कक्षा 3 तक पढ़े, नंगे पांव चलने वाले इस कवि पर रिसर्च स्कॉलर करते हैं पीएचडी

By Manshes Kumar
August 28, 2017, Updated on : Thu Sep 05 2019 07:16:30 GMT+0000
कक्षा 3 तक पढ़े, नंगे पांव चलने वाले इस कवि पर रिसर्च स्कॉलर करते हैं पीएचडी
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शरीर पर सिर्फ नाम मात्र साधारण कपड़े पहनने और नंगे पांव चलने वाले हलधर की कविताओं में औरत की आजादी का आह्वान उसके आंसुओं और समस्याओं में है। जिसे वे गांव-गांव जा कर गाते है।

हलधर नाग (फोटो साभार: सोशल मीडिया)

हलधर नाग (फोटो साभार: सोशल मीडिया)


हलधर के सादगी भरे पहनावे से बयां होता है कि वे बेहद सामान्य श्रेणी से उठकर आये है। इसके बावजूद वे कहते हैं कि पेट दिखाकर किसी से संवेदना की भीख मांगना उनका मकसद नहीं है। 

हलधर ने अपनी पहली कविता धोडो बारगाछ साल 1990 में लिखी थी, जिसका मतलब होता है 'बरगद का बूढ़ा पेड़' और इस कविता को जगह मिली थी एक लोकल मैगजीन में।

इस देश में क्षेत्रीय भाषा और दूरदराज के ग्रामीण इलाके के साहित्यकारों को हमेशा से उपेक्षा का सामना करना पड़ा है। इसकी जीती जागती मिसाल हैं, हलधर नाग। हलधर नाग कोसली भाषा के कवि और लेखक हैं। यह भाषा ओडिशा में बोली जाती है। 'लोककवि रत्न' के नाम से मशहूर कवि हलधर नाग ने करीब 20 रचनाएं की हैं। एकदम सादगी से जीवन जीने वाले नाग को भारत सरकार ने 2016 में पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया था।

हलधर का जन्म आज से लगभग 67 साल पहले 1950 में ओडिशा के बारगढ़ में एक बेहद गरीब परिवार में हुआ था। घर की दयनीय आर्थिक स्थिति के चलते वे कक्षा तीन के आगे नहीं पढ़ पाए थे। इसके बाद भी उन्हें अत्यंत कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। जब वे दस साल के थे तो उनके पिता का साया उनके ऊपर से उठ गया। घर की हालत काफी बुरी थी जिसे सुधारने के लिए उन्होंने एक मिठाई की दुकान पर बर्तन धोने का काम पकड़ लिया। इससे होने वाली कमाई से वे अपने घर को चलाने में मदद करते थे।

हलधर नाग (फोटो साभार: सोशल मीडिया)

हलधर नाग (फोटो साभार: सोशल मीडिया)


इसके दो साल बाद गांव के सरपंच ने उन्हें स्कूल भेजा लेकिन उन्होंने यहां पढ़ाई करने के बजाय खाना बनाने का काम किया। आप यकीन नहीं करेंगे, उन्होंने 16 साल तक इस स्कूल में बतौर रसोइया काम किया। हलधर ने इस काम को छोड़कर स्टेशनरी की एक छोटी सी दुकान खोल ली। इसके लिए उन्होंने बैंक से 1,000 रुपए लोन भी लिए। 

हलधर नाग ने अपनी पहली कविता धोडो बारगाछ साल 1990 में लिखी थी। जिसका मतलब होता है 'बरगद का बूढ़ा पेड़' और इसे एक लोकल मैगजीन में जगह मिली थी। इसके बाद उन्होंने अपनी चार कविताओं को पत्रिका में प्रकाशित होने के लिए भेजा।

हलधर नाग (फोटो साभार: सोशल मीडिया)

हलधर नाग (फोटो साभार: सोशल मीडिया)


हलधर ने गांव वालों को अपनी कविताएं सुनाना शुरू किया जिससे वह उन्हें याद रख सकें और गांववाले भी बड़े प्यार से उनकी कविताएं सुनते थे। लोगों को हलधर की कविताएं इतनी पसंद आई कि वो उन्हें लोक कवि के नाम से बुलाने लगे। हलधर हमेशा नंगे पैर रहते हैं उन्होंने कभी किसी भी तरह का जूता या चप्पल नहीं पहना है। वे बस एक धोती और बनियान पहनते हैं। वे कहते हैं कि इन कपड़ो में वो अच्छा और खुला महसूस करते हैं।

हलधर समाज, धर्म, मान्यताओं और बदलाव जैसे विषयों पर लिखते हैं। उनका कहना है कि कविता समाज के लोगों तक संदेश पहुंचाने का सबसे अच्छा तरीका है।

पद्मश्री हलधर नाग (फोटो साभार: सोशल मीडिया)

पद्मश्री हलधर नाग (फोटो साभार: सोशल मीडिया)


हलधर की कविताओं में औरत की आजादी का आह्वान उसके आंसुओं और समस्याओं में है। जिसे वे गांव-गांव जा कर गाते है। उनकी कविताओं में जातिभेद का दुःख आरक्षण को निशाने पर लेकर चुप नहीं होता। वह दुःख रोजमर्रा का संघर्ष है जो निरन्तर घटित होता है, जिसे हलधर सिर्फ बयान करते है। इसीलिए उन्हें लोककवि का दर्जा दिया गया। 

वे कहते हैं कि लोगों की बात लोगों की जुबान में कहने से लोगों को अपनापन महसूस होता है और लड़ने का हौसला मिलता है। एक जन आंदोलन की तैयारी इसी तरह होती है।

हलधर नाग (फोटो साभार: सोशल मीडिया)

हलधर नाग (फोटो साभार: सोशल मीडिया)


हलधर के सादगी भरे पहनावे से बयां होता है कि वे बेहद सामान्य श्रेणी से उठकर आये है। इसके बावजूद वे कहते हैं कि पेट दिखाकर किसी से संवेदना की भीख मांगना उनका मकसद नहीं है। यही वजह है कि सिर्फ तीसरी कक्षा तक पढ़े हलधर अपनी जन आवाज से कई स्कॉलरों को अपनी कविताओं पर रिसर्च करने के लिए आकर्षित करते है।

उनको जब सम्मान मिला तो वे नंगे पांव ही राष्ट्रपति भवन पहुंचे। यह प्रतीक है कि हमारी परम्परा राष्ट्रपति भवन पर नंगे पैर पहुंची। 

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