48 CA वाले परिवार में पले अंशुल गुप्ता ने खड़ा किया लॉन्ड्री बिजनेस, आज देशभर में फैला कारोबार
अमेरिका में कपड़े धोने के एक छोटे से अनुभव ने अंशुल गुप्ता की सोच बदल दी. भारत लौटकर उन्होंने Quick Clean की शुरुआत की और अस्पतालों की लॉन्ड्री व्यवस्था को नया रूप दिया. 14 लाख रुपये से शुरू हुआ यह सफर आज एक मजबूत और भरोसेमंद सिस्टम में बदल चुका है.
कई बार बड़े बिजनेस किसी बड़े प्लान से नहीं, बल्कि एक छोटे से अनुभव से शुरू होते हैं. ऐसा ही कुछ अंशुल गुप्ता (Anshul Gupta) के साथ हुआ.
वह अमेरिका के सैन जोस (कैलिफोर्निया राज्य का तीसरा सबसे बड़ा शहर) में अपने दोस्त के घर ठहरे थे. रोजमर्रा की एक साधारण जरूरत के लिए वह एक laundromat (मशीन से खुद कपड़े धोने और सुखाने की जगह) गए. मशीन में कपड़े डाले, कुछ बटन दबाए, और करीब एक घंटे बाद सब कुछ साफ और सूखा तैयार था.
यह एक आम सा अनुभव था, लेकिन अंशुल के लिए यह एक सवाल बन गया. अगर यह सिस्टम यहां इतना आसान है, तो भारत में क्यों नहीं?
भारत लौटकर उन्होंने देखा कि यहां लॉन्ड्री का काम अब भी पुराने ढर्रे पर चल रहा है. कहीं कोई तय प्रक्रिया नहीं. कहीं कोई जिम्मेदारी तय नहीं. यही सवाल धीरे धीरे एक सोच में बदला. और वही सोच आगे चलकर स्टार्टअप Quick Clean की नींव बनी.
हाल ही में Quick Clean के फाउंडर और सीईओ अंशुल गुप्ता ने YourStory हिंदी से बात की. वे कहते हैं, “कभी-कभी एक छोटी सी चीज आपको नई दिशा दिखा देती है. मेरे लिए वह laundromat का अनुभव था.”
यहीं से उनकी यात्रा शुरू हुई. बाकी कहानी उसी सफर की है, जहां एक साधारण आइडिया ने एक पूरे सेक्टर को बदलने की कोशिश की.
नौकरी छोड़ किया स्टार्टअप
अंशुल एक ऐसे परिवार से आते हैं जहां चार्टर्ड अकाउंटेंसी एक परंपरा जैसी है. परिवार में करीब 48 चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) हैं. उनके पिता भी इसी पेशे में थे. स्वाभाविक था कि उनसे भी यही उम्मीद की जाए.
लेकिन जिंदगी ने उन्हें सीधा रास्ता नहीं दिया. उन्होंने IIT की तैयारी की. अंतिम चरण तक पहुंचे लेकिन सफलता नहीं मिली. फिर इंजीनियरिंग की. फिर BBA किया. आखिरकार CA की पढ़ाई की और CA बने.
PwC में आर्टिकलशिप के दौरान उन्हें बड़े क्लाइंट्स और कॉर्पोरेट दुनिया को करीब से समझने का मौका मिला. बोर्डरूम की चर्चा, CFO की सोच और बड़े बिजनेस के फैसले उन्होंने बहुत कम उम्र में देखे.

₹14 लाख से शुरुआत, एक साल में 42 आउटलेट्स
साल 2010 में अंशुल ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के पास अपना पहला laundromat शुरू किया. यह भारत के शुरुआती ऑर्गनाइज्ड लॉन्ड्री मॉडल्स में से एक था.
शुरुआत आसान नहीं थी. उन्होंने अपनी निजी बचत से ₹14 लाख इस बिजनेस में लगाए. मशीनें भारत में उपलब्ध नहीं थीं. उन्हें चेक रिपब्लिक से मंगवाना पड़ा. परिवार भी थोड़ा शक्की था.
अंशुल कहते हैं, “उस समय यह एक नया आइडिया था. हमें हर चीज खुद सीखनी पड़ी. हमने जल्दबाजी में विस्तार नहीं किया. पहले मॉडल को समझा और मजबूत किया.”
मीडिया में चर्चा हुई. फ्रेंचाइजी मॉडल शुरू हुआ. एक साल में 42 आउटलेट्स बन गए. लेकिन असली मौका उन्हें एक अलग सेक्टर में दिखा. अस्पतालों में. उन्होंने देखा कि अस्पताल करोड़ों का इंफ्रास्ट्रक्चर बना रहे हैं. लेकिन लिनेन मैनेजमेंट पुराने तरीके से हो रहा है.
