कौन थीं वे 15 महिलाएं, जिन्‍होंने बनाया था आजाद भारत का संविधान

By yourstory हिन्दी
January 26, 2023, Updated on : Mon Jan 30 2023 14:01:01 GMT+0000
कौन थीं वे 15 महिलाएं, जिन्‍होंने बनाया था आजाद भारत का संविधान
389 सदस्‍यों वाली भारतीय संविधान सभा में देश के अलग-अलग राज्‍यों और समुदायों से आईं 15 महिलाएं भी थीं.
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आज 26 जनवरी का दिन गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाता है. आज ही के दिन ही आजाद भारत का संविधान लागू हुआ था. जहां बाकी दुनिया में महिलाओं को वोट देने जैसे बुनियादी नागरिक अधिकार को पाने के लिए लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी थी, वहीं भारत में महिलाओं को न सिर्फ आजादी के साथ यह अधिकार दिया गया, बल्कि भारतीय संविधान के निर्माण में महिलाओं की महत्‍वपूर्ण ऐतिहासिक भूमिका रही है.


भारतीय संविधान निर्माण सभा में कुल 389 सदस्‍य थे, जो देश के विभिन्‍न समुदायों, संप्रदायों और भौगोलिक हिस्‍सों से ताल्‍लुक रखते थे. इस संविधान निर्माण सभा में 15 महिलाएं भी थीं. इन महिलाओं का नाम सिर्फ कागज पर नहीं लिखा था, बल्कि संविधान को ड्राफ्ट करने की प्रक्रिया में इन्‍होंने महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई थी. संविधान सभा की बहसों और विमर्शों में हिस्‍सा लिया था.

आइए जानते हैं कि वह 15 महिलाएं कौन थीं.

अम्मू स्वामीनाथन

अम्मु स्वामीनाथन का जन्‍म 22 अप्रैल 1894 को केरल के पालाघाट में हुआ था. अम्‍मू भारतीय स्वतंत्रता सेनानी, सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता और भारत की संविधान सभा के सदस्यों में से एक थीं.


अम्‍मू के पिता गोविंद मेनन एक मामूली स्थानीय अधिकारी थे. अम्मू कभी स्कूल नहीं गई और घर पर ही थोड़ी शिक्षा प्राप्‍त की. बहुत कम उम्र में ही उनका विवाह मद्रास के जाने-माने वकील सुब्बाराम स्वामीनाथन से हो गया. अम्‍मू ने शादी के बाद ही विधिवत पढ़ाई की और अंग्रेजी सीखी. बाद में अम्‍मू आजादी की लड़ाई से जुड़ गईं और महात्मा गांधी की अनुयायी बन गईं.  


1952 में आजाद भारत के पहले संसदीय चुनावों में अम्मू स्वामीनाथन ने  तमिलनाडु की डिंडीगुल संसदीय सीट से चुनाव लड़ा और जीतकर संसद पहुंचीं. प्रसिद्ध नृत्‍यांगना मृणालिनी साराभाई और आजाद हिंद फौज की कैप्‍टन लक्ष्मी सहगल अम्‍मू स्‍वामीनाथन की

बेटियां थीं.

15 indian women leaders who contributed in making of the indian constitution

सरोजनी नायडू

13 फरवरी, 1879 को हैदराबाद में जन्‍मी सरोजनी नायडू स्‍वतंत्रता संग्राम सेनानी होने के साथ महिला अधिकार आंदालन की भी अगुआ नेता थीं. सरोजनी के पिता अघोरनाथ चट्टोपाध्याय नामी विद्वान थे और उनकी मां भी बांग्ला में कविताएं लिखा करती थीं.  

सरोजनी पढ़ने में बहुत मेधावी थीं. शायद यही कारण था कि उन्‍होंने 12 साल की उम्र में ही 12वीं की परीक्षा पास कर ली थी. हैदराबाद के निज़ाम ने आर्थिक मदद कर उन्‍हें पढ़ने के लिए लंदन के किंग्स कॉलेज और फिर कैम्ब्रिज के गिरटन कॉलेज भेजा था.

लंदन में ही गांधी से उनकी पहली मुलाकात हुई थी और उसके वह सबकुछ छोड़ आजादी की लड़ाई में सक्रिय हो गईं. 1925 में उन्‍हें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया. सरोजनी आजाद भारत की पहली महिला राज्‍यपाल थीं, जिन्‍हें उत्‍तर प्रदेश का गवर्नर बनाया गया था.   

