10 साल की उम्र में पिता के गुज़र जाने के बाद भी 'श्रव्या' ने पूरे किए सपने, छोटे कस्बों के बड़े सपनों की पौध सींचने में जुटीं

By belal jafri|25th May 2015
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श्रव्या ने बड़ी नौकरी और चमकदार करियर को छोड़ा...

कस्बों के बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए प्रयासरत...

छोटे कस्बों के बच्चों को बड़े सपने दिखाने की कोशिश...

बच्चों के नए तरीके से पढ़ाने में जुटीं...



श्रव्या ने एक ऐसा काम किया जिसपर सिर्फ पुरुषों का वर्चस्व था। भारत में ही नहीं बल्कि दुनिया भर में। तेल रिसाव से जुड़ा प्रोजेक्ट।श्रव्या की इच्छा हुई कि वो इस भागदौड़ भरी जिंदगी से पीछा छुड़ाकर सुकून की जिंदगी जिए। उनकी यह इच्छा उन्हें घूम-फिरकर आंध्र प्रदेश के छोटे से कस्बे में स्थित उनके खुद के घर ले आई। यहां से उन्होंने खोज प्रौद्योगिकी और शिक्षा के माध्यम से लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने की ठानी। प्रेसीडेंसी किड्स प्री-स्कूल्स की सह संस्थापक होने के नाते, उनमें युवाओं को सपने पालने के लिए प्रेरित करने के साथ ही उन्हें हकीकत की शक्ल देने की ख्वाहिश थी। इसके साथ ही उनके मन में टीचर्स व स्टूडेंट्स को शिक्षा प्रणाली में पॉजिटिव बदलाव लाने के लिए प्रेरित करना भी था।

श्रव्या, सह संस्थापक, प्रेसीडेंसी किड्स प्री-स्कूल्स

श्रव्या, सह संस्थापक, प्रेसीडेंसी किड्स प्री-स्कूल्स


निज़ामाबाद के एक मध्यम वर्गीय परिवार में पली-बढ़ीं श्रव्या को बचपन में असुरक्षित माहौल मिला। जिसके चलते उनमें आत्मविश्वास की कमी भी रही। जब वह बाहरी दुनिया के संपर्क में आईं तो उन्हें अहसास हुआ कि वह एक तालाब में किसी मेंढक की तरह हैं। लेकिन इसके बाद उन्होंने अपने माइंडसेट को बदलने की ठान ली और कस्बे से बाहर निकलकर राजस्थान स्थित बिट्स पिलानी इंजीनियरिंग इंस्टीट्यूट जॉइन कर लिया।

यहां की दुनिया श्रव्या के लिए एकदम अजनबी सी थी। उन्हें यहीं इस बात का अहसास हुआ कि दुनिया को पछाड़कर आगे निकल जाना जिंदगी का नाम नहीं बल्कि लोगों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना जिंदगी का मकसद होना चाहिए। श्रव्या जब तक इस इंस्टीट्यूट में रहीं, इस दरमियान उन्होंने प्रोजेक्ट 'सक्षम' शुरू किया। इसके जरिये उन्होंने ग्रामीण महिलाओं के जीवन को बेहतर बनाने के लिए प्रयास किया। श्रव्या ने महिलाओं को आर्थिक स्तर पर उचित फैसले लेने में सक्षम बनाने पर जोर दिया। यह अफसोसजनक था कि यह प्रोजेक्ट सफल नहीं हो सका। इसके बावजूद उन्हें इस प्रोजेक्ट के माध्यम से लोगों को जीविका शान से चलाने का रास्ता मिला। इसके बाद वह सामाजिक बदलाव के उद्देश्य से इसी राह पर चल पड़ीं। स्नातक की पढ़ाई पूरी होने के बाद श्रव्या ने ऑयलफील्ड सर्विसेज कम्पनी श्लमबर्गर को बतौर फील्ड इंजीनियर जॉइन किया। उन्होंने छह सालों में कंपनी के विभिन्न पदों पर रहते हुए पांच देशों में काम किया। इस बीच बचत के पैसों से उन्होंने सह संस्थापक रहते हुए ग्रासरूट्स फेलोशिप प्रोग्राम शुरू किया। इसका उद्देश्य युवा ग्रामीणों को उद्यमी बनाना था। इसके तहत उन्होंने युवाओं की शिक्षा व उद्यम कौशल पर फोकस करते हुए कुल 32 परियोजनाओं पर काम किया। यद्यपि ऐसा करना खुद में एक आदर्श उदाहरण था लेकिन अपने कार्यों को वह सफलता के सांचे में ढालने में असफल रहीं। इस बीचश्रव्या ने श्लमबर्गर से जुड़े रहते हुए तीन महाद्वीपों के अल्जीरिया, यूएसए, कतर,दुबई व भारत आदि देशों में काम किया। तेल रिसाव कम्पनी में अपने काम के अनुभव के आधार पर श्रव्या कहती हैं कि 

हर महिला को अपने जीवन में चुनौतियों को स्वीकारने से पीछे नहीं हटना चाहिए। उसे शारीरिक श्रम करना चाहिए। ऐसा करने से ही वह हकीकत में सम्मान के योग्य होगी। यह विश्वास मुझमें तब जगा जब मैं सहारा रेगिस्तान में तेल रिसाव संयंत्र में हाड़तोड़ मेहनत करती थी। यह मेरे लिए आश्चर्य की बात थी कि उस सुदूर इलाके में दो-तीन सौ मील में मैं इकलौती ऐसी औरत थी जो किसी पुरुष से कमतर नहीं थी।
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श्रव्या बताती हैं कि उनके पिता का एक दुर्घटना में आकस्मिक निधन होना उनके जीवन की सबसे बड़ी चुनौती थी। इस हादसे के वक्त वह काफी छोटी थीं। श्रव्या कहती हैं, 

