 15 उम्मीदवारों का चयन हुआ है। ज्ञात हो कि पिछले वर्ष 14 उम्मीदवारों को कामयाबी हासिल हुई थी। हर साल सफलता में होता इजाफा आतंक के मुकाबले 'उम्मीद की जीत का ऐलान कर रहा है। पत्थरबाजों और अलगाववादियों के मध्य से निकले ये 15 होनहार, कश्मीरी युवाओं को सकारात्मक राह चुनने के लिये प्रेरित करेंगे। ये ब्रांड एम्बेस्डर होंगे हिंसा के बरक्स शांति के, अलगाववाद के मुकाबले एकता के, विध्वंस के मुकाबले सृजन के।

जम्मू-कश्मीर से 15 उम्मीदवारों ने 2017 की सिविल सेवा परीक्षा में सफलता हासिल की है, जिनमें श्रीनगर के फजलुल हसीब सबसे ऊपर हैं जिन्हें देशभर की रैंकिंग में 36वां स्थान मिला है। शिक्षा को विकास के लिए एक जरूरी तत्व मानने वाले हसीब कहते हैं कि मैं ये नहीं कहता कि शिक्षा से सारे मसले हल हो जाएंगे, पर शिक्षा के जरिए समस्याओं का हल ढूंढा जा सकता है। अगर उलझी हुई स्थिति भी हो तो वहां शिक्षा पर ध्यान देना जरूरी होता है। शिक्षा का कोई मुकाबला नहीं है। बच्चों को चाहिए कि वह हर हाल में शिक्षा हासिल करें।

खैर, जिस तरह से पूर्वोतर और कश्मीर के पिछड़े और अशांत इलाकों में छात्रों के मध्य सिविल सेवा परीक्षा का क्रेज बढ़ा है, वह भारत की प्रशासनिक एकात्मता के लिये सुखद संकेत हैं। वह समय भी दूर नहीं कि जब देश की सबसे बड़ी रियासत उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ का जिलाधिकारी असमी तो उन्नाव का पुलिस अधीक्षक कश्मीरी होगा। पहलगाम का कलेक्टर बिहार से तो दिसपुर का पुलिस कप्तान गुजरात से होगा। और यह स्थिति भारत की अखण्डता के लिये प्राण वायु का कार्य करेगी। जब भिन्न-भिन्न क्षेत्रों, संस्कृतियों और पृष्ठभूमि के विचारों वाले लोग प्रशासनिक सेवाओं में आयेंगे तो निश्चित रूप से तमाम पूर्वाग्रह दरकेंगे। प्रशासनिक महकमों में व्याप्त सांस्कृतिक सीखचें भी टूटेंगी। मेलमिलाप बढ़ेगा और तब न कोई अभारतीय लगेगा और न ही अविश्सनीय।

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