राजकुमारी अमृत कौर

15 अगस्‍त,1947 की रात 200 सालों की लंबी गुलामी के बाद देश आजाद हुआ और आजाद मुल्‍क की पहली कैबिनेट का गठन हुआ. इस कैबिनेट में देश के सभी संप्रदायों और समुदायों के व्‍यक्तियों का प्रतिनिधित्‍व था. देश की पहली कैबिनेट में एक महिला को भी स्‍थान दिया गया और इस तरह राजकुमारी अमृत कौर को देश की पहली कैबिनेट मंत्री बनने का गौरव हासिल हुआ. उन्‍होंने स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री का पद संभाला था.   


अमृत कौर जन्‍म 2 फरवरी, 1887 को उत्‍तर प्रदेश के लखनऊ में हुआ था. पिता राजा हरनाम सिंह अहलूवालिया कपूरथला के राजा रणणीर सिंह के छोटे बेटे थे. उत्‍तराधिकार को लेकर घर में हुए विवाद के चलते हरनाम सिंह ने पिता का घर छोड़ दिया और ईसाई हो गए. बाद में उन्‍होंने बंगाल के गोकुलनाथ चैटर्जी की बेटी प्रिसिला से शादी की. गोकुलनाथ चैटर्जी बंगाल के मिशनरी थे और उन्‍हीं की प्रेरणा से हरनाम सिंह भी ईसाई हुए थे. हरनाम और प्रिसिला के 10 बच्‍चे हुए. 10 बच्‍चों में सबसे छोटी और इकलौती लड़की अमृत थी.


अमृत की पूरी परवरिश इसाई धर्म के प्रभाव में और अंग्रेज तौर-तरीकों से हुई थी. स्‍कूली शिक्षा इंग्‍लैंड के सेरबॉर्न स्‍कूल ऑफ गर्ल्‍स से हुई और कॉलेज की पढ़ाई ऑक्‍सफोर्ड से. 1918 में पढ़ाई पूरी कर अमृत हिंदुस्‍तान लौट आईं.  


आजाद भारत की पहली कैबिनेट मंत्री, पहली स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री होने के साथ-साथ मौजूदा एम्‍स के निर्माण में भी उनकी महत्‍वपूर्ण भूमिका है. हिमाचल प्रदेश अमृत कौर के पास पैतृक संपत्ति और घर था, जिसे उन्‍होंने मरने से पहले एम्‍स को दान कर दिया था. 

विजयलक्ष्मी पंडित

1953 में संयुक्त राष्ट्र महासभा के 8वें सत्र के लिए अध्यक्ष चुनी गई विजयलक्ष्‍मी पंडित इस पद पर बैठने वाली पहली महिला थीं. उनके जीवन की अन्‍य उपलब्धियों में यह भी श‍ामिल है कि वह कैबिनेट मंत्री बनने वाली भारत की पहली महिला थीं. 1937 में वह संयुक्त प्रांत की प्रांतीय विधानसभा के लिए निर्वाचित हुईं थीं और स्थानीय स्वशासन और सार्वजनिक स्वास्थ्य मंत्री के पद पर नियुक्त की गईं.


1946-50 तक वह भारतीय संविधान सभा की सदस्य रहीं. वह आपातकाल के समय इंदिरा गांधी के खिलाफ आवाज उठाने और विरोध में जनता दल पार्टी ज्‍वाइन करने वाली कांग्रेस परिवार की इकलौती महिला थीं.


विजयलक्ष्‍मी का जन्‍म 18 अगस्त, 1900 को इलाहाबाद के एक प्रसिद्ध परिवार में हुआ. पिता मोतीलाल नेहरू वकील थे. विजयलक्ष्‍मी तीसरी संतान थीं. विजयलक्ष्‍मी देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की छोटी बहन थीं. 

पूर्णिमा बनर्जी

पूर्णिमा बनर्जी भारतीय स्वतंत्रता सेनानी और संविधान सभा की महिला सदस्‍यों में से एक थीं. उनका जन्‍म 1911 में पंजाब के कालका में हुआ था. पिता का नाम उपेन्द्रनाथ गांगुली और मां का नाम अम्बालिका देवी था.


उन्‍होंने अपना पूरा जीवन ट्रेड यूनियनों और मजदूर-किसान संगठनों को समर्पित कर दिया था. वह इलाहाबाद में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस समिति क सचिव भी बनीं. 1930 में दांडी मार्च और 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में शिरकत की और जेल गईं.


उपेन्द्रनाथ गांगुली का पूरा परिवार ही स्‍वतंत्रता और क्रांति के काम में लगा हुआ था. महान् स्वतंत्रता सेनानी अरुणा आसफ अली पूर्णिमा बनर्जी की बड़ी बहन थीं.