अंशुल कहते हैं, “लॉन्ड्री को सिर्फ हाउसकीपिंग माना जाता था. जबकि यह इंफेक्शन कंट्रोल का अहम हिस्सा है. हमने इसी गैप को समझा.”
यहीं से Quick Clean ने अस्पतालों की तरफ रुख किया.
अलग बिजनेस मॉडल
Quick Clean का मॉडल काफी अलग है. यह सिर्फ कपड़े धोने की सर्विस नहीं है. यह अस्पताल के अंदर ही पूरा लॉन्ड्री सिस्टम सेट करता है. मशीनें लगाता है. स्टाफ देता है. ट्रेनिंग देता है. और रोज का ऑपरेशन भी संभालता है. इस मॉडल को on premise laundry कहा जाता है.
अंशुल गुप्ता बताते हैं, “जब लॉन्ड्री अस्पताल के अंदर होती है तो टाइम बचता है. ट्रेसबिलिटी बेहतर होती है. और इंफेक्शन का खतरा कम होता है.”
हर प्रोसेस तय होता है. गंदे और साफ कपड़ों का अलग रास्ता. मशीनों में तय तापमान. केमिकल की सही मात्रा. यह सब मिलकर एक ऐसा सिस्टम बनाते हैं जो ऑडिट के लिए तैयार रहता है.
आज Quick Clean देश भर के 38 से ज्यादा शहरों में मौजूद है. 110 से ज्यादा यूनिट्स चला रहा है और रोजाना 80,000 किलो से ज्यादा लिनेन प्रोसेस होता है. कंपनी के पास 1500 से ज्यादा कर्मचारी हैं. इसका हेडक्वार्टर गुरुग्राम में है.
अंशुल कहते हैं, “हमने लॉन्ड्री को एक सर्विस नहीं, बल्कि एक सिस्टम बनाया है. जहां हर चीज मापी जा सकती है और सुधारी जा सकती है.”
चुनौतियां, टेक्नोलॉजी और आगे की राह
भारत में लॉन्ड्री सेक्टर को व्यवस्थित करना आसान नहीं था.
अंशुल मानते हैं, “सबसे बड़ी चुनौती थी एक असंगठित सेक्टर को प्रोफेशनल बनाना. हर जगह एक जैसा स्टैंडर्ड रखना मुश्किल था.”
क्वालिटी बनाए रखना भी एक बड़ी चुनौती रही. लेकिन यही उनकी ताकत बन गई.
आज कंपनी टेक्नोलॉजी पर भी फोकस कर रही है. RFID और बारकोड से हर कपड़े को ट्रैक किया जा सकता है. मशीनें खुद डेटा देती हैं.
अंशुल कहते हैं, “भविष्य में लॉन्ड्री पूरी तरह डेटा ड्रिवन सिस्टम बन जाएगा. AI और एनालिटिक्स से काम और बेहतर होगा.”
सस्टेनेबिलिटी भी कंपनी का अहम हिस्सा है. ReWeave 360 पहल के तहत पुराने कपड़ों को रिसाइकिल किया जाता है. इससे लाखों लीटर पानी की बचत हुई है. और कचरा भी कम हुआ है.
फरवरी 2025 में कंपनी ने अपने सीरीज़-A फंडिंग राउंड में 6 मिलियन डॉलर की फंडिंग जुटाई है. इस राउंड की अगुवाई Alkemi Growth Capital और Blue Ashva Capital ने की थी.
अंशुल बताते हैं, “यह सही समय था. हमारा मॉडल साबित हो चुका था. अब हमें तेजी से विस्तार करना है.”
अंशुल गुप्ता का सपना बड़ा है. वे Quick Clean को दुनिया की सबसे बड़ी on premise लॉन्ड्री कंपनी बनाना चाहते हैं. और अगर उनकी यात्रा को देखें, तो यह सपना दूर नहीं लगता.
अगले दो साल में कंपनी नए शहरों में जाएगी. अस्पतालों के साथ साझेदारी बढ़ाएगी. और टेक्नोलॉजी में निवेश करेगी.
Quick Clean की कहानी सिर्फ एक बिजनेस की कहानी नहीं है. यह एक सोच की कहानी है. एक छोटे से अनुभव से शुरू हुआ आइडिया आज देश के हेल्थकेयर सिस्टम का अहम हिस्सा बन चुका है.




