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पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भारत के बढ़ते कदम

विभिन्न सरकारी व गैरसरकारी संस्थानों ने उठाए महत्वपूर्ण कदम छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी संस्थाएं लगी हैं पर्यावरण संरक्षण के कार्य में पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ रोजागर भी और मुनाफा भी

Ashutosh khantwal
13th May 2015
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पिछले कई वर्षों में क्लाइमेट चेंज एक ऐसा विषय रहा है जिसने वैज्ञानिकों ही नहीं बल्कि आम आदमी को भी चेताया है। आज एक सामान्य व्यक्ति इसके प्रति सजग नजर आता है और अपनी राय भी रखता है जो कि बहुत अच्छी बात है। आज विश्व का हर देश इस दिशा में काम करने के प्रति प्रतिबद्धता जाहिर करता है। लेकिन इसका एक नकारात्मक पक्ष यह है कि कोई भी देश उन पॉलिसी को अपनाने के लिए आगे नहीं आ रहा है। जिसका मुख्य कारण यह है कि कई देशों को ऐसा लगता है कि कहीं इन पॉलिसी को अपनाने के बाद उनके देश का विकास कार्य बाधित न हो जाए और वे बाकी देशों से पीछे न रह जाएं। ऐसे में भारत ने एक पहल की और एक उदाहरण पेश किया कि आप वातावरण के साथ सामंजस्य बनाकर भी अपने देश की तरक्की कर सकते हैं। भारत ने ब्रिक्स देशों से भी सहयोग देने और इस दिशा में काम करने की अपील की। इसके सकारात्मक संकेत भी दिखने लगे हैं। भारत सरकार ने भविष्य में कुछ ऐसे ही कैंपेन चलाने का निर्णय लिया है जैसे - फ्रेश एयर, सेव वाटर, सेव एनर्जी, ग्रो मोर प्लांट्स, अर्बन ग्रीन आदि। इन सभी कैंपेन का मकसद, वातावरण की रक्षा करना है।

इसके अलावा गैर सरकारी संस्थानों द्वारा भी इस दिशा में कार्य किए जा रहे हैं जो वेस्ट मैनेजमेंट से लेकर ईको-टूरिज्म तक से जुड़े हैं। आज हम कुछ ऐसी ही निजी कंपनियों के बारे में बात करेंगे जिन्होंने वातावरण के लिए काम करने की ठानी और साथ में मुनाफा भी कमाया और विश्व भर में एक मिसाल कायम की। इन कंपनियों ने विभिन्न शोध किए और ऊर्जा उत्पन्न करने के ऐसे नायाब तरीके निकाले जो पर्यावरण के लिए काफी लाभकारी हैं। ऐसी ही कुछ कंपनियों के कार्यों पर डालते हैं एक नज़र -

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नोकोडा- बिहार मेें स्थित सोशल एंटर प्राइज है जो वेस्ट यानी कूड़े से ऊर्जा उत्पन्न करती है और वातावरण को स्वच्छ रखने में मदद करती है।

सस्टेन अर्थ- ने सस्ते दाम पर गाय के गोबर से खाद बनाने का बीड़ा उठाया। यह खाद नैचुरल और सस्ती तो है ही साथ ही वातावरण फ्रैंडली भी है।

ऊर्जा अनलिमिटेड- ने ग्रामीण लोगों के लिए सस्ती दरों में सोलर एनर्जी से उनके घरों को रौशन किया।

ओनेर्जी- भारत के पू्र्वी हिस्सों को ऊर्जा प्रदान कर रहा है।

वेस्ट मैनेजमेंट -

अगर वैकल्पिक ऊर्जा का सबसे अच्छा और ज्यादा उपयोग कहीं होता है तो वो ग्रामीण इलाकों में वेस्ट मैनेजमेंट के जरिए ही देखने में आता है।

संपूर्ण अर्थ - इस कंपनी ने मुंबई से अपना काम शुरू किया और देखते ही देखते पूरे देश में फैल गई। यह एक सोशल एंटरप्राइडज है जो वेस्ट मैटीरीयल का प्रयोग करके विभिन्न नई चीजों को बनाती है और समाज के निम्न तबके के लिए जो कूड़ा बीनने का काम करते हैं, उनके लिए काम करती है।

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आई गौट गारबेज- यह संस्था पूणे, हैदराबाद, बैंगलोर हुबली, धारवाड, मुंबई, कोट्टायम और पांडीचेरी में काम करती है। यह भी वेस्ट मैटीरियल के प्रयोग से विभिन्न चीजें बनाती है और कूड़ा बीनने वालों को काम पर लगाती है। जिससे उन्हें भी अच्छा पैसा मिल जाता है। इससे दो अच्छे कार्य होते हैं एक तो वातावरण की दृष्टि से यह अच्छा है दूसरा कूडा बीनने वाले लोगों की भी इससे नियमित आय होती है।

ग्रीन नर्डस- का काम नई-नई तकनीकों के जरिए वेस्ट को छांटकर उसका सही व दोबारा उपयोग करना है। इस कंपनी को इसके बेहतरीन कार्य के लिए कई पुरस्कारों से नवाजा गया है।

