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आदिवासी भाषा और साहित्य को ज़िंदा रखने की जिद्द

Sahil
26th Aug 2015
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उन्हें एक आदिवासी गांव में पीटा गया, उनके कंधे टूट गए और इलाज के लिए उन्हें अपने घर विशाखापट्टनम लौटना पड़ा। जिस दिन वो ठीक हो गईं, एस प्रसन्ना श्री फिर उसी गांव में वापस जाने और आदिवासियों के साथ नज़दीक से काम करने के लिए तैयार हो गईं। वो आदिवासियों के मौखिक साहित्य को समझना और इसे अक्षरों में लिपिबद्ध करना चाहती थीं।

1991 से 2005 के बीच, प्रसन्ना मध्य भारत के क़रीब 167 आदिवासी गांवों में कहानियां इकट्ठा करने, उन्हें समझने और लिखित रूप में रिकॉर्ड करने के लिए घूमती रहीं। साल 2006 से अब तक, वो ऐसी उपलब्धि हासिल कर चुकी हैं जिसके लिए अब तक किसी ने कोशिश तक नहीं की। अब तक, उन्हें 18 नई आदिवासी लिपियों की खोज का श्रेय जाता है।

ये कहानी एक डॉक्टरेट, प्रोफेसर और आंध्र प्रदेश यूनिवर्सिटी के इंग्लिश विभाग के बोर्ड ऑफ़ स्टडीज़ की अध्यक्ष एस प्रसन्ना की है। आज, वो दक्षिण भारत के किसी विश्वविद्यालय में जनजातीय समुदाय से आने वाली अंग्रेजी की शायद अकेली महिला प्रोफेसर हैं।

यात्रा की शुरुआत

प्रसन्ना ने 1991 में, जब उनकी बेटी बहुत छोटी थी, उस वक्त अराकू घाटी का दौरा किया था, जो विशाखापट्टनम के पास एक ख़ूबसूरत जगह है। अराकू घाटी में कई जनजातियां रहती हैं और प्रसन्ना उनके गीतों से इतनी प्रभावित हुईं कि जब भी वो आदिवासियों के गांव में जातीं, अपने पास एक टेप रिकार्डर रखती थीं। प्रसन्ना कहती हैं, “आदिवासियों के साथ घुलना-मिलना कोई आसान काम नहीं था, क्योंकि वो अपने समुदाय से बाहर के लोगों को बाहरी समझते हैं। मैं उनके गांव अक्सर जाने लगी थी तो वो मुझे संदेह की नज़र से देखने लगे। उन्हें एक तरह का डर जकड़ रहा था। गांव के मुखिया मेरी यात्रा को सामान्य न समझकर, मेरे इरादों को भांपने की कोशिश करते। लंबे समय तक उनसे बातचीत करने और उनकी भाषा सीखने के बाद, उन्होंने धीरे-धीरे मुझे स्वीकार करना शुरू किया। इस तरह मेरी यात्रा काफ़ी संघर्षमय रही।”

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अपनी जड़ों को खोजना

जनजातियों में जड़ें होने के चलते प्रसन्ना आदिवासियों को बेहतर तरीके से समझना चाहती थी। उनके पूर्वजों का घर प्रकासम जिले के पास एक आदिवासी गांव में था। हालांकि, वो वहां कभी नहीं रही थीं लेकन उन्हें पता था कि किस तरह जनजातियां संसाधनों के लिए डराईं और उत्पीड़ित की जाती हैं। प्रसन्ना की दादी मां ने एक बार उनसे कहा था कि ‘क्या तुम दुनिया को अपनी आंखों से देखना चाहती हो या फिर चश्मे के साथ ?’ प्रसन्ना ने स्वाभाविक तौर पर कहा - “अपनी आंखों से”। इसी दौरान, उन्होंने किसी की मातृभाषा जानने और उस पर गर्व करने का मतलब समझाया, बजाय मुख्य धारा की भाषा के जरिए किसी को समझने के। प्रसन्ना कहती हैं, “अपने चारों तरफ़ की दुनिया से चीजें अपनाने में निश्चित रूप से कुछ भी गलत नहीं है, लेकिन हर किसी को अपनी जड़ों को जानना और इससे जुड़े होने पर गर्व होना चाहिए।” आजकल वो आदिवासी मौखिक परंपरा के संरक्षण, जनजातीय समुदायों और व्यक्तियों को पहचानने, महिलाओं के क्रेडिट समूहों, स्कूलों, युवा समूहों और सामुदायिक नेताओं से मिलने और उन्हें अपने जीवन की गुणवत्ता की सुधार के लिए प्रोत्साहित करने, दूसरी आदिवासी भाषाओं के ज्ञान के लिए जागरुकता फैलाने, जनजातीय भाषाओं के विस्थापन के खिलाफ अभियान चलाने और जनजातीय भाषा बोलने वालों को समुदाय के बाहर और भीतर मजबूत करने की दिशा में काम करती हैं एवं इसके जरिए कई लोगों के लिए प्रेरणास्रोत बन रही हैं।

ढेर सारी चुनौतियां

कई जनजातीय समुदायों में स्वीकार्यता पाने के लिए उन्हें कड़ा संघर्ष करना पड़ा, इस बात के अलावा दूसरी सबसे बड़ी बात जो उनके लिए परेशान करने वाली थी, वो ये कि जनजातियां खुद अपने आसपास की मुख्यधारा की भाषाओं को अपनाने में जुटी थीं। ऐसे परिदृश्य में, उनकी भाषा के कई कीमती शब्द पहले ही खो चुके थे। प्रसन्ना ने सोचा कि जो कुछ भी जनजातियों का बेशकीमती साहित्य थोड़ा-बहुत बचा हुआ है, उसे रिकॉर्ड करने के लिए जल्द काम करना होगा।

ऐसे मुद्दे पर काम करने के लिए एक महिला होना प्रसन्ना के लिए दूसरी बड़ी समस्या थी। क्योंकि ब्यूरोक्रैसी से लेकर आम आदमी तक हर कोई उनके खिलाफ़ था। समाज के बड़े तबके के लोग आदिवासियों की हालत सुधारने के लिए उनके द्वारा किए जा रहे कामों को लेकर नाखुश थे। ब्यूरोक्रैसी को लगा वो आदिवासियों को शिक्षित कर रही हैं और उन्हें उनके अधिकारों के प्रति जागरुक कर रही हैं, जिससे आदिवासियों को उनके इरादों का पता लगाना आसान हो जाएगा।

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साथियों ने किया प्रेरित

दुनिया के दूसरे हिस्सों में उनकी ही तरह काम करने वाले लोग, जो गौरवशाली आदिवासी साहित्य को भाषा का रूप देकर पुनर्जीवित करना चाहते हैं, ऐसे लोगों ने उन्हें प्रेरित किया। अपने समाजशास्त्री पति और मैकेनिकल इंजीनियर बेटी से भी उन्हें अच्छा सहयोग मिला जिन्होंने 25 दुरूह सालों की कठिन यात्रा को पूरा करने में उनकी मदद की। अब तक प्रसन्ना श्री ने 25 किताबें लिखी हैं, जिनमें से उनकी कुछ किताबें कई यूनिवर्सिटीज़ के पाठ्यक्रम का हिस्सा हैं।

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