मजहब से बढ़कर है मानवता, जानें, कैसे सदफ़ आपा ने बचाई गर्भवती राजकुमारी और उसके बच्चे की जान

By belal jafri
April 19, 2016, Updated on : Thu Sep 05 2019 07:17:16 GMT+0000
मजहब से बढ़कर है मानवता, जानें, कैसे सदफ़ आपा ने बचाई गर्भवती राजकुमारी और उसके बच्चे की जान
मानवता और प्रेम की जिंदा मिसाल बन एक गरीब के घर खुशियाँ लाने वाली सदफ़ आपा की कहानी 
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वेद, पुराण, गीता, महाभारत, कुरान, बाइबल धर्मग्रन्थ कोई भी हो, धर्म कैसा भी हो उसने सदैव ही हमें ये बताया है कि एक महिला 'त्याग' 'बलिदान' 'ममता' की मूरत होती है और ईश्वर द्वारा बनाई गयी कोई भी रचना एक नारी से सुन्दर नहीं है। कहा जाता है कि शक्ति से ही ऊर्जा का संचार हुआ है। बिन शक्ति के ऊर्जा की कल्पना व्यर्थ है।

उपरोक्त पंक्तियों को पढ़ कर शायद आप ये सोचने पर मजबूर हो गए हों कि आखिर ऐसा क्या है जो आज एक कहानी की शुरुआत में हम इतने आध्यात्मिक हो गए हैं ? आज बात ही कुछ ऐसी है। आज की हमारी जो ये कहानी है इसका ख़ाका 22 फरवरी 2016 को तैयार हुआ था मगर ये आज भी उतनी ही ताज़ी है, उतनी ही अनूठी है जितनी ये 22 फरवरी को थी। 22 फरवरी को रोहित पैदा हुआ था। यूँ तो रोहित भी हिंदुस्तान में रोज़ाना पैदा होने वाले करोड़ों बच्चों में से एक है मगर जो बात इसे उन करोड़ों से अलग करती है वो है इसके जन्म से जुडी कहानी। इस कहानी के पात्र कुछ यूँ हैं रोहित, पेशे से चौकीदार उसका ग़रीब बाप केडी लाल , रोहित की माँ राजकुमारी और “सदफ़ आपा।”


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आगे बढ़ने से पहले आपको हम “सदफ़ आपा” से अवगत करा दें। सदफ़ आपा लखनऊ के एक प्रतिष्ठित स्कूल में शिक्षिका हैं जिन्हें हम रोहित की दूसरी माँ भी कह सकते हैं। सदफ़ आपा और उनकी सूझबूझ ही वो वजह है जिसके चलते आज ग़रीब केडी लाल और राजकुमारी के आँगन में रोहित की किलकारियां गूँज रही हैं।


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कुछ यूँ हुआ था 22 फरवरी के दिन 

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ का पॉलिटेक्निक चौराहा, फरवरी की एक अलसाई दोपहरिया की गुलाबी ठंड, आस पास जमा भीड़ और सामने कराहती एक गर्भवती महिला और उसका पति।

लोग तमाशा देख रहे थे, भीड़ में मौजूद कुछ लोग मोबाइल निकाले वीडियो शूट कर रहे थे। तो वहीँ कुछ लोग महिला की फ़ोटो क्लिक करने में व्यस्त थे। लोग हिदायतें भी दे रहे थे, "अरे महिला को छाँव में बिठाओ" "साया कर दो, उसे डिवाइडर पर ही लेटे रहने दो।"

बहरहाल, सदफ़ आपा भी रोजाना की तरह छुट्टी के बाद अपने बेटे हुमैद के साथ स्कूल से घर जा रही थीं। वहां से गुज़रते हुए बेवक़्त लगी भीड़ ने उनका भी ध्यान आकर्षित किया और वो भी मामले की जांच पड़ताल के लिए अपनी गाड़ी से उतरीं। सामने जो उन्होंने देखा उससे उनकी आँखें फटी की फटी रह गयी। इनके सामने एक गर्भवती स्त्री थी जो "लेबर पेन" से तड़प रही थी और वहीँ वहां मौजूद लोग तमाशा देख गुज़र जाते।

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सदफ़ आपा ने हुमैद को जल्दी से घर छोड़ा और वापस घटनास्थल का रुख किया भीड़ अब भी थी, लोग अब भी जमा थे, महिला अब भी दर्द से, भीषण दर्द से करहा रही थी, महिला का ग़रीब पति अब भी किसी चमत्कार की आस में था। आते ही सदफ़ आपा ने उस महिला के पति को बुलाया और "108" पर फ़ोन करने के बाद कुछ पैसे दिए। अब तक एम्बुलेंस आ चुकी थी। आपा द्वारा, महिला को "किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज" ले जाया गया जहाँ "सी सेक्शन" के बाद महिला ने इस "सुन्दर और स्वस्थ" बच्चे को जन्म दिया। गौरतलब है कि सदफ़ आपा ने इस बच्चे का नाम "रोहित" रखा है।


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इस पूरे मामले पर जानकारी देते हुए “सदफ़ जाफ़र” ने बताया कि 

"एक महिला का दर्द वो भी ख़ास तौर से “लेबर पेन” जैसा दर्द एक महिला ही समझ सकती है और मैंने वही किया जो इस देश की एक जिम्मेदार महिला नागरिक को करना चाहिए था।” 

सदफ़ का ये भी कहना है कि धर्म चाहे कोई भी हो वो हमेशा ही मानवता और भाईचारे का मार्ग दिखाता है और व्यक्ति अपने को तभी मानव कहे जब उसके अंदर मानवता शेष हो।

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रोहित के विषय में जानकारी देते हुए सदफ़ ने बताया कि चूँकि रोहित के पिता की माली हालत ठीक नहीं है और उनका परिवार मुश्किल दौर से गुज़र रहा है अतः उन्होंने पेशे से गर्द और बच्चे के पिता केडी लाल को आश्वासन दिया है कि जब तक उनका जीवन है वो ही इस बच्चे की परवरिश और उसकी पूरी पढाई लिखाई का जिम्मा उठाएंगी। पूछे जाने पर सदफ़ ने ये भी बताया है कि ये उनकी प्रबल इच्छा है कि आगे चल कर ये बच्चा एक बेहतर नागरिक बन सके ताकि हमारी आने वाली पीढ़ी मानवता और संस्कृति को आगे ले जाए।

सदफ़ आपा ने समाज के लिए एक मिसाल कायम करते हुए ये सन्देश दिया है कि हम हिन्दू, मुसलमान, सिख, ईसाई बाद में है और पहले एक इन्सान है और अगर हमारे अंदर इंसानियत नहीं है तो फिर चाहे काबा हो या काशी, या सारे तीर्थ, नमाज़ें और पूजा अर्चना सब व्यर्थ हैं यदि हमारे ह्रदय में प्रेम, त्याग और बलिदान की लौ न जल रही हो।  


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