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मिलिए उस शख्स से जिसने 35 हजार किसानों को 180 किलोमीटर लंबे मार्च के लिए किया एकजुट

35 हज़ार किसानों को एकजुट करने वाले विजू कृष्णन...

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14th Mar 2018
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12 मार्च को पूरे देश ने महाराष्ट्र के 35 हजार किसानों के जज्बे को देखा जब वे 180 किलोमीटर लंबी पैदल यात्रा कर अपनी मांगों को लेकर मुंबई पहुंचे। छह दिन लंबी पदयात्रा कर किसानों के पैरों में छाले पड़ गए और खून बहते पैरों की तस्वीरों से पूरा देश द्रवित हो उठा। हालांकि महारष्ट्र सरकार ने किसानों की मांगों को मान लिया और उस पर काम करने का वादा किया, जिससे सारे किसान वापस अपने गांव की ओर लौट गए। लेकिन इतने विशाल हुजूम को एकजुट करने में जिस शख्स ने अहम भूमिका निभाई उसका नाम विजू कृष्णन है....

विजू कृष्णन (फोटो साभार- यूट्यूब)

विजू कृष्णन (फोटो साभार- यूट्यूब)


जेएनयू से पढ़ने के बाद विजू बेंगलुरु के सेंट स्टीफन कॉलेज के पॉलिटिकल साइंस डिपार्टमेंट में प्रोफेसर रहे। उसके बाद वे किसान आंदोलन से जुड़ गए और किसानों की समस्याओं को बड़े स्तर पर उठाने लगे। अब वे पूर्णकालिक ऐक्टिविस्ट हैं।

12 मार्च को पूरे देश ने महाराष्ट्र के 35 हजार किसानों के जज्बे को देखा जब वे 180 किलोमीटर लंबी पैदल यात्रा कर अपनी मांगों को लेकर मुंबई पहुंचे। छह दिन लंबी पदयात्रा कर किसानों के पैरों में छाले पड़ गए और खून बहते पैरों की तस्वीरों से पूरा देश द्रवित हो उठा। हालांकि महारष्ट्र सरकार ने किसानों की मांगों को मान लिया और उस पर काम करने का वादा किया, जिससे सारे किसान वापस अपने गांव की ओर लौट गए। लेकिन इतने विशाल हुजूम को एकजुट करने में जिस शख्स ने अहम भूमिका निभाई उसका नाम विजू कृष्णन है। विजू ऑल इंडिया किसान महासभा के जॉइंट सेक्रेटरी हैं। इसी संगठन के बैनर तले सभी किसान मार्च कर रहे थे।

44 वर्षीय विजू देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय जेएनयू से पढ़े हुए हैं। वे जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। स्टूडेंट फेडरेशन इंडिया के फायरब्रांड नेता विजू अब ऑल इंडिया किसान सभा से जुड़े हैं और वे जॉइंट सेक्रेटरी पद को संभालते हैं। वे हमेशा से किसानों और दबे-पिछड़े समाज के हक की आवाज उठाते रहे हैं। विजू केरल के कन्नूर जिले के करिवेल्लूर इलाके से आते हैं जहां किसानों ने 1946 में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आंदोलन छेड़ा था। वे बताते हैं कि उन्होंने अपने माता-पिता के उन बहादुर किसानों की कहानियां सुनी हैं। उन्हें वह अपना प्रेरणास्रोत मानते हैं।

जेएनयू से पढ़ने के बाद विजू बेंगलुरु के सेंट स्टीफन कॉलेज के पॉलिटिकल साइंस डिपार्टमेंट में प्रोफेसर रहे। उसके बाद वे किसान आंदोलन से जुड़ गए और किसानों की समस्याओं को बड़े स्तर पर उठाने लगे। अब वे पूर्णकालिक ऐक्टिविस्ट हैं। वे कहते हैं, 'किसानों की समस्या पर कोई सरकार ध्यान नहीं दे रही है। देश के कई इलाकों जैसे, राजस्थान, कर्नाटक, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में किसानों की हालत काफी बुरी है।' विजू जेएनयू की जेंडर सेंसिटाइजेशन कमिटी के सबसे पहले सदस्य थे। उन्होंने इस कमिटी को स्थापित करने में भी अहम भूमिका निभाई थी।

किसान आंदोलन के राजनीतिक रंग के बारे में सवाल करने पर विजू ने कहा, 'ये प्रदर्शन सिर्फ किसानों का उनके रोजमर्रा के संघर्ष के लिए हैं। बीजेपी की नीतियों के वजह से हालात उसके खिलाफ बन गए हैं और इस प्रदर्शन ने राजनीतिक रंग ले लिया। हालांकि, इसे चुनावी राजनीति से जोड़ना गलत है। लेकिन ये बात सही है कि ये आंदोलन उन सभी विचारों को बल दे सकता है जो बीजेपी के खिलाफ है।' उन्होंने कहा कि सरकार ने किसानों की मांगों को पूरा करने का वादा किया है और उनकी नजर सरकार के अगले कदम पर है।

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