रोशनी से नहा उठीं दृष्टिहीन प्रांजल

By जय प्रकाश जय
June 14, 2017, Updated on : Thu Sep 05 2019 07:16:30 GMT+0000
रोशनी से नहा उठीं दृष्टिहीन प्रांजल
दृष्टिहीन प्रांजल पाटिल को यूपीएससी में मिली 124वीं रैंक...
  • +0
    Clap Icon
Share on
close
  • +0
    Clap Icon
Share on
close
Share on
close

"जब आंखों के आगे दूर तक अंधेरी दुनिया बिछी हो और एक दिन अचानक कामयाबी कदम चूमने लगे तो मन को कैसा लगता है, उन होनहारों से पूछा जा सकता है, जिन्होंने हाल ही में ऊंची छलांग लगाकर अनगिनत लोगों का दिल जीत लिया है। उनमें ही एक हैं महाराष्ट्र की रहने वाली जेएनयू की रिसर्च स्कॉलर प्रांजल पाटिल।"

<h2 style=

रिसर्च स्कॉलर प्रांजल पाटिल, फोटो साभार: a12bc34de56fgmedium"/>

प्रांजल पाटिल, नमामि बंसल, मोहन, जोसेफ, हरिकेश, अर्जुन जाने ऐसे कितने नाम हैं, जो जीवन के अंधेरे से जूझते-जूझते अचानक रोशनी से नहा उठे हैं। इनमें प्रांजल तो पूरी तरह दृष्टिहीन हैं।

जब आंखों के आगे दूर तक अंधेरी दुनिया बिछी हो और एक दिन अचानक कामयाबी कदम चूमने लगे तो मन को कैसा लगता है? ये बात उन होनहारों से पूछी जा सकती है, जिन्होंने हाल ही में ऊंची छलांग लगाकर अनगिनत लोगों का दिल जीत लिया है। उनमें ही एक हैं महाराष्ट्र की रहने वाली जेएनयू की रिसर्च स्कॉलर प्रांजल पाटिल।

महाराष्ट्र की प्रांजल पाटिल को दोनो आंखों से दिखता नहीं है। द्विव्यांगता के कारण ही वर्ष 2015 में यूपीएससी परीक्षा में 773वीं रैंक आने के बावजूद रेल मंत्रालय ने उन्हें यह कहते हुए नौकरी देने से इनकार कर दिया था, कि वह तो पूरी तरह से दृष्टिहीन हैं। प्रांजल ने फिर भी हार नहीं मानी और हाल ही में जब यूपीएससी के परिणामों का पिटारा खुला, तो उन्हें मिली 124वीं रैंक और करवट लेते वक्त ने उनकी जिंदगी में चारों तरफ उजाला भर दिया।

ये भी पढ़ें,

IAS बनने के लिए ठुकराया 22 लाख का पैकेज, हासिल की 44वीं रैंक

उत्तराखंड के ऋषिकेश की रहने वाली हैं नमामि बंसल। उनके पिता की बर्तन की छोटी सी दुकान है। घर का खर्च-बर्च मुश्किल से चलता है। नमामि के मन में ऊंची उड़ान के सपने तैरते रहते थे। पूरा करने की ज़िद थमी नहीं। घर में ही किताबों से गहरा नाता जोड़ लिया और सिविल सेवा परीक्षा में देशभर में उन्हें 17वीं रैंक नसीब हो चुकी है।

'कौन कहता है कि आसमान में सुराख हो नहीं सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों...' दुष्यंतकुमार की इन पंक्तियों को साकार कर रहे हैं सुपर-30 के युवा। उनमें कोई बेरोजगार पिता का बेटा केवलिन तो कोई सड़क किनारे अंडे बेचने वाले का बेटा अरबाज आलम, कोई खेत मजदूर का बेटा अर्जुन, तो कोई भूमिहीन किसान का बेटा अभिषेक। इन सभी ने इस बार जेईई में सफलता के परचम फहरा दिए हैं।

