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सआदत हसन मंटो: हकीकत लिखने वाला 'बदनाम' लेखक

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11th May 2017
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आज मंटो का जन्मदिन है। वही मंटो जिन्होंने अपनी कलम से इंकलाब के अफसाने लिखे, विभाजन की त्रासदी के किस्से लिखे और औरत से लेकर मजलूमों का दुख दर्द और उनकी मजबूरियों को लिखा। मंटो का पूरा नाम सआदत हसन मंटो था, लेकिन साहित्य जगत उन्हें प्यार से मंटो बुलाता है। 

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मंटो शुरू से ही कला और साहित्य से लगाव रखते थे। युवावस्था में उन्होंने अपने कुछ दोस्तों के साथ एक क्लब खोला था, जहां वह ड्रामा स्टेज शो करना चाहते थे। लेकिन जैसे ही ये बात उनके पिता को पता चली उन्होंने सारे म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट तोड़ दिए थे। मंटो के पिता एक जज थे और वह चाहते थे कि उनका बेटा उन्हीं की तरह बने। फिल्म, ड्रामा, संगीत जैसी चीजों को वे अच्छा नहीं मानते थे।

मंटो जब सात साल के थे, उस वक्त पंजाब में जलियावालां बाग हत्याकांड हुआ था। इस दर्दनाक घटना ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया था। उनका पहला अफसाना 'तमाशा' इसी पर आधारित था।

मंटो भारत पाकिस्तान के बंटवारे के पहले 1912 में पंजाब के लुधियाना जिले में समराला गांव में पैदा हुए थे। उस वक्त भारत में अंग्रेजों का राज हुआ करता था। अंग्रेजों की बर्बरता ही वह पहली वजह थी जिसके कारण मंटो ने कलम उठाई और लिखते चले गए। मंटो शुरू से ही कला और साहित्य से लगाव रखते थे। युवावस्था में उन्होंने अपने कुछ दोस्तों के साथ एक क्लब खोला था, जहां वह ड्रामा स्टेज शो करना चाहते थे। लेकिन जैसे ही ये बात उनके पिता को पता चली उन्होंने सारे म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट तोड़ दिए थे। मंटो के पिता एक जज थे और वह चाहते थे कि उनका बेटा उन्हीं की तरह बने। फिल्म, ड्रामा, संगीत जैसी चीजों को वे अच्छा नहीं मानते थे। लेकिन मंटो का मन इन्हीं सब चीजों में रमता था। जब वह सात साल के थे, उस वक्त पंजाब में जलियावालां बाग हत्याकांड हुआ था। इस दर्दनाक घटना ने मंटो को झकझोर दिया था। उनका पहला अफसाना 'तमाशा' इसी पर आधारित था।

लिखने के मामले में मंटो को निर्मम माना जाता है। उन्हें किसी की भी परवाह नहीं होती थी। वह हकीकत को ज्यों का त्यों लिखना पसंद करते थे। शायद यही वजह है कि उन्हें समाज के कूढ़मिजाज लोग नापंसद करते थे और इसी वजह से उनकी कहानियों पर कई केस भी हुए। उनकी जिन कहानियों पर मुक़दमे चले उनके नाम हैं, 'काली सलवार', 'बू', 'धुआं', 'ठंडा गोश्त' और 'ऊपर, नीचे और दरमियां'। इन मुकदमों से लड़ते-लड़ते मंटो की जिंदगी निकल गई, लेकिन उनका हौसला कभी पस्त नहीं हुआ। उन्हें कभी अपने लिखे पर पछतावा नहीं था। मंटो कहते थे, कि हर उस चीज के बारे में लिखा जाना चाहिए जो हमारे आस-पास हो रही हैं।

सन 1932 में मंटो के पिता का देहांत हो गया। इसके बाद उन्होंने अपने पिता के कमरे में पिता की फोटो के साथ भगत सिंह की मूर्ति लगाई थी और कमरे के बाहर लिखा था- 'लाल कमरा।' मंटो की कहानियों की जितनी चर्चा पिछले कुछ दशकों में हुई है उतनी शायद उर्दू या हिंदी या दूसरी भाषाओं के कहानीकारों की कम ही हुई है। अपनी कहानियों में बंटवारे, दंगों और सांप्रदायिकता पर जितने तीखे कटाक्ष मंटो ने किए उस तरह से शायद किसी ने नहीं लिखा होगा। मंटो के लिखे को पढ़कर हैरानी होती है कि कोई लेखक इतनी हिम्मत का काम कैसे कर सकता है। मंटो वाकई में सच लिखने के लिए क्रूर थे। लेकिन इसके साथ ही वे संवेदनाओं का भी ख्याल रखते थे। उनकी किसी भी कहानी में साफतौर पर इसे देखा जा सकता है।

