शाइरी अब तहजीब नहीं, तफरीह की चीज: डॉ. मोहम्मद आजम

By जय प्रकाश जय
November 08, 2017, Updated on : Thu Sep 05 2019 07:15:18 GMT+0000
शाइरी अब तहजीब नहीं, तफरीह की चीज: डॉ. मोहम्मद आजम
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डॉ आजम कहते हैं कि जिस तरह कवि सम्मेलनों में एक समुदाय विशेष और एक देश विशेष की बखिया उधेड़ने पर सारा ध्यान केंद्रित हो जाता है, उसी तरह अब मुशायरों में मुस्लिम समुदाय की शेखी बघारने और एक समुदाय विशेष को ललकारने का दूषित वातावरण देखा जाने लगा है। 

डॉ. मोहम्मद आजम

डॉ. मोहम्मद आजम


 पूरे विश्व को अगर अपना अदब दिखाना है तो इसके लिए जतन भी करने की आवश्यकता है। किताबें आज जितनी छप रही हैं, किसी दौर में नहीं छपीं। किताबें जितनी रद्दी की टोकरी में जा रही हैं, किसी दौर में नहीं फेकी गयीं।

डॉ. अदीब मोहम्मद कहते हैं, कि मुझे हिंदी गजल शीर्षक सुनते ही ऐसा लगता है, जैसे इसमें गजल के विधान का पूरी तरह पालन नहीं किया गया है। जिसे हिंदी गजल कह के स्वीकृत कर दिया जाएगा, या कोई छूट ली गयी है, जो गजल में अमाव्य है मगर इसमें क्षमा योग्य है।

भोपाल के जाने-माने अदीब डॉ. मोहम्मद आजम जब कहते हैं कि उर्दू मंचों पर अब शायरी के नाम से बेहयायी हो रही है, तो उनके इस अभिमत पर आज गंभीरता से सोचने की जरूरत महसूस होती है। डॉ आजम वरिष्ठ यूनानी चिकित्साधिकारी एवं 'निसार अख्तर सम्मान' मोहन राय पुरस्कार, जनार्दन शर्मा पुरस्कार, शिवना पुरस्कार, खुशबू, कहकशाने अदब, गुलदस्ता, फक्रे अदब, शैदाए अदब आदि पुरस्कारों से नवाजिश हैं। उनकी प्रमुख कृतियां हैं - आसान अरुज, लफ्जों की मसीहाई, शब्द, शुद्ध उच्चारण एवं पदभार और काफिए ही काफिए आदि।

वह कहते हैं कि आज बस एक चीज की कमी दिखती है, वह है जुनून की। पहले की तरह साहित्य के लिए पूरी तरह समर्पित लोग नहीं रहे। अदब अब पार्ट टाइम काम रह गया है। अपनी भाषा के लिए साहित्य को पढ़ना, दूसरी भाषा के साहित्य को पढ़ना और परखना, विश्व के साहित्यिक पटल पर दृष्टि गड़ाए रखना, जैसे काम आम तौर से उर्दू का साहित्यकार कम ही कर रहे हैं। कूपमंडूक की तरह अपने अदब को ही सबकुछ समझ लेने के कारण उर्दू अदब में एक ठहराव सा है। अनुवाद की भी अत्यंत आवश्यकता है। पूरे विश्व को अगर अपना अदब दिखाना है तो इसके लिए जतन भी करने की आवश्यकता है। किताबें आज जितनी छप रही हैं, किसी दौर में नहीं छपीं। किताबें जितनी रद्दी की टोकरी में जा रही हैं, किसी दौर में नहीं फेकी गयीं।

डॉ आजम कहते हैं कि जिस तरह कवि सम्मेलनों में एक समुदाय विशेष और एक देश विशेष की बखिया उधेड़ने पर सारा ध्यान केंद्रित हो जाता है, उसी तरह अब मुशायरों में मुस्लिम समुदाय की शेखी बघारने और एक समुदाय विशेष को ललकारने का दूषित वातावरण देखा जाने लगा है। अब शेर समझने वालो में ही कमी नहीं आई है बल्कि शेर कहने वालो की भी भारी कमी है। इसलिए औसत दर्जे के शाइर, गवैये, सजी-संवरी शाइरात, अदाकारी करते हुए किरदार ही स्टेज पर विराजमान रहते हैं। श्रोता अब दर्शक बन गए हैं। शाइरी अब तहजीब नहीं, तफरीह की चीज बन गई है। संजीदाकारी, गंभीर श्रोता मुशायरों में जाना पसंद नहीं करते।

