बधिरों के लिए नई ज़िंदगी का नाम "मिरकल कुरियर"

By Ashutosh khantwal
April 02, 2015, Updated on : Thu Sep 05 2019 07:20:58 GMT+0000
बधिरों के लिए नई ज़िंदगी का नाम "मिरकल कुरियर"
ध्रुव लाकरा ने दिया बधिरों को रोज़गार और सम्मान से जीने का हक़ "मिरकल कुरियर" यानी समाजसेवा के साथ-साथ मुनाफा भीकंपनी में कुल 68 लोग कार्यरत हैं जिनमें 64 मूक और बधिर हैंकुरियर कंपनी साल में 65 हज़ार से ज्यादा डिलेवरी करती है
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छाता बारिश तो नहीं रोक सकता परंतु बारिश में खड़े रहने की हिम्मत जरूर दे सकता है। जी हां, दुनिया में हिम्मत ही वह बल है जो हमें डटकर खड़े रहने की प्रेरणा देता है। हिम्मत के बल पर ही हम दूसरों के लिए कुछ करने का जज्बा रखते हैं। ऐसे ही एक व्यक्ति हैं ध्रुव लाकरा, जिन्होंने अपनी हिम्मत के बल पर यह ठान लिया कि अब वह गरीब विकलांग लोगों के जीवन में नई रोशनी लाएंगे। उन्हें रोजगार देकर उनके परिवारों की मदद करेंगे। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से एमबीए करने के बाद जहां एक सुनहरा भविष्य उनकी राह देख रहा था वहीं उन्होंने एक सामाजिक उद्यमी बनकर समाज के साथ-साथ अपने लिए भी एक रोजगार की संभावना को भी खड़ा किया।

ध्रुव लाकरा, संस्थापक

ध्रुव लाकरा, संस्थापक


ध्रुव ने एक कुरियर कंपनी 'मिरेकल कुरियर' की नींव रखी यह भारत की पहली ऐसी कुरियर कंपनी है जहां काम करने वाले सारे कर्मचारी बधिर हैं यानी सुन नहीं सकते। ध्रुव, मुंबई के रहने वाले हैं। मुंबई यूनिवर्सिटी से स्नातक करने के बाद उन्होंने इंवेस्टमेंट बैंकर के रूप में काम करना शुरू किया। सुबह-सुबह ऑफिस जाना फिर देर रात घर लौटना यही उनकी दिनचर्या बन गई थी। लेकिन दिल में कुछ करने की इच्छा थी जो इस नौकरी में रहकर वे पूरी नहीं कर पा रहे थे। इसके बाद वे तमिलनाडु चले गए और वहां के मछुवारों की कार्यशैली को काफी करीब से देखने और समझने लगे। उन्होंने महसूस किया कि यदि छोटे से काम को भी सुव्यवस्थित ढंग से किया जाए तो कठिन से कठिन काम भी आसानी से हो जाता है। सन् 2004 की सुनामी के बाद जो राहत कार्य चले ध्रुव ने भी उनमें अपना पूरा सहयोग दिया। और मन में ठान लिया कि भविष्य में वे कुछ ऐसा कार्य जरूर करेंगे जिसमें धन अर्जन के साथ कुछ सामाजिक सेवा भी की जा सके।

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इसके बाद ध्रुव ने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी का रुख किया जहां उन्होंने सामाजिक उद्यमिता में एमबीए किया। ऑक्सफोर्ड में पढ़ते वक्त ध्रुव को काफी कुछ सीखने को मिला। वे विभिन्न देशों से आए छात्रों से मिले, उनके देश की समस्याओं और वहां की जीवन शैली को जाना। एमबीए के बाद ध्रुव मुंबई लौट आए। एक दिन मुंबई में बस में सफर के दौरान एक व्यक्ति उनके बगल में बैठा था जो काफी व्याकुल लग रहा था। कभी खिड़की से बाहर देखता तो कभी इधर-उधर देखने लगता। ध्रुव ने उससे उसकी परेशानी का कारण पूछना चाहा लेकिन वो कुछ नहीं बोला। बाद में ध्रुव को पता चला की वह लड़का गूंगा और बहरा है। इस घटना के बाद ध्रुव ने तय किया कि वह इस तरह के शारीरिक रूप से अक्षम लोगों के लिए जरूर कुछ करेंगे। पर ध्रुव के सामने एक समस्या थी कि आखिर वो ऐसा क्या करें जिसमें शारीरिक रूप से अक्षम लोग भी जुड़ सकें और काम में मुनाफा भी हो। ध्रुव ने काफी सोच विचार के बाद तय किया कि वे कुरियर कंपनी खोलेंगे। इस प्रकार शुरुआत हुई मिरेकल कुरियर की।

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ध्रुव ने बधिर लोगों को ट्रेनिंग देना शुरू किया और तय किया कि यहां सारे कर्मचारी बधिर ही रखे जाएंगे। कार्य कठिन था लेकिन ध्रुव के इरादे पक्के थे फिर तय हुआ कि महिलाओं को ऑफिस कार्यों में जैसे डाटा एंट्री, ट्रैकिंग और फाइलिंग में लगाया जाए और पुरुषों को खतों के वितरण कार्यों में। कार्य इतने सुव्यवस्थित तरीके से किया जाने लगा कि कहीं भी किसी भी प्रकार की दिक्कत उत्पन्न नहीं हुई। बड़ी बात यह है कि आजतक एक भी कुरियर गलत पते पर नहीं पहुंचा।

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मिरकल कुरियर में 68 लोगों की टीम है। जिसमें चार लोग मैनेजमेंट के कार्यों में लगे हैं बाकि सब वो लोग हैं जो बोल नहीं सकते। फील्ड में 44 पुरुष काम करते हैं जो मुंबई की सड़कों और गलियों में घूम-घूमकर लोगों के खतों को सही पतों तक पहुंचाते हैं। ये सभी लोग गरीब घरों से हैं और ऐसे में मुंबई जैसे महानगर में नौकरी मिलना बहुत बड़ी बात है। इस नौकरी से इन लोगों की पारिवारिक स्थिति सुधरी है।

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भारत में लगभग 80 लाख बधिर हैं, जिसमें से ज्यादातर लोग मुख्यधारा से अलग हैं। ऐसे में एक व्यक्ति का आगे आकर इन लोगों को मुख्य धारा से जोडऩा सच में एक बड़ा प्रशंसनीय कार्य है। मिरकल कुरियर प्रतिमाह 65 हजार से ज्यादा कुरियर की डिलीवरी कर रहा है। कंपनी मुनाफे में चल रही है। ये एक फॉर प्रॉफिट ऑर्गनाइजेशन है जो प्रॉफिट के साथ-साथ सामाजिक कार्य भी कर रहा है।

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