पिता की मौत के बाद भी मंटो के अंदर पढ़ने की ख्वाहिशें जिंदा थीं। 1934 में उन्होंने अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया। हालांकि उस वक्त यह यूनिवर्सिटी प्रगतिशील मुस्लिम युवाओं के लिए जानी जाती थी। यहां आकर मंटो ने फिर से लिखना शुरू कर दिया। तमाशा के बाद 'इनक़िलाब पसंद' उनका दूसरा अफसाना था, जो अलीगढ़ यूनिवर्सिटी की मैगज़ीन में भी छपा। इसके बाद उनका लिखने का सिलसिला शुरू हो गया।। 1936 में मंटो ने उर्दू की कहानियां लिखी थीं जो 'आतिशपारे' नाम से छापा गया था। पता नहीं क्यों मंटो का मन अलीगढ़ में ज्यादा लगा नहीं और वह सब छोड़कर वापस अमृतसर चले गए। वहां से वह लाहौर गए और वहीं पर एक साप्ताहिक पत्रिका का संपादन करने लगे। लेकिन मंटो को शायद किसी और चीज की ही तलाश थी। वह हर चीज में सुकून खोजते थे। इसलिए वह लाहौर को छोड़कर मुंबई चले आए। उन्होंने फिल्मी दुनिया में खूब काम किया। वह 'इंपीरियर फिल्म कंपनी' के लिए स्क्रिप्ट और डायलॉग लिखा करते थे। इसी बीच उनका मन उचटा और वह दिल्ली भाग आए। यहां रहकर उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो के लिए कई शो लिखे।

दिल्ली भी उन्हें रास नहीं आ रही थी, इसीलिए उन्होंने वापस मुंबई जाने का फैसला कर लिया। मुंबई में उन्होंने फिल्मिस्तान कंपनी में काम करना शुरू किया। उस वक्त मुगले आजम फिल्म बनाने वाले के. आसिफ मंटो के साथ ही काम कर रहे थे, लेकिन कई कारणों से वह फिल्म उस वक्त नहीं बन सकी थी। यहां के काम से मंटो को थोड़ा सुकून और खुशी मिल रही थी, लेकिन इसी दौरान भारत और पाकिस्तान का बंटवारा हो गया। बंटवारे से मंटो को काफी धक्का पहुंचा। पूरे देश में अफरा-तफरी का माहौल पैदा हो गया। देश के तमाम शहरों में दोनों समुदायों के बीच मारकाट होने लगी। मुम्बई भी भी नफरत की लपट से अछूता नहीं रहा। मंटो के परिवार के लोग तो पाकिस्तान चले गए लेकिन वह पाकिस्तान नहीं जाना चाहते थे। वह मुंबई से बहुत प्यार करते थे, इसलिए इसे छोड़कर नहीं जाना चाहते थे। लेकिन धार्मिक उन्माद की चिंगारी से वह बच नहीं पाए और उन्हें भी पाकिस्तान जाना पड़ा।

मुंबई के दिनों को याद करते हुए उन्होंने लिखा था, 'मेरे लिए ये तय करना नामुमकिन हो गया है, कि दोनों मुल्कों में अब मेरा मुल्क कौन-सा है। बड़ी बेरहमी के साथ हर रोज जो खून बहाया जा रहा है, उसके लिए कौन जिम्मेदार है? अब आजाद हो गए हैं लेकिन क्या गुलामी का वजूद खत्म हो गया है? जब हम गुलाम थे तो आजादी के सपने देख सकते थे, लेकिन अब हम आजाद हो गए हैं तब हमारे सपने किसके लिए होंगे?' 

मंटो ने पाकिस्तान जाकर भी लिखना जारी रखा। वहां उनके 14 कहानी संग्रह छपे। इसमें लगभग डेढ़ सौ से भी ज्यादा अफसाने शामिल थे। उनकी कुछ कहानियां जैसे, 'मम्मी', 'टोबा टेक सिंह', 'फुंदने', 'बिजली पहलवान', 'ठंडा गोश्त', 'बू', 'काली सलवार', 'लाइसेंस', और 'टेटवाल का कुत्ता' कालजयी मानी जाती हैं।

मंटो को शराब की बुरी लत लग गई थी। इसी वजह से 18 जनवरी सन 1955 को लाहौर में मंटो का इंतकाल हो गया। ये इत्तेफाक ही है कि उस वक्त उनकी लिखी फिल्म 'मिर्ज़ा ग़ालिब' हाउस फुल चल रही थी। अपनी मौत से एक साल पहले मंटो अपनी कब्र पर लिखी जाने के लिए जो इबादत लिखी, वह दर्द भरी होते हुए भी बड़ी प्यारी इबादत थी। उन्होंने लिखा था, 'यहां सआदत हसन मंटो लेटा हुआ है और उसके साथ कहानी लेखन की कला और रहस्य भी दफन हो रहे हैं। टनो मिट्टी के नीचे दबा वह सोच रहा है कि क्या वह खुद से बड़ा कहानी लेखक नहीं है।' मंटो को गुजरे जमाने बीत रहे हैं, लेकिन उनकी बातें आज भी हमारे लिए जिंदा हैं। मंटो जैसी शख्शियत वैसे भी कभी मरते नहीं हैं।

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