अरमान जो झोली में डाले, बिखर गए

By जय प्रकाश जय
July 14, 2017, Updated on : Thu Sep 05 2019 07:16:30 GMT+0000
अरमान जो झोली में डाले, बिखर गए
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जम्मू-कश्मीर के मशहूर शायर ‘प्यासा’ अंजुम को शायरी की हर सिन्फ़ में तबाआज़माई, ग़ज़ल-गीत और भजन में ख़ास मुक़ाम मिला है और उर्दू शायरी का एक और ऐसा ही जाना-पहचाना नाम है- अफरोज आलम। दोनो ही के अदबी मुक़ाम फिल्म, रेडिओ, दूरदर्शन, मीडिया के साथ एकेडमिक एवं अदबी संस्थाएं रही हैं। 

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प्यासा अंजुम का पहला नाम विजय उप्पल है। आटो मोबाइल इंजियरिंग में प्राइवेट और सरकारी नौकरी में जूनियर इंजीनियर के पद से रिटायर्ड होने के बाद से अदबी सफ़र ज़ारी है। वह मुख़तिल्फ़ ज़ुबानों में उर्दू, हिन्दी, पंजाबी, डोगरी आदि में शायरी करते हैं।

दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में पिछले दिनों जम्मू-कश्मीर के मशहूर शायर ‘प्यासा’ अंजुम के गजल संग्रह ‘मेरे कलम से’ का लोकार्पण आयोजित हुआ, जिसमें देश भर से आये कवि-साहित्यकारों को सम्मानित भी किया गया। शायर अंजुम ने अपनी पुस्तक के अनावरित होने के इस मौके पर कहा कि उनके चालीस सालों की तपस्या और पुस्तक प्रकाशन का सपना पूरा हुआ है। प्यासा अंजुम का पहला नाम विजय उप्पल है। आटो मोबाइल इंजियरिंग में प्राइवेट और सरकारी नौकरी में जूनियर इंजीनियर के पद से रिटायर्ड होने के बाद से अदबी सफ़र ज़ारी है। वह मुख़तिल्फ़ ज़ुबानों में उर्दू, हिन्दी, पंजाबी, डोगरी आदि में शायरी करते हैं। उन्हें शायरी की हर सिन्फ़ में तबाआज़माई, ग़ज़ल-गीत और भजन में ख़ास मुक़ाम मिला है। उनके अदबी मुक़ाम फिल्म, रेडिओ, दूरदर्शन, मीडिया के साथ एकेडमिक एवं अदबी संस्थाएं रही हैं।

प्यासा अंजुम के ताजा संकलन 'मेरे कलम से' में उन गजलों को शामिल किया गया है, जो बेहद मकबूल हुई हैं। उनका स्वर कथ्य के धरातल पर जनजीवन की समतल भूमि की ओर मुखर होता है। मनु भारद्वाज मनु लिखते हैं- आज के बदलते हालात, सामाजिक एवं समाज से जुड़े व्यक्तियों के व्यक्तिगत अहसासात और मानवीय मूल्यों का बखूबी चिंतन और चित्रण करता है यह संकलन। 

इस संकलन की एक-एक गजल मानो हजार-हजार मायने लेकर चलती है-

हर सिम्त किसने नूर उछाले बिखर गए।

छंटते ही शब सियाही उजाले बिखर गए।

यह ज़ख़्म इतने हद से बढ़े, कुछ न कर सके,

जितने भी दर्द हमने संभाले बिखर गए।

दिल को सुक़ून था मिला जब आंख बंद थी,

खुलते ही आंख ख़्वाब जो पाले बिखर गए।

जो था नसीब में लिखा 'अंजुम' मिला वही,

अरमान जो भी झोली में डाले बिखर गए।

मुल्क और अपने सूबे के ताजा हालात को भी वह अपने बारीक लफ्जों से फिसलने नहीं देते हैं। इन मुहावरेदार पंक्तियों में वक्त की नजाकत कुछ इस तरह बयां होती है-