उनके जाने के बाद मानो ऐसा लगा कि मेरे शरीर का बड़ा हिस्सा कहीं खो गया है। दस साल की उम्र में ही मैंने जीने की लगभग सारी उम्मीदें छोड़ दी थीं। मुझे कोई भी राह नहीं सूझ रही थी। अगले सात सालों तक मैं इसी उम्मीद के साथ सोती रही कि हो सकता है कि शायद अगली सुबह पिता की मौत बुरा सपना साबित हो जाए।

एक बार कुआलालांपुर में बिजनेस ट्रिप के दौरान भविष्य पर विमर्श हो रहा था। इस दौरान वह खुशी व संतोष के अंतर को समझने पर मजबूर हो गईं।' उस वक्त मुझे लगा कि मेरी प्रोफेशनल व पर्सनल लाइफ में सबकुछ अच्छा होने के बावजूद मुझे संतोष नहीं था।'

एक बार की बात है कि श्रव्या अपने माता पिता द्वारा स्थापित स्कूल के बच्चों के साथ घूमने गईं। इस यात्रा के दौरान बच्चों और उनके माता-पिता श्रव्या से उनके बारे में जानने को उत्सुक हुए। इस पूरी बातचीत और यात्रा में श्रव्या को अपना ज़िम्मेदारी का अहसास हुआ। श्रव्या समझ चुकी थीं कि अब उन्हें क्या करना है। वह यह जान चुकी थीं कि अगर लोगों की जिंदगी को बेहतर बनाना है तो शिक्षा को आधार बनाना होगा। इसी उद्देश्य को मुकाम तक पहुंचाने के लिए वह इन दिनों प्रेसीडेंसी हाईस्कूल में कार्यरत हैं। इसके साथ ही श्रव्या ने प्रेसीडेंसी किड्स प्री-स्कूल्स की सह संस्थापना की।

श्रव्या के लिए अपने चमकते करियर को छोडऩे के लिए अपने पति को मनाना कोई बड़ी चुनौती नहीं थी। दिक्कत पर्सनल लेवल पर थी। श्रव्या को अपने उद्देश्य में हकीकत के रंग भरने के लिए वापस उसी कस्बे में लौटना था जहां से वह अरसे पहले भाग निकलने को बेसब्र थीं। ऐसा करने के लिए उन्हें दृढ़ संकल्पित होना था। जो कि आसान नहीं था। आखिरकार, सभी चिंताओं और आशंकाओं से पार पाते हुए श्रव्या ने अपने छोटे शहर की ओर कूच किया। श्रव्या के मुताबिक, भारतीय शिक्षा प्रणाली की सबसे बड़ी समस्या यह है कि यहां शिक्षा और पढ़ाई को समानांतर लेवल पर लाकर खड़ा कर दिया गया है। यहां पढ़ाई शुरू होने को ही जीवन के मायने सीखना भी मान लिया जाता है। श्रव्या कहती हैं कि जब बात लड़कियों की पढ़ाई की आती है तो माता-पिता अकसर सीमित दायरों में उसके करियर के विकल्पों को तय कर देते हैं। वे उसे दुनिया के तमाम क्षेत्रों से दूर रखते हैं। जिससे लड़कियों में उस शक्ति का अहसास न्यूनतम हो जाता है जिससे कि वह यह तय कर सकें कि वे आखिर कितने बड़े सपने देख सकती हैं। भावनात्मक व सामाजिक पाठ्यक्रम पर जोर देते हुए श्रव्या इन दिनों एक तय विजन के साथ लोगों को जिंदगी के असल मायनों को सहज व हंसमुख तरीके से सीखने के लिए काम कर रही हैं। वह तमाम प्रयोगों के जरिए लोगों को खुद के बारे में जानना सिखाती हैं। उन्हें यह अहसास दिलाती हैं कि गलतियां भूल जाने के लिए होती हैं। इसके अलावा शिक्षा के साथ-साथ तकनीक पर भी परस्पर जोर देते हुए कहती हैं- ' तकनीक में दुनिया बदलने की कूबत है। इसके जरिए कठिन से कठिन स्थितियों से आसानी से निबटा जा सकता है। बच्चों को स्पेलिंग, शब्दकोश व अल्जेब्रा आदि से परिचित कराने के लिए मैं और हमारी टीम एप आधारित शिक्षा को बढ़ावा दे रहे हैं।' इसके अलावा क्लासरूम्स में शिक्षकों व बच्चों के बीत आपसी तालमेल के अनुकूल माहौल बनाना और उनके बीच संवाद स्थापित करने के लिए प्रतिबद्धता पहली प्राथमिकता रहती है। स्कूल के लिए तीन प्रमुख मील के पत्थर हैं- मूल्यांकन में बदलाव, शिक्षकों से जुड़ने के लिए एक प्लेटफॉर्म मुहैया कराना व सामाजिक-भावनात्मक पाठ्यक्रम रखना। इन तीनों के चलते बच्चे खुद को सबसे बेहतर ढंग से प्रदर्शित कर सकते हैं। प्रेसीडेंसी समान विचारों वालों की तलाश कर रहा है ताकि उनके मिशन को प्रोजेक्ट्स के जरिए ऊपर ले जाया जा सके। जिससे कि बाल विकास के क्षेत्र में अतुलनीय योगदान दिया जा सके। श्रव्या की माता और उनके पति मिशन को मुकाम तक पहुंचाने के लिए उनके साथ हैं। श्रव्या कहती हैं कि इन दोनों के अलावा मेरे लिए वे सभी लोग प्रेरणास्रोत हैं जो समाज में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए जूझन को तैयार हैं। ऐसे लोगों का हमेशा स्वागत है।

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