सुचेता कृपलानी

सुचेता कृपलानी के जन्‍म का नाम सुचेता मजूमदार था. 25 जून, 1908 को हरियाणा के अंबाला शहर में रह रहे एक संपन्‍न बंगाली ब्राह्मण परिवार में उनका जन्‍म हुआ. पिता सरकारी डॉक्‍टर थे. हर साल दो साल में उनका तबादला होता रहता. सो उनकी शुरुआती शिक्षा कई शहरों में हुई. कॉलेज की पढ़ाई उन्‍होंने दिल्‍ली से की. सेंट स्टीफेंस कॉलेज से इतिहास में ग्रेजुएट हुईं.


यह आजादी की लड़ाई का वक्‍त था. चारों ओर जोश और उम्‍मीद का आलम था. ऐसे में सुचेता उस प्रवाह में बहने से खुद को कैसे रोक सकती थीं. दिल्‍ली में पढ़ाई के दौरान भी कॉलेज से अकसर वो किसी राजनीतिक सभा-सम्‍मेलन में शिरकत करने पहुंच जातीं. कभी गांधी, कभी, नेहरू, कभी पटेल, कोई न कोई राजनीतिक हलचल शहर में होती ही रहती थी. वो पूरा मन बना चुकी थीं कि कॉलेज के बाद पूरी तरह आजादी की लड़ाई में शामिल हो जाएंगी, लेकिन तभी उनके घर में एक बड़ी ट्रेजेडी हो गई. एक के बाद एक घर में पिता और बहन दोनों का इंतकाल हो गया. घर की जिम्‍मेदारी अचानक सुचेता के कंधों पर आ पड़ी. परिवार चलाने के लिए उन्‍होंने आंदोलन का ख्‍याल छोड़ बनारस हिंदू विश्‍वविद्यालय में नौकरी कर ली. वो बीएचयू में संवैधानिक इतिहास की लेक्‍चरर हो गईं.


1940 में सुचेता कृपलानी ने कांग्रेस की महिला विंग की शुरुआत की थी.  1946 में उन्‍हें संविधान सभा का सदस्य चुना गया. 1962 में आजाद भारत में कृपलानी ने उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव लड़ा और जीत गईं. उन्हें श्रम, सामुदायिक विकास और उद्योग विभाग का कैबिनेट मंत्री बनाया गया. एक साल बाद 1963 में वह उत्‍तर प्रदेश की मुख्‍यमंत्री बनीं. वह आजाद भारत की पहली महिला मुख्‍यमंत्री थीं.

बेगम एजाज़ रसूल

बेगम क़दसिया ऐज़ाज़ रसूल संविधान सभा में एकमात्र मुस्लिम महिला सदस्‍य थीं. बेगम रसूल का जन्म 2 अप्रैल 1909 को हुआ था. उनके पिता सर जुल्फिकार अली खान पंजाब में मलेरकोटला की रियासत से ताल्‍लुक रखते थे.  


बेगम रसूल मुस्लिम लीग के सदस्यों में से एक थीं. 1950 में मुस्लिम लीग भंग होने पर वह कांग्रेस में शामिल हो गयीं. खुद जमींदार परिवार से आने के बावजूद उन्‍होंने जमींदारी उन्मूलन का समर्थन किया था. साथ ही उन्‍होंने धर्म के आधार पर अलग निर्वाचक मंडल की मांग का भी विरोध किया था.


वह 1952 में राज्यसभा सदस्‍य चुनी गईं. 1969 से लेकर 1971 तक समाज कल्याण और अल्पसंख्यक मंत्री रहीं. 2000 में उन्‍हें भारत सरकार ने पद्म भूषण से सम्मानित किया. वह 20 साल तक भारतीय महिला हॉकी महासंघ की अध्यक्ष और एशियाई महिला हॉकी महासंघ की अध्यक्ष भी रहीं. भारतीय महिला हॉकी कप का नाम उनके नाम पर रखा गया है.  

कमला चौधरी

कमला चौधरी संविधान सभा की 15 महिला सदस्‍यों में से एक थीं. उनका जन्म 22 फरवरी, 1908 को लखनऊ में हुआ था. उनके पिता राय मनमोहन दयाल डिप्टी कलेक्टर और नाना 1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम के समय लखनऊ में स्वतंत्र अवध सेना के कमांडर थे.


कमला चौधरी ने आजादी की लड़ाई में हिस्‍सा लिया और 1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन के समय कांग्रेस में शामिल हो गईं. वह उत्तर प्रदेश राज्य समाज कल्याण सलाहकार बोर्ड की सदस्य भी थीं. 1962 में कमला चौधरी उत्तर प्रदेश की हापुड़ सीट से कांग्रेस पार्टी से चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचीं. राजनीतिज्ञ होने के साथ-साथ वह लेखिका भी थीं.  

