मैं, मेरा बचपन और Philips का रेडियो..

By Ritika Singh
August 14, 2022, Updated on : Sun Aug 14 2022 14:06:54 GMT+0000
मैं, मेरा बचपन और Philips का रेडियो..
बचपन की खूबसूरत यादों का हिस्सा रेडियो भी है. रेडियो से हमारी पहली मुलाकात जब हुई, तब शायद उम्र 4 या 5 वर्ष रही होगी.
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वैसे तो हमारा लगाव टीवी से ज्यादा है क्योंकि जब हम बड़े हो रहे थे तो रेडियो वाला जमाना गुजर रहा था और टीवी की बादशाहत बढ़ रही थी. लेकिन फिर भी रेडियो सुनने का जो मजा है, जो कशिश है, उससे हम भी अच्छे से वाकिफ हैं. पहले आकाशवाणी के जरिए और फिर FM Channels के जरिए. बात अगर खूबसूरत यादों की हो तो बचपन की यादों से खूबसूरत और क्या हो सकता है.. हमारे बचपन की खूबसूरत यादों का हिस्सा रेडियो भी है. वह भी Philips का रेडियो...


रेडियो से हमारी पहली मुलाकात जब हुई, तब शायद उम्र 4 या 5 वर्ष रही होगी. हमारे नानाजी का फिलिप्स का एक पोर्टेबल रेडियो था. घर में टीवी के आ जाने के बाद उस रेडियो को कम ही निकाला जाता था लेकिन जब भी निकाला जाता था, हम फुदक कर उसके पास पहुंच जाते थे. इस उत्सुकता में कि अब गाने बजेंगे. भले ही हमें नाचते हुए हीरो या हीरोइन नहीं दिखेंगे लेकिन गाना सुनाई देगा और बंदर जैसा ही सही लेकिन थोड़ा बहुत डांस कर लेंगे.

गिनी-चुनी स्थितियों में आता था अलमारी से बाहर

फिलिप्स के उस रेडियो में दो या तीन बैटरी/सेल लगते थे. उस रेडियो के अलमारी से बाहर आने की कुछ गिनी-चुनी स्थितियां थी. जैसे कि होली-दिवाली की सफाई, लंबे वक्त से लाइट न होना, गर्मी की कोई बोरियत भरी दोपहर या शाम, बारिश के मौसम का कोई दिन या फिर नानाजी का मूड...यानी कभी रेडियो बाहर निकालकर उसे थोड़ा चमकाने का मूड, उसमें सेल डालकर यह देखना कि ठीक से काम कर रहा है या नहीं, या फिर यूं ही कभी रेडियो सुनने का मूड...उस रेडियो पर लेदर का एक कवर भी रहता था.


नानाजी रेडियो में से सेल निकालकर रखते थे. रेडियो के अलमारी से बाहर आने के बाद उसमें पहले सेल डाले जाते थे और फिर शुरू होता था फ्रीक्वेंसी सेट करने का खेल. नानाजी रेडियो के स्विच को धीरे-धीरे घुमाते हुए आवाज एकदम क्लियर आने तक फ्रीक्वेंसी सेट करते थे. उस वक्त केवल आकाशवाणी ही था, प्राइवेट एफएम चैनल्स नहीं थे.

हमको हर चीज करनी थी..

चूंकि हम बच्चे थे और बच्चों को हर नई चीज जानने-समझने और उसे अपने हाथ से करने का बड़ा शौक होता है, इसलिए नानाजी से हमारी गुहार रहती थी कि फ्रीक्वेंसी हमें सेट करने दी जाए. थोड़ा नानुकुर करने के बाद वह रेडियो हमें दे देते थे. नानाजी को हर चीज को बड़े ही प्यार, करीने और नजाकत से रखने का शौक था, फिर चाहे वह कपड़े हों, किताबें हों या घर का कोई भी दूसरा सामान. रेडियो को भी वह बेहद संभालकर रखते थे. लेकिन साथ ही वह सीखने-सिखाने में भी यकीन रखते थे. इसलिए रेडियो दे देते थे. जब रेडियो से हम पहली बार रूबरू हुए थे तो उन्होंने ही बताया था कि फ्रीक्वेंसी सेट करने के लिए स्विच को झटके से नहीं बल्कि धीरे-धीरे घुमाना होता है. जब हमें आ गया तो वह हमारे एक बार में मांगने पर ही दे देते थे.

गोविंदा के गानों का था क्रेज

जैसा कि पहले बताया कि बचपन में हमारे लिए रेडियो ऑन होने का मतलब था कि अब गाने बजेंगे. तो अगर रेडियो ऑन होने पर उस पर समाचार आ रहे होते थे तो हम निराश हो जाते थे कि 'अरे यार...समाचार आ रहे हैं'. ऐसा ही रिएक्शन क्रिकेट कमेंट्री, या खेती बाड़ी से जुड़ी जानकारी के लिए भी होता था, क्योंकि उसमें भी हमें दिलचस्पी नहीं थी. हालांकि कभी कोई कॉमेडी प्रोग्राम या कहानी ऑन एयर हो रही होती थी तो हम दिलचस्पी लेने लगते थे.