कुछ ऐसा ही वाकया है हैदराबाद के वी मोहन अभ्यास का। घर की माली हालत निम्न मध्यमवर्गीय परिवार से भी गई-बीती है। उनके पिता मामूली सी दुकान में समोसा बेचते हैं। जैसे-तैसे घर खर्च चलता है, लेकिन पिता वी शुभा राव ने परिस्थितियों से बिना कोई समझौता किए बिना मोहन को आईआईटी रुड़की जोन की उंगली थमाई, तो उसने जी-मेन में 55वीं रैंक और जी-एडवांस में 64वीं रैंक से अपना घर-आंगन जगमगा दिया। यद्यपि मोहन की उम्मीद थी, कि मेरिट में उन्हें 50वीं रैंक तक कामयाबी मिल सकती है। वह एपीजे अब्दुल कलाम के बड़े फैन हैं। उनकी ही तरह वैज्ञानिक बनने के सपने देख रहे हैं। ऐसे ही हैं दिहाड़ी मजदूर के बेटे जोसफ के. मैथ्यू, जो आइएएस के लिए सलेक्ट हुए हैं। उन्हें 574वीं रैंक मिली है।

ये भी पढ़ें,

कॉलेज की फीस के लिए पैसे नहीं थे और UPSC में कर दिया टॉप

एक हैं मथुरा (उ.प्र.) के एसएसपी के ड्राइवर मानसिंह। बेटे हरिकेश ने मुद्दत तक जब अपने मातहत पिता को अदनी सी मुलाजिमी करते देखा तो मन में सपना जाग उठा, कि वह भी अब बनेगा तो कप्तान ही बनेगा। उससे कमतर कोई नौकरी नहीं करेगा। ठान ली। वक्त ने, मशक्कत ने साथ दिया और पहली ही परीक्षा में हरिकेश बन गए आईपीएस। संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा सिविल सर्विसेज 2016 में इनको 336वीं रैंक मिली है। जेईई एडवांस 2017 के टॉपर हैं पंचकूला के सर्वेश मेहतानी। प्रतिभा रंग लाई। इतिहास रच दिया। आजकल के आम युवाओं की तरह न स्मार्टफोन, न सोशल मीडिया से कोई नाता। बस डोरेमॉन कार्टून देखते-देखते छा गए।

ऐसी ही शोहरत साझा कर रहे हैं चार दोस्त, पटना के इंबिसात अहमद, दरभंगा के सलमान शाहिद, मुजफ्फरपुर के सैफी करीम और कश्मीर के मुबीन मसूदी। श्रीनगर में 'राइज़' नाम से इंजीनियरिंग की कोचिंग क्लासेज चला रहे हैं। चारों दोस्त खुद भी इंजीनियर हैं। इंबिसात, सलमान IIT खड़गपुर के बैचमेट हैं, तो सैफी दिल्ली टेक्निकल यूनिवर्सिटी से इंजीनियरिंग में ग्रेजुएट। इस वर्ष इनकी कोचिंग के 41 छात्रों ने IIT-JEE की एडवांस परीक्षा क्वालिफाइ की है। चारों दोस्त बिहार-झारखंड के नक्सल प्रभावित इलाकों में भी कोचिंग दे चुके हैं।

इसी तरह की कामयाबी का शिखर चूम रहे हैं लखनऊ (उ.प्र.) के अजीत सिंह, जिन्होंने और कुछ नहीं किया, बल्कि गूगल को अपना गुरु बनाया और करोड़पति बन गए। इन्होंने साल-डेढ़ साल पहले ही मात्र 25 हजार रुपए से अपनी कंपनी की शुरुआत की थी। आज वह सफल बिज़नेसमैन हैं। इन्हे बचपन से कबाड़ से नई चीजें बनाने का शौक रहा है। दो हजार के वेतन पर दिन काटने के दौरान ये गूगल पर नजरें गड़ाए रहे। धीरे-धीरे तरह-तरह के प्रयोग करने लगे। नवंबर 2015 में दो कर्मचारियों के साथ खुद की 'ग्रीन स्टोन' कंपनी खोल ली। 'बेस्ट अड्डा' ई-कॉमर्स वेबसाइट का काम शुरू कर उस पर अपने प्रोडक्ट बेचने लगे। देखते ही देखते लखनऊ के पॉश इलाके में 15 हजार रुपए मासिक का खुद का ऑफिस ले लिया है, काम चल निकला है और अजीत सिंह रातों-रात हिरो बन गये।

ये भी पढ़ें,

सुपर-30 ने फिर रचा इतिहास, सभी 30 गरीब बच्चों ने पास की IIT की परीक्षा