किस बात पे अभी भी है सूई अड़ी हुई।

फिर से सुना रहे हो कहानी सुनी हुई।

ख़ामोश भीढ़ बह रही लावे की शक़्ल में,

हर इक नज़र में है लगे नफ़रत भरी हुई।

प्यासा अंजुम के शब्दों में देश की गरीब और मेहनतकश आबादी का भी दुख-दर्द सहज-सहज शब्दों में कुछ इस तरह छलक उठता है-

हमसे ख़ुशी है कोसों दूर।

हमको कहते हैं मजदूर।।

रूखी सूखी खा लेते हैं।

वक़्त के हाथों हैं मजबूर।।

वक्त की ओर इशारा करते हुए वह अपनी इन चार पंक्तियों में वह बहुत कुछ कह जाते हैं-

आज तुम जो भी लिखो कल को पुराना होगा।

अब हक़ीक़त जो लगे कल वो फ़साना होगा।

आज की अब ही करोगे जो वही तो होगी,

कल पे छोड़ोगे तो गुज़रा ही ज़माना होगा।

उर्दू शायरी का एक और जाना-पहचाना नाम है- अफरोज आलम। बिहार की पैदाइश और कुवैत में रिहाइश अपने रोजगार सिलसिले में। उर्दू अदब में कई किताबें छपने के बाद एक बार फिर से नई गजलों, नज्मों के साथ 'धूप के आलम' का नया संस्करण आया है। देवनागरी लिपि यानी हिंदी में उर्दू शायरी का लुत्फ लेना, हिंदी भाषी पाठकों के लिए एक शानदार अनुभव होगा। इसका प्रकाशन दिल्ली से हुआ है, जिसमें 85 गजलें और 84 नज्में शामिल हैं।

मैं अपने शौक से जादू नगर में ठहरा हूं।

मैं इस गिरफ्त से बाहर निकल भी सकता हूं।

गजल की नजाकत, वो तेवर, वो नफासत, वो अंदाज, वो बयां, जो दिल के तारों में तरंग पैदा कर दें, अहसास को जगाकर झंकार पैदा कर दें और उर्दू जुबान की मिठास से रू-ब-रू करा दें। जब ऐसी गजल के शेर पढ़ते-पढ़ते हमारे अंदर घुलने-मिलने लगें तो समझिए, ये हमारी-आपकी दास्तां है। शेर, जो जिंदगी के तमाम खट्ठे-मीठे तजुर्बों का, अनकहे खूबसूरत अहसासों का अक्स है, जिनमें इंसानी फितरत अपने अलग-अलग रूपों में नुमाया होती है।

अफरोज आलम की शायरी में इश्क-ओ-मुहब्बत की अदायगी ही नहीं, दुनियावी फिक्रोफन को भी बड़ी संजीदगी से तवज्जो दी गई है, जो शायर के सोच को बड़े फलक पर लाकर खड़ा करती है, मसलन-

जगा जुनूं को जरा नक्श ए मुकद्दर खींच।

नई सदी को नई करबला से बाहर खींच।

मैं जहनी तौर पर आवारा हुआ जाता हूं,

मेरे शऊर मुझे अपनी हद के अंदर खींच।

कुछ वाकिये इंसान उम्र के किसी भी मकाम पर न भूलता है, न उसकी कसक कम होती है बल्कि वो हमेशा के लिए दिलओदिमाग पर चस्पां हो जाते हैं। 'कसक' इसी तरह की नज्म है। 'ग्लोबलाइजेशन' में दुनिया के आज और कल की फिक्र है। एक चेतावनी है कि अब संभल जा ताकि आने वाले वक्त में हमारी आदतें और हरकतें कहीं हमें शर्मसार न कर दें।

कोई परिंदा तोड़ के पिंजरा दूर पहुंचने वाला है,

शायद किसी सैयादे पर एक दुनिया बसने वाली है।