प्राकृतिक खेती से प्रकृति के साथ तालमेल बढ़ने से होंगे व्यापक लाभ: कृषि मंत्री तोमर

By रविकांत पारीक
April 26, 2022, Updated on : Tue Apr 26 2022 04:33:06 GMT+0000
प्राकृतिक खेती से प्रकृति के साथ तालमेल बढ़ने से होंगे व्यापक लाभ: कृषि मंत्री तोमर
केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने यह बात विज्ञान भवन, नई दिल्ली में नीति आयोग द्वारा नवोन्वेषी कृषि विषय पर आयोजित राष्ट्रीय कार्यशाला के उद्घाटन सत्र में कही।
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केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा है कि प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशव्यापी अभियान प्रारंभ किया है और इस दिशा में केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण विभाग भी मिशन मोड में कार्य करने जा रहा है। कृषि संबंधी पाठ्यक्रमों में भी प्राकृतिक खेती का विषय शामिल करने को लेकर बनाई गई समिति ने भी काम शुरू कर दिया है। तोमर ने कहा कि प्राकृतिक खेती के माध्यम से हमारा प्रकृति के साथ तालमेल बढ़ेगा, जिसके कृषि क्षेत्र में - गांवों में ही रोजगार बढ़ने सहित देश को व्यापक फायदे होंगे।

केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर नीति आयोग द्वारा नवोन्वेषी कृषि विषय पर आयोजित राष्ट्रीय कार्यशाला को संबोधित करते हुए।

केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर नीति आयोग द्वारा नवोन्वेषी कृषि विषय पर आयोजित राष्ट्रीय कार्यशाला को संबोधित करते हुए।

केंद्रीय मंत्री तोमर ने यह बात विज्ञान भवन, नई दिल्ली में नीति आयोग द्वारा नवोन्वेषी कृषि विषय पर आयोजित राष्ट्रीय कार्यशाला के उद्घाटन सत्र में कही। कार्यशाला में गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत भी शामिल हुए, वहीं केंद्रीय मत्स्य पालन, पशुपालन व डेयरी मंत्री परषोत्तम रूपाला वर्चुअल जुड़े थे। तकनीकी सत्रों में उ.प्र. के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री वाई.एस. जगन मोहन रेड्डी व उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी तथा प्रमुख कृषि विशेषज्ञों ने उद्बोधन दिया।


तोमर ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी अपनी दूरदृष्टि से परिस्थितियों का आभास करते हुए जनकल्याण के लिए योजनाओं का सृजन करते रहते हैं। रसायनिक खेती के दुष्प्रभावों का आंकलन करते हुए केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री मोदी के मार्गदर्शन में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने का निश्चय किया है।

तोमर ने कहा कि यह हमारी देशी प्राचीन पद्धति ही है, जिसमें खेती की लागत कम आती है और प्राकृतिक संतुलन स्थापित होने से किसानों को फायदा पहुंचता है। प्राकृतिक खेती रसायनमुक्त व पशुधन आधारित है, जिससे लागत में कमी के साथ ही किसानों की आय में वृद्धि व स्थिर पैदावार होगी तथा पर्यावरण व मृदा स्वास्थ्य सुरक्षित रखने में मदद मिलेगी। उन्होंने बताया कि कृषि मंत्रालय द्वारा भारतीय प्राकृतिक कृषि पद्धति (बीपीकेपी) की उप-योजना के माध्यम से किसानों को प्रेरित-प्रोत्साहित किया जा रहा है, जिसके परिणामस्वरूप प्राकृतिक खेती का रकबा बढ़ रहा है, जो अभी लगभग चार लाख हेक्टेयर क्षेत्र तक पहुंच चुका है।


