25 साल का युवा शहद निकालने वाले आदिवासियों को बना रहा आत्मनिर्भर

By yourstory हिन्दी
January 08, 2019, Updated on : Thu Sep 05 2019 07:20:58 GMT+0000
25 साल का युवा शहद निकालने वाले आदिवासियों को बना रहा आत्मनिर्भर
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चैतन्य



पश्चिमी घाट के घने जंगलों में उगने वाले विभिन्न प्रकार के जंगली फल और फूल पालतू और जंगली, दोनों ही प्रकार की मधुमक्खियों को पराग और मकरंद प्रदान करती हैं। मधुमक्खियों द्वारा की जाने वाली परागण की प्रक्रिया बदले में इन फसलों की पैदावार को बढ़ाती है। 1985 से पूर्व तक मधुमक्खी पालन का काम स्थानीय आदिवासियों के लिये व्यवसाय का एक शानदार विकल्प था और पश्चिमी घाट करीब 7.5 लाख किलो शहद और 6,000 किलोग्राम मधुमक्खी के मोम के उत्पादन के साथ पूरे भारतवर्ष में शीर्ष स्थान पर था। हालांकि कभी क्षेत्र में समृद्धि लाने वाला यह व्यवसाय थाई सैक्ब्रूड वायरस की चपेट में आ गया जिसने इस उद्योग को हमेशा के लिये प्रभावित किया।


इस स्थिति ने कोल्हापुर के रहने वाले चैतन्य पोवार को कुछ अलग करने की प्रेरणा दी और उन्होंने ऑक्टोरम सॉल्यूशंस की नींव रखी। लाभ के लिये काम करने वाला यह चिरस्थाई उद्यम स्थानीय जनजातियों के साथ काम करता है और जंगलों से प्राप्त होने वाले विभिन्न कार्बनिक उत्पादों के संग्रहण, शुद्धिकरण, प्रसंस्करण और बिक्री करता है। 


हालांकि चैतन्य ने वर्ष 2013 में स्नातक की पढ़ाई करने के दौरान ही आदिवासी किसानों के साथ काम करना प्रारंभ कर दिया था, उन्होंने औपचारिक रूप से इस स्टार्टअप की स्थापना वर्ष 2017 में की। 2 गांवों और 35 परिवारों के साथ काम करने से शुरुआत करने वाले इस सामाजिक उद्यम ने इतने कम समय में इस आंकड़े को बढ़ाकर नौ गांवों और 257 परिवारों तक पहुंचा दिया है।


शुरू में उन्होंने चुनौतियों के बारे में पता लगाना शुरू किया। वे कहते हैं, 'बाजार की जानकारी, नवीन प्रौद्योगिकी, बुनियादी ढांचे, बाजार से जुड़ाव जैसी मूलभूत चीजों का अभाव और इसके अलावा शहद की गुणवत्ता को बनाए रखने में विफल रहना मधुमक्खी पालन के काम में लगे आदिवासियों के लिये सबसे बड़ी चुनौती थी।'


आखिरकार वर्ष 2000 में राज्य और केंद्र सरकार को मधुमक्खी पालकों की सुध आई और उनके द्वारा मधुमक्खी पालन से जुड़ी गतिविधियों को पुर्नजीवित करने ओर बढ़ावा देने के लिये कई योजनाएं शुरू की गईं। ऑक्टोरम साॅल्यूशंस का प्रमुख उद्देश्य पश्चिमी घाट के स्वदेशी जनजाति समुदायों को सशक्त बनाना और उन्हें शहद के उत्पादन से इतर मधुमक्खी पालन की विभिन्न गतिविधियों में शामिल करते हुए स्थाई आजीविका का एक साधन उपलब्ध करवाना है। 25 वर्षीय युवा आगे कहते हैं, 'हम आदिवासियों को उद्यमी और ऑक्टोरम को उद्यम के रूप में देखते हैं।'


प्रारंभ

सरकारी कार्यपालकों के परिवार से ताल्लुक रचाने वाले चैतन्य प्रारंभ से ही एक प्रभाव पैदा करना और ग्रामीण कल्याण के लिये काम करना चाहते थे। स्कूल के दिनों से ही उनका झुकाव यूपीएससी की परीक्षाओं की तैयारी करने के बजाय उद्यमिता की दिशा में काम करता था। वर्ष 2010 में मात्र 17 वर्ष की आयु में चैतन्य ने कोल्हापुरी चप्पलों को बेचने के जरिये अपने उद्यमिता जीवन की शुरुआत की। सुबह की सैर करने के दौरान उनका सामना ऐसे कामगारों से होता था जो कम मांग होने के चलते हाथ से बनी चप्पलें काफी कम कीमत पर बेचने को मजबूर थे।