कहने को भीड़ तो बढ़ी है, बड़े-बड़े आयोजन हो रहे हैं मगर गंभीर साहित्यिक रुचि का श्रोता निराश ही लौटता है कि उसके मन को मोह लेने वाला एक शेर भी उसको नहीं मिलता। और फिर आजकल गिरोह बन गए हैं। हर गिरोह का एक संयोजक होता है, जो अपने लोगों को मुशायरे में ले जाता है। इन सबके कारण उर्दू की मंचीय गरिमा को ठेस पहुंची है। वह कहते हैं कि जब मैं कॉलेज में था, तब तमाम विषयों की कक्षाओं में पढ़ रहे मुस्लिम छात्रों को इकट्ठा करके उर्दू की क्लासेज लगती थी। तब भी गिनती के ही छात्र हो पाते थे।

मतलब यह कि कॉलेज स्तर पर मुसलमान छात्र ही गिने-चुने होते हैं। प्रायः उर्दू विभाग एक बोझ की तरह ही होता है। इसी कारण से भोपाल के एक-दो कॉलेजों से उर्दू विभाग के समाप्त कर देने की नौबत आ चुकी है। जब किसी भाषा को पढ़ने के आतुर छात्र-छात्राएं ही नहीं हों तो क्या किया जा सकता है। मदरसा में उर्दू पढ़ाई जाती है मगर मदरसियाई उर्दू से उर्दू का उत्थान नहीं होने वाला। कुछ का कहना है कि आज भारत में उर्दू को बढ़ावा देने के लिए शासकीय तौर से ही उदासीनता देखी जा रही है। मुझे तो ऐसा नहीं लग रहा। लगभग हर राज्य में उर्दू एकेडमी हैं। दिल्ली में उर्दू के फरोग के लिए एक बड़ी संस्था है। सरकार और क्या सहूलियतें दें।

डॉ आजम का मानना है कि हिंदी-उर्दू वास्तव में एक ही भाषा हैं, जिनकी लिखावट दो हैं। फारसी लिपि में लिखी गई भाषा को उर्दू का नाम दिया गया है। जिसे देवनागरी लिपि में लिखिए, वो हिंदी बन जाती है। दोनो का व्याकरण समान है। क्रियाएं तो बिल्कुल एक ही हैं। दोनो को अगर पढ़ा या बोला जाए तो कोई अंतर नहीं है मगर बोलचाल की हद तक यह समानता है। साहित्य के प्रारूप में शब्दों के चयन के कारण अंतर प्रतीत होने लगता है। उ

उदाहरण के तौर पर एक उर्दूभाषी भी यही कहेगा- 'मुझे एक मकान चाहिए, पहनने को कपड़ा चाहिए और पेट भरने को रोटी।' यही वाक्य हिंदीभाषी और उर्दू से अनभिज्ञ भी बोलेंगे। हम इस भाषा को 'हिंदुस्तानी' कह सकते हैं। जब साहित्य और अदब की कसौटी पर भाषा को परखते हैं, अंतर स्पष्ट हो जाता है। जैसे हिंदी में लिखा जाएगा- 'सूरज अस्त हो रहा है' तो उर्दू वाला इसे इस तरह लिखेगा- 'आफताब गुरुब हो रहा है।' गोया फर्क बोलचाल या आलेख में शब्दों के प्रयोग के कारण है। उर्दू में बड़ी संख्या में फारसी और अरबी के शब्द हैं।

बात, कोई सन् 1900 की है। उससे पहले हिंदुस्तान में उर्दू बोली, पढ़ी और समझी जाती थी। एक सामंजस्य था। कभी-कभी प्रतिकार के स्वर उभरते थे। अंग्रेजों ने 'फूट डालो और राज करो' की नीति के तहत इस खड़ी बोली के दो प्रारूप कर दिए। इसका ध्येय था, हिंदीभाषी और उर्दूभाषी आपस में लड़ते-भिड़ते रहें और वह राज करते रहेंगे। हुआ भी वही, और होना भी यही था। अगर अंग्रेज भाषा-विच्छेद न करते तो परिस्थितियां एवं मुसलमानों की हठधर्मिता वह काम कर देती।