केंद्रीय मंत्री तोमर ने कहा कि हमारी परंपराएं हैं, हमारे सिद्धांत है लेकिन युग के साथ चलना भी हमें आता है। हम लकीर के फकीर नहीं है। सभी को आगे बढ़ने की ललक है। समय के साथ हम अपने-आप को दुरुस्त करें, यह बात देश में आध्यात्मिक व व्यापारिक दृष्टि से स्थापित रही है, जो अब कृषि क्षेत्र में भी प्राकृतिक खेती को अपनाने के रूप में होना चाहिए। प्रकृति से संतुलन बैठाने वाली पद्धति के माध्यम से हम तेजी के साथ आगे बढ़ सकेंगे, जो समयानुकूल भी है। आज आवश्यकता इस बात की भी है कि कृषि क्षेत्र के माध्यम से रोजगार की उपलब्धता बढ़ें, पढ़े-लिखे युवाओं को गांवों में ही रोजगार मिलें। प्राकृतिक खेती के माध्यम से भूमि की सेहत तो ठीक होगी ही, नए रोजगार भी सृजित होंगे।


केंद्रीय मंत्री रूपाला ने कहा कि कोरोना के कारण लोगों के खान-पान में बदलाव आ रहा है और आर्गेनिक उत्पादों की मांग बढ़ रही है, जिसकी पूर्ति के लिए संज्ञान लिया जाना चाहिए। खेती के सामने कई चुनौतियां हैं, उन पर फोकस करते हुए किसानों को नई मांग के अनुरूप प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। उन्होंने आर्गेनिक रकबा बढ़ाने के लिए लागू किए गए लार्ज एरिया सर्टिफिकेशन सिस्टम हेतु कृषि मंत्री तोमर को धन्यवाद दिया, जिसके तहत सदैव रसायनमुक्त रही भूमि को आर्गेनिक घोषित किया जाता है। रूपाला ने कहा कि प्राकृतिक खेती के माध्यम से हमें अपनी परंपराओं से जुड़ने का अवसर मिला है। यह पद्धति भारत को विश्व में अग्रणी बनाने में मील का पत्थर सिद्ध होगी।


गुजरात के राज्यपाल देवव्रत ने कहा कि प्राकृतिक खेती में पौधे को पानी नहीं, बल्कि नमी चाहिए होती है। इस पद्धति में पहले साल लगभग 50 प्रतिशत पानी कम लगता है और तीसरे साल तक लगभग सत्तर प्रतिशत पानी की बचत होने लगती है। इस विधा में जीवाणु काफी संख्या में बढ़ते हैं, जो खेती की जान होती है। मृदा में कार्बन की मात्रा भी बढ़ती है, जो मृदा स्वास्थ्य के लिए बहुत आवश्यक है। राज्यपाल ने कहा कि रासायनिक खेती के दुष्परिणाम सबके सामने है, जो ग्लोबल वार्मिंग के लिए भी चौबीस प्रतिशत जिम्मेदार है। इसके कारण भूजल भी औसतन हर साल लगभग चार फीट नीचे जाता जा रहा है।


उन्होंने उदाहरण सहित बताया कि प्राकृतिक खेती में तीन फसल लेने का प्रयोग भी सफल हुआ है, वहीं पानी की कमी वाले क्षेत्रों में भी यह पद्धति सफल हो रही है। इस पद्धति का विस्तार होगा तो केंद्र सरकार द्वारा दी जा रही भारी खाद सब्सिडी की राशि की भी बचत होगी। देवव्रत ने कहा कि धरती को बंजर होने से बचाने, पानी की बचत करने व पशुधन के उपयोग की दृष्टि से हमें प्राकृतिक खेती को अपनाना ही होगा, जिसके लिए केंद्र सरकार, नीति आयोग तथा अन्य संस्थाओं के साथ मिलकर देशभर में युद्धस्तर पर अभियान चलाना शुरू किया गया है।


प्रारंभ में, नीति आयोग की वरिष्ठ सलाहकार (कृषि) डॉ. नीलम पटेल ने स्वागत भाषण दिया। नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत व सदस्य प्रो. रमेश चंद ने भी संबोधित किया। इस अवसर पर सफलता की कहानियों (हिंदी व अंग्रेजी) के संग्रह और प्राकृतिक खेती का अभ्यास करने वाले किसानों के वीडियो का विमोचन भी किया गया। आयोग के निवृत्तमान उपाध्यक्ष डॉ. राजीव कुमार भी उपस्थित थे।


Edited by Ranjana Tripathi