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ढाई लाख लगाकर शुरू की पैकेजिंग कंपनी, 12 लाख से भी ज्यादा का टर्नओवर

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24th Nov 2018
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अंशुमन ने वर्ष 2014 में 2.5 लाख रुपये के प्रारंभिक निवेश के साथ अपनी स्वयं की पैकेजिंग परामर्श फर्म की स्थापना की। उनकी कंपनी का टर्नओवर अब करीब 12 लाख रुपये तक पहुंच चुका है।

अंशुमन जैन

अंशुमन जैन


अच्छी पैकेजिंग न सिर्फ शानदार असर और प्रभाव ही छोड़ती है बल्कि वास्तव में असंगठित क्षेत्र के अधिकांश निर्माताओं और खुदरा विक्रेताओं को मुख्यधारा तक पहुंचने में भी काफी कारगर साबित हो सकती है।

अंशुमन जैन का मानना था कि पैकेजिंग की उचित व्यवस्था की अनुपलब्धता वह प्रमुख वजह है जिसके चलते भारत का निर्यात अपनी पूरी क्षमता तक नहीं पहुंच पा रहा है। नतीजतन, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पैकेजिंग से पैकेजिंग प्रौद्योगिकी में स्नातकोत्तर की डिग्री लेने वाले इस 38 वर्षीय अंशुमन ने वर्ष 2014 में अपनी पैकेजिंग कंसल्टेंसी फर्म 'माइंडबॉक्स पैकेजिंग सॉल्यूशंस' शुरू करने का फैसला किया।

माइंडबॉक्स पैकेजिंग की नींव रखने से पहले अंशुमन जयपुर में पैकजिंग परामर्शदाता के रूप में काम कर रहे थे। वे कहते हैं, 'प्रभावी पैकेजिंग और लेबलिंग किसी भी उत्पाद को आकर्षक तो बनाती है ही साथ ही लागत को काबू में रखने में भी मददगार साबित होती है, एक भावनात्मक लगाव बनाती है जिससे बिक्री बढ़ती है और छोटी-छोटी बारीकियां भी आसानी से सामने आती हैं जिसके परिणामस्वरूप घरेलू और अंतरराष्ट्रीय, दोनों ही बाजारों में बढ़त हासिल करने में काफी मदद मिलती है।'

अशुंमन के अनुसार अधिकांश भारतीय निर्माता पैकिजिंग के महत्व से अनजान हैं और हो सकता है कि निर्यात के लिये तेजी के कड़े होते वैश्विक मानकों को देखते हुए इनमें से ज्यादातर बहुत पीछे रह जाते हों और ऐसा इसलिये नहीं है कि उनके उत्पादों की गुणवत्ता खराब है बल्कि खराब पैकेजिंग के चलते।

अंशुमन बताते हैं कि 10 वर्षों से भी अधिक समय तक वैश्विक कंपनियों के साथ काम करने के अपने अनुभवों के आधर पर वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि ऐसी कंपनियां प्रतिस्पर्धा में आगे रहने के लिये पैकेजिंग पर बहुत अधिक ध्यान देती और निवेश करती हैं जबकि घरेलू भारतीय बाजार में पैकेजिंग पर प्रति नग खर्च की जाने राशि बेहद कम है।

इसी रिक्त स्थान की पूर्ति करने के इरादे से अंशुमन ने वर्ष 2014 में 2.5 लाख रुपये के प्रारंभिक निवेश के साथ अपनी स्वयं की पैकेजिंग परामर्श फर्म की स्थापना की। उनकी कंपनी का टर्नओवर अब करीब 12 लाख रुपये तक पहुंच चुका है और उन्होंने चार वर्ष के दौरान करीब 40 लोगों को संविदा के आधार पर रोजगार उपलब्ध करवाया है। वर्तमान में अंशुमन राजस्थान की बेहद मशहूर लक्ष्मी मिष्ठान भंडार के लिये पैकेजिंग विकसित करने के काम में जुटे हुए हैं।

वे कहते हैं, 'किसी भी उत्पाद की मार्केटिंग और ब्रांडिंग के लिये पैकेजिंग बेहद अहम होती है। इसके अलावा यह उत्पाद को लेकर होने वाले अनुभव को बढ़ाती है और बेहतर डिजाइन और वैकल्पिक चीजों के इस्तेमाल के जरिये बर्बादी को कम करने और पर्यावरण पर होने वाले दुष्प्रभाव को काबू पाने में सहायक होती है।'

अंशुमन का ऐसा मानना है कि अच्छी पैकेजिंग न सिर्फ शानदार असर और प्रभाव ही छोड़ती है बल्कि वास्तव में असंगठित क्षेत्र के अधिकांश निर्माताओं और खुदरा विक्रेताओं को मुख्यधारा तक पहुंचने में भी काफी कारगर साबित हो सकती है। वे याद करते हैं कि कैसे उन्होंने कुछ स्थानीय निर्माताओं को ऐसे में बारकोड अपनाने के लिये राजी किया जब उनकी इच्छा ऐसा करने की बिल्कुल भी नहीं थी लेकिन एक बार उसे अपनाने के बाद अब वे अपने उत्पादों को बिग बाजार जैसे बड़े खुदरा स्टोरों में सफलतापूर्वक बेच रहे हैं।

अबतक की अपनी उपलब्धियों के बारे में बात करते हुए वे कहते हैं, 'मुझे राजस्थान सरकार द्वारा एक इस्राइली संयुक्त उद्यम के लिये पैकेजिंग परामर्शदाता के रूप में चुना गया जहां वर्जिन ऑलिव ऑयल का निर्यात होना था।' अपनी उपलब्धियों के बारे में आगे बात करते हुए वे बताते हैं कि उनकी पैकेजिंग ने कैसे एक जीपीएस डिवाइस निर्माता को सरकारी पुरस्कार जीतने में काफी मददगार भूमिका निभाई।

अंशुमन को पैकेजिंग के क्षेत्र में बहुत अधिक संभानाएं दिखाई देती हैं और उन्हें इस बात का पूरा भरोसा है कि सरकार द्वारा एक पूरी तरह से समर्पित सूचना निकाय की स्थापना पूरे उद्योग जगत को पैकेजिंग की महत्ता के बारे में रूबरू करने में कारगर साबित होगी। इसके अलावा ऐसा होने से उद्योगों को वैश्विक पैकिजिंग प्रथाओं और मानकों को लागू करने और अपनाने में भी काफी मदद मिलेगी।

अपने सामने आने वाली चुनौतियों के बारे में बात करते हुए अंशुमन कहते हैं कि सबसे बड़ी चुनौती है एक सेवा के रूप में परामर्श के काम को लेकर अनभिज्ञता का माहौल और वह भी असंगठित क्षेत्र में। वे कहते हैं, 'आमतौर पर लोग सोचते हैं कि उन्हें ज्यादा जानकारी है और किसी परामर्शदाता को अपने साथ जोड़ना फिजूलखर्च है।' नतीजतन, अंशुमन के सामने सबसे बड़ी चुनौती उन्हें यह बात समझाना है कि क्यों उन्हें एक परामर्शदाता की सेवाओं की आवश्यकता है और यह कैसे उनके लिये फायदेमंद साबित हो सकता है।

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