भारतेंदु हरिश्चंद्र, जो बाद में हिंदी के सशक्त पक्षधर बने, वह 'रसा' के तखल्लुस (उपनाम) से उर्दू में शाइरी करते थे। किसी जगह उन्होंने लिखा भी है कि मेरी मातृभाषा उर्दू रही है। बहरहाल, भारत में अनेकता में एकता कुछ ऐसी है, जो विश्व में कहीं नहीं। उर्दूभाषी भजन लिखता है तो हिंदीभाषी हम्द और नात लिखता हुआ मिल जाता है। इसलिए सांप्रदायिक सौहार्द को सर्वोपरि रखना चाहिए। और अंग्रेजों की तरह मानसिकता रखने वाले आज के सियासतदानों या कट्टरपंथी तत्वों से बच के रहना चाहिए, जो दोनो तरफ मौजूद हैं। फसाद की जड़ दो लिखावट है तो यह भी याद रखना चाहिए कि अभी तो इनकी विशिष्ट पहचान भी है। इन दोनो के गले मिलने की राह में अवरोध नहीं होना चाहिए। और अब तो वह समाप्त ही हो गई है।

भाषायी दृष्टि से यह समय बेहतर कहा जा सकता है कि उर्दू का शाइर हिंदी का दोहा लिख रहा है खालिस उर्दू शब्दों के संयोजन से तो वही हिंदी का कवि शुद्ध फारसी-अरबी शाइरी की विधा में गजल कह रहा है। आम भाषा में तो कभी क्लिष्ट हिंदी के शब्दों को सजाकर भी। पहले कविसम्मेलन और मुशायरा, अलग-अलग आयोजनों का नाम हुआ करता था, अब प्रायः कविसम्मेलन-सह-मुशायरा, मुशायरा-ओ-कविसम्मेलन जैसे निकटता बढ़ाने वाले आयोजन हो रहे हैं। दोनो भाषाएं निकट आ रही हैं। हिंदी-उर्दू भाषी निकट आ रहे हैं। अब शाइरों की फेहरिस्त में कवि और गीतकार के भी नाम होते हैं। अब कवियों की पंक्ति में शाइर और शाइरा भी बैठी हुई मिल जाती हैं।

गजल, गजल है, चाहे जिस भाषा की हो। दोहा, दोहा ही रहेगा, चाहे जिस भाषा में लिखा जाए। इसलिए मैं इस विभाजन से सहमत नहीं होता। मैंने गजल दोनो भाषाओं में कही है और शीर्षक सिर्फ गजल ही दिया है। या उनके बारे में कुछ कहते हुए कहता हूं कि हिंदी भाषा में लिखी गजल प्रस्तुत है, न कि हिंदी गजल प्रस्तुत है। सीधी सी बात है कि गजल फारसी से उर्दू में आई और गजल ही कहलाई, न कि उर्दू गजल। उसी तरह हिंदी गजल उर्दू से आई तो वह भी केवल गजल ही होगी।

वह कहते हैं कि मुझे हिंदी गजल शीर्षक सुनते ही ऐसा लगता है, जैसे इसमें गजल के विधान का पूरी तरह पालन नहीं किया गया है। जिसे हिंदी गजल कह के स्वीकृत कर दिया जाएगा, या कोई छूट ली गयी है, जो गजल में अमाव्य है मगर इसमें क्षमा योग्य है। उर्दू वालों ने जब दोहा कहा तो मात्राओं का वही विधान लागू रखा, जो प्रचलित है। दुष्यंत कुमार 'गजल' विधा को हिंदी भाषा में स्थापित करने वालो में हैं। उनसे पहले भी हिंदीभाषी गजलें लिखते थे मगर वह सब जायका बदलने से अधिक कुछ नहीं कहा जा सकता। दुष्यंत कुमार की शाइरी में कई स्थान पर गंभीर खामियां हैं।

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