वहीं अगर गानों का प्रोग्राम आ रहा होता था तो हमारी बांछें खिल जाती थीं. हां, लेकिन यहां भी कंडीशन थी... अगर गाने पुराने, ब्लैक एंड व्हाइट एरा के होते थे तो भी मुंह थोड़ा ही सही लेकिन लटक जाता था. वहीं अगर गाने नए जमाने के (नया जमाना मतलब 90 के दशक के उसी दौर के) होते थे तो मजा ही आ जाता था. उस पर भी अगर रेडियो पर कोई डांस करने वाला गाना आ गया तो सोने पर सुहागा. फिर तो रेडियो का वॉल्यूम फुल कर दिया जाता था और डांस शुरू. डांस भी क्या था, सिग्नेचर स्टेप के साथ उछल कूद...बस यही. उस वक्त गोविंदा की फिल्में और गाने तेजी से पॉपुलर हो रहे थे. तो हम सोचते थे कि काश गोविंदा का गाना रेडियो पर आ जाए. कभी कभार ऐसा हो भी जाया करता था. फिर क्या, फिर तो मौजा ही मौजा..


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Image Credit: Ritika Singh

अलमारी से निकलने वाला, अलमारी में ही हो गया बंद

नानाजी से जब तक हो सका, उस रेडियो को सहेजा. फिर धीरे-धीरे उस रेडियो का अलमारी से बाहर आना कम और फिर बंद ही हो गया. हम बड़े होने लगे, नानाजी और बूढ़े होने लगे और रेडियो में उत्सुकता व दिलचस्पी दोनों ही खत्म होने लगीं. पढ़ाई के बीच में जो टाइम बचता वो टीवी को दिया जाने लगा. रेडियो केवल होली-दिवाली की सफाई पर चमकाकर, टेस्टिंग के बाद वापस रख दिया जाता. फिर एक दिन पता चला कि सेल डालने पर भी रेडियो नहीं चल रहा है, मशीनरी में कोई दिक्कत आ गई. घर पर ही उसकी परेशानी चेक करने की कोशिश की गई और फिर उसे खराब घोषित कर दिया गया. फिर वह फिलिप्स का पोर्टेबल रेडियो, अलमारी के अंदर ही बंद होकर रह गया.

एक रेडियो दादाजी का भी...

हमारे दादाजी के पास भी एक रेडियो हुआ करता था. शायद वह भी फिलिप्स का ही था लेकिन नानाजी के रेडियो से बड़ा था. जब हम गांव जाते थे तो कभी-कभी दोपहर में दादाजी का रेडियो भी सुनने को मिल जाता था. कभी खुद दादाजी उसे चलाते थे तो कभी-कभी उनकी गैरहाजिरी में हमारे चाचा, हम बच्चों के साथ मिलकर उसे ऑन कर लेते थे. वह रेडियो दादाजी के कमरे में उनकी अलमारी में रहता था. कभी-कभी ऐसा भी होता था कि रेडियो पर गाने आने पर दादाजी, उसे हमें पकड़ा देते थे और कहते थे, 'ले जाओ इसे, अंदर बैठकर सुन लो सब.' फिर कभी चाचा तो कभी हम, रेडियो को उनके कमरे से उठा लाते थे और गानों का लुत्फ लिया जाता था. वक्त गुजरने के साथ वह रेडियो भी खराब हो गया और उसे भी अलमारी के अंदर एक कोने में रख दिया गया.


दोनों ही रेडियो भले ही दम तोड़ चुके हों लेकिन आज भी जब कोई रेडियो का नाम लेता है तो बचपन की यादें तुरंत ताजा हो जाती हैं. मानो कल ही की बात हो. दोनों रेडियो खराब हालत में ही सही, लेकिन घर में मौजूद हैं. उनके साथ की यादें एकदम साफ हैं. उनके एंटीने को कभी छोटा या बड़ा करना, फ्रीक्वेंसी सेट करने के दौरान पिन को इधर-उधर मूव करते हुए बड़ी ही उत्सुकता से देखना, छोटी-छोटी लेकिन सधी हुई अंगुलियों से एकदम क्लियर साउंड पर पहुंचने तक स्विच को घुमाना और अपना पसंदीदा गाना आने पर आंखों में चमक, आवाज में तेजी और पैरों में थिरकन होने लगना...फिलिप्स रेडियो के साथ के किस्से जवां हैं और जवां रहेंगे..