चैतन्य कहते हैं, 'उस समय तक मुझे व्यापार का ककहरा भी नहीं पता था लेकिन मेरे पास विचार था। उन कोल्हापुरी चप्पलों के डिजाइन काफी जटिल थे और मुझे इस बात का पूरा भरोसा था कि शहर के बाहर के लोग इनमें काफी दिलचस्पी दिखाएंगे। इसके चलते मैंने अधिक से अधिक उपभोक्ताओं तक पहुंच बनाने के लिये इन चप्पलों को ऑनलाइन बेचना शुरू किया। मैंने चप्पल बनाने वाले कुछ अन्य कारीगरों को अपने साथ जोड़ा और एक नेटवर्क खड़ा किया।'

चैतन्य अपनी टीम के साथ




हालांकि शुरुआत में चैतन्य को सफलता मिली लेकिन यह स्थाई नहीं रही क्योंकि पहले तो उनकी पहुंच चप्पलों को बनाने वाले कुशल कारीगरों के समूह तक नहीं थी जिसके चलते वे मिलने वाले बड़े ऑर्डरों को पूरा करने में असफल रहे। इसके अलावा व्यवसाय के चलते उनकी पढ़ाई भी प्रभावित होने लगी। इसके चलते उन्होंने कुछ ही महीनों में दुकान का शटर गिरा दिया। हालांकि चैतन्य मानते हैं कि यही असफलता ऑक्टोरम के लिये प्रारंभिक कदम साबित हुई।


इंस्टीट्यूट ऑफ रूरल मैनेजमेंट आनंद में पढ़ाई के दौरान, चैतन्य के एक दोस्त ने पश्चिमी घाट में शहद संग्रह करने के काम में लगे आदिवासी समुदाय की सहायता के लिए उनकी मदद मांगी। इस दौरान जब उन्होंने वन क्षेत्र की यात्रा की और जंगलों से प्राकृतिक शहद को इकट्ठा करने, संसाधित करने और बेचने के लिए जनजातियों के साथ काम करना शुरू किया, तो उनका ध्यान इस आरे गया कि उनके द्वारा एकत्र किया गया शहद जल्दी खराब हो जाता है।


असर में ऐसा इसलिये होता था क्योंकि आदिवासी शहद निकालने और उसे जमा करने के लिये सदियों पुराने तौर-तरीकों का इस्तेमाल करते थे। इसके चलते न सिर्फ इनकी उच्च गुणवत्त वाले शहद का उत्पादन करने की क्षमता ही प्रभावित होती थी बल्कि मधुमक्खियों के छत्ते पूरी तरह से नष्ट हो जाते थे जिसके चलते जंगलों पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता था। इसके अलावा असुरक्षित संग्रह न सिर्फ संग्रहकों के जीवन के लिये काफी जोखिम भरा होता था जबकि अकुशल निष्कर्षण विधि के चलते उत्पादित होने वाला शहद भी काफी खराब गुणवत्ता वाला होता था।


वे आगे कहते हैं, 'पश्चिमी घाट के घने जंगल का घनत्व न सिर्फ कम ही हो गया है बल्कि स्थानीय जनजातियों की आजीविका पर भी खतरे के बादल मंडरा रहे हैं और इसके अलावा शहद इकट्ठा करने का तरीका बिखरा हुआ और अत्याधिक हानिकारक बना हुआ है। पारंपरिक तरीकों से इकट्ठे किये जाने वाले शहद में काफी अधिक नमी, मोम और अन्य अशुद्धियां मौजूद होती हैं।'


इसके बाद चैतन्य ने प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करते हुए शहर निकालने के सुरक्षित तरीके खोजने शुरू किये जिनके चलते न सिर्फ इस काम में जोखिम कम हो बल्कि उत्पाद भी उच्च गुणवत्ता वाला हो। इस कवायद में उन्होंने मधुमक्खीपालन के बारे में अधिक जानकारी हासिल करने के लिये कोल्हापुर के कृषि विद्यालय और महाबलेश्वर के खादी और ग्रामोद्योग आयोग का भी दौरा किया।