साहस- बैंगलोर स्थित एक कंपनी है जो वेस्ट मैनेजमेंट को बढ़ावा देने का काम बहुत ही लोकल लेवल पर करती है।

क्लीन अप धर्मशाला प्रोजेक्ट का उद्देश्य हिमाचल के मैकलोड गंज से कूडे को साफ करना और उस कूडे को रीसाइकल करना है।

पेपर वेस्ट का हेडक्वाटर हैदराबाद में है। कागज एनवारमेंट फैंडली होता है और यह कंपनी कागज के प्रयोग को बढ़ावा देने का काम करती है। लेकिन पेपर के उत्पादन के लिए पेड़ों को काटा जाता है इसलिए पेपरवेस्ट कंपनी पुराने अखबारों और कागजों को एकत्र कर फिर से रीसाइकल करवाती है ताकि कागज का फिर से प्रयोग किया जा सके और कम से कम पेड़ काटने पड़ें।

इको फैमी सैनिट्री पैड्स बना रही है जो ऐसे फैबरिक के बने हैं जो पर्यावरण के लिए नुकसानदायक नहीं होते।

दक्षिण और पश्चिम भारत में जहां आईटी सेक्टर ने खासी तरक्की की है वहीं पिछले कुछ सालों में यहां ई-वेस्ट मैनेजमेंट का भी जोर देखा गया है। ई-वेस्ट मैनेजमेंट कुछ वेस्ट मैनेजमैंट कंपनियों के लिए नए अवसर लेकर आया है।

इकोरेको- एक ऐसी कंपनी है जिसने ऐसी नई तकनीक इजात की हैं जिससे ई-वेस्ट को शुद्ध किया जा सके और पर्यावरण को होने वाले नुक्सान से बचाया जा सके।

रीनेवेल्ट- एक ऐसी कंपनी है जो बड़ी-बड़ी कंपनियों के पुराने हो चुके कंप्यूटर्स लेती है और उन्हें फिर प्रयोग करने लायक बनाती है। और दोबारा उन्हें काफी सस्ते दामों में बेचती है।

ईको टूरिज्म- का नाम आजकल काफी तेजी से बढ़ रहा है। सरकार भी ऐसी संस्थाओं को मदद कर रही है जो संस्थान पर्यावरण की रक्षा में लगे हुए हैं। पिछले कुछ समय में इनकी संख्या में खासी वृद्धि भी हुई है। ईको टूरिज्म का कार्य टूरिस्ट को कम गंदगी करने के लिए प्रोत्साहित करना और उन्हें ऐसी चीजें उपलब्ध करवाना है जो पर्यावरण के लिए नुकसानदायक न हों।

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एक रिसर्च के अनुसार खेती से दुनिया भर में 20 प्रतिशत कार्बन का उत्सर्जन होता है। यूनाइटेड नेशन की एक रिपोर्ट के अनुसार ऑर्गेनिक खेती हमारे ईको सिस्टम के लिए काफी फायदेमंद है। ये कार्बनडाईऑक्साइड गैस को भी कम करती है। साथ ही ऑर्गेनिक खेती मिट्टी की उर्वरक क्षमता को भी बनाए रखती है।

भारत में विभिन्न संगठन हैं जो ऑर्गेनिक खेती में लगे हुए हैं।

एगश्री, गन्ने की खेती में संलग्न है। ये लोग ऑर्गेनिक खाद और तकनीकों के प्रयोग से गन्ने की खेती करते हैं।

चेतना ऑर्गेनिक्स, कपास की खेती में ऑर्गेनिक खेती का प्रयोग करता है। कपास की खेती के दौरान पर्यावरण को सबसे ज्यादा नुक्सान होता है इसलिए चेतना ऑर्गेनिक्स इस बात को सुनिश्चित करता है कि खेती के दौरान पर्यावरण की भी रक्षा हो सके।

द ऐप्पल प्रोजेक्ट, उत्तराखंड और हिमाचल के किसानों के लिए काम करता है। यहां ऑर्गेनिक खेती के जरिए सेब का उत्पादन होता है और किसानों को हिस्सेदारी देकर आत्मनिर्भर बनाया जाता है।

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प्रदूषण भी ग्लोबल वार्मिग की प्रमुख वजहों में से एक है। इसके लिए लोगों का चीजों के प्रति जागरुक न होना भी मुख्य कारण है। लोगों को समझना होगा कि कौन सा प्रोडक्ट अच्छा है व कौन सा वातावरण के लिए नुक्सानकारक। इसी क्षेत्र में विभिन्न कंपनियां काम कर रहीं हैं।

द लिविंग ग्रीन, शहरी लोगों को प्रोत्साहित कर रही है कि वे अपने घरों की छतों में सब्जियां उगाएं।

दाना नेटवर्क यह सहकारी ऑर्गेनिक किसानों के साथ काम करते हैं और उनके प्रोडक्ट को बेचने में मदद करते हैं।

औरा हर्बल, ने एक फैशन ब्रांड बनाया है जहां वो हर्बल टैक्सटाइल के प्रोडक्ट बेचते हैं। ये लोग बिजनेस टू बिजनेस और बिजनेस टू कंज्यूमर दोनों के साथ काम करते हैं।

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