लीला रॉय

लीला रॉय का जन्‍म 2 अक्टूबर, 1900  को असम के गोलपाड़ा में हुआ था. पिता गिरीश चंद्र नाग डिप्टी मजिस्ट्रेट थे और आजादी की लड़ाई से जुड़े हुए थे. लीला खुद वामपंथी विचारधारा से ताल्‍लुक रखने वाली राजनीतिज्ञ और समाज सुधारक थीं. वह नेताजी सुभाष चंद्र बोस की करीबी सहयोगी भी थीं. उनकी मां कुंजलता नाग ढाका विश्वविद्यालय की पहली महिला छात्रा थीं.

हंसा जीवराज मेहता

हंसा जीवराज मेहता का जन्‍म 3 जुलाई, 1897 गुजरात के एक ब्राम्‍हण परिवार में हुआ था. उनके पिता मनुभाई मेहता बड़ौदा और बीकानेर रियासतों के दीवान थे. उन्‍होंने इंग्‍लैंड से पत्रकारिता और समाजशास्त्र की पढ़ाई की थी. 1949 से 1958 तक वह बड़ौदा यूनिवर्सिटी की वाइस चांसलर भी रहीं. वह एक सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षाविद्, स्वतंत्रता सेनानी, फेमिनिस्‍ट और राइटर थीं.  

रेणुका रे

रेणुका रे आईसीएस अधिकारी सतीश चंद्र मुखर्जी की बेटी थीं. उनके दादा-दादी कलकत्‍ता के बहुत प्रसिद्ध और प्रतिष्ठित लोग थे. दादा पी. के. रॉय ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से डी. फिल करने वाले पहले भारतीय और प्रतिष्ठित प्रेसीडेंसी कॉलेज, कलकत्ता के पहले भारतीय प्राचार्य थे. दादी सरला रॉय समाज सेविका थीं. 16 साल की उम्र से गांधी से प्रभावित होकर उन्‍होंने कॉलेज छोड़ दिया और आजादी की लड़ाई में कूद पड़ीं. बाद में माता-पिता के आग्रह और गांधी के कहने पर उन्‍होंने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से बीए की पढ़ाई पूरी करने के लिए हामी भर दी. संविधान सभा की सदस्‍य होने के साथ-साथ वह 1952 से 1957 तक पश्चिम बंगाल में राहत और पुनर्वास मंत्री रहीं. फिर वह 1962 में मालदा से लोकसभा सांसद भी चुनी गईं.

दुर्गाबाई देशमुख

वर्ष 1909 में आंध्र प्रदेश में जन्‍मी दुर्गाबाई देशमुख स्वतंत्रता सेनानी और सामाजिक कार्यकर्ता थीं. वह स्वतंत्र भारत के पहले वित्तमंत्री चिंतामणराव देशमुख की पत्नी भी थीं. दुर्गाबाई देशमुख वर्ष 1958 में भारत सरकार द्वारा स्थापित राष्ट्रीय महिला शिक्षा परिषद की पहली अध्यक्ष बनीं. 1959 में उनके नेतृत्‍व में समिति ने जो सिफारिशें दी थीं, उनमें उन्‍होंने कहा था कि केंद्र और राज्य सरकारों को लड़कियों की शिक्षा को प्राथमिकता देनी चाहिए. केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय में एक महिला शिक्षा विभाग बनाया जाना चाहिए और लड़कियों की उचित शिक्षा के लिए हर राज्य में महिला शिक्षा निदेशक की नियुक्ति की जानी चाहिए.

मालती चौधरी

मालती चौधरी का जन्म 1904 में पूर्वी बंगाल (जो अब बांग्लादेश है) में हुआ था. 16 साल की उम्र में ही वह शांति निकेतन पढ़ने चली गईं, जहां उन्‍हें गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर समेत कई सारे स्‍वतंत्रता संग्राम सेनानियों को करीब से देखने, उनकी बातें सुनने और उनसे ज्ञान हासिल करने का मौका मिला. उनके पति नाबकृष्ण चौधरी ओडिशा के मुख्यमंत्री थे.  

एनी मास्कारेन

1902 में केरल के तिरुवनंतपुरम में जन्‍मी एनी के पिता त्रावणकोर राज्य में अधिकारी थे. एनी ने तिरुवनंतपुरम के महाराजा कॉलेज से इतिहास और अर्थशास्त्र में डबल एमए किया था. इसके बाद कुछ समय श्रीलंका में पढ़ाने के बाद उन्‍होंने केरल लौटकर कानून की डिग्री भी पूरी की.  


एनी मास्कारेन 1951 में केरल के तिरुवनंतपुरम से पहली महिला लोकसभा सांसद चुनी गईं.


  

दक्षिणायनी वेलायुधन

वेलायुधन महज 34 साल की उम्र में चुनी गई संविधान निर्माण समिति की सबसे कम उम्र की सदस्य थीं. वह संविधान सभा के लिए चुनी गई एकमात्र दलित महिला भी थीं.  


Edited by Manisha Pandey