आदिवासियों को सशक्त करना

चैतन्य बताते हैं कि व्यवसायिक प्रतिष्ठान शहद का अधिक उत्पादन करने के फेर में एपिस मेलीफरा जैसी मधुमक्खियों की असाधारण प्रजातियों का इस्तेमाल करते हैं और इसके अलावा उत्पादन बढ़ाने और उन्हें बीमारियों से बचाने के लिये एंटीबायोटिक्स भी देते हैं।इसके चलते उत्पादित होने वाला शहद दूषित हो जाता है। इस समस्या से निबटने के फेर में चैतन्य ने वर्ष 2013 में दो गांवों में 35 परिवारों के साथ काम करना प्रारंभ किया और शहद निकालने, संग्रह करने और भंडारण करने के आधुनिक तरीकों को नियोजित किया। इसमें एपरी बॉक्स संग्रह विधि से दूर होना भी शामिल था।


उन्होंने एक स्थानीय एनजीओ यूथ पायनियर फाउंडेशन के साथ हाथ मिलाया और आदिवासी किसानों को आधुनिक उपकरण और सुरक्षा गियर प्रदान किए। इसके अलावा, उन्होंने आदिवासियों को मधुमक्खी के छत्ते के सिर्फ उन हिस्सों को काटने के लिए प्रशिक्षित किया, जो मधुमक्खियों की बर्बादी और हत्या से बचने के लिए शहद रखते थे। वर्ष 2016 तक, उनका स्टार्टअप 25 टन मल्टी-फ्लोरा शहद का उत्पादन करने में कामयाब रहा।


लैटिन में ‘ऑक्टोरम’ का मतलब पथान्वेषी होता है जो संगठन के स्वदेशी जनजातियों को एक स्थायी आजीविका और एक उज्जवल भविष्य प्रदान करने के मिशन को दर्शाता है। उपभोक्ताओं के साथ एक भावनात्मक संबंध बनाने और उनके साथ शहद संग्रह के अनुभव को साझा करने के लिए, प्रत्येक उत्पाद एक क्यूआर कोड के साथ एम्बेडेड होता है जो आदिवासियों और उत्पाद की भौगोलिक स्थिति के बारे में भी जानकारी प्रदान करता है। इसके अलावा, ऑक्टोरम सॉल्यूशंस मधुमक्खियों के संरक्षण में भी सफल रहे हैं क्योंकि शहद निष्कर्षण, संग्रह और भंडारण की प्रक्रिया के दौरान मधुमक्खियों को मारा नहीं जाता है।


वे आगे कहते हैं, 'वास्तव में हम यह सुनिश्चित करते हैं कि मधुमक्खी के छत्ते को पूरी तरह से क्षतिग्रस्त न किया जाए और छत्ते में कम से कम 20 प्रतिशत शहद बरकरार रहे।' फिलहाल उनकी उत्पाद श्रृंखला में मल्टीफ्लोरा, जामुन और केरी सहित शहद की कई किस्में शामिल हैं।


भविष्य की योजनाएं

चैतन्य कहते हैं, 'बाजार में नए होने के चलते राजस्व के प्रवाह को बनाए रखने के लिये नियमित बिक्री करते रहना सुनिश्चित करना हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती था और ऐसे में हमने वर्ष 2016-17 में लगभग 20 टन शहद की बिक्री की।'


प्रारंभ में, बूटस्ट्रैप्ड यह स्टार्टअप वर्तमान में सिंगापुर इंटरनेशनल फाउंडेशन (एसआईएफ) द्वारा वित्त पोषित है। चैतन्य ने एसआईएफ द्वारा आयोजित की गई यंग सोशल एंटरप्रेन्योरशिप चुनौती भी जीती और 2017 में 20,000 एसजीडी की वित्तीय सहायता प्राप्त की। वर्तमान में उनकी कंपनी बेंगलुरु और हैदराबाद में शहद की आपूर्ति कर रही है और चैतन्य एक प्रसंस्करण इकाई शुरू करने और 'ग्रीनविले' के नाम से अपने ब्रांड के तहत शहद बेचने की उम्मीद करते हैं। उन्होंने इस साल अपने उत्पाद पोर्टफोलियो को बढ़ाने की योजना भी बनाई है, जिसमें 35-40 टन शहद का लक्ष्य रखने के अलावा शाही जैली, पराग और मधुमक्खियों के मोम जैसे अन्य उप-उत्पादों को बेचा जा सकता है।


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