मैं, मेरा बचपन और 'शटर' वाला Weston TV...

बचपन में जब होश संभाला यानी दिमाग ने जब यादों को संजोना और उन्हें दिखाना शुरू किया, तब घर में वेस्टन (Weston) का टीवी हुआ करता था.

मैं, मेरा बचपन और 'शटर' वाला Weston TV...

Sunday June 12, 2022,

7 min Read

हम उस जमाने की पैदाइश हैं, जब बच्चे के दो नाम रखे जाते थे. एक स्कूल का यानी जिस नाम से बच्चे के दोस्त, टीचर और आगे चलकर कामकाज वाले लोग बुलाएंगे...दूसरा नाम घर का, जिससे सारे नाते-रिश्तेदार बुलाएंगे. तो जब हम पैदा हुए तो हमारे भी दो नाम रखे गए...एक स्कूल का जो ऊपर बाईलाइन में मेंशन है और दूसरा घर का. घर का नाम बताएंगे नहीं लेकिन यह जरूर बताएंगे कि रखा कैसे गया. दरअसल हमारा घर का नाम दूरदर्शन (DoorDarshan) पर 90 के दशक में आने वाले एक टीवी सीरियल के एक किरदार के नाम पर रखा गया. पैदा होते ही घर वालों ने टीवी के साथ ऐसा कनेक्शन जोड़ा, जो फेविकोल के मजबूत जोड़ जैसा चिपक गया. ऐसा जोड़ जो आज भी बरकरार है..

बचपन में जब होश संभाला यानी दिमाग ने जब यादों को संजोना और उन्हें दिखाना शुरू किया, तब घर में वेस्टन (Weston) का टीवी हुआ करता था. वह ब्लैक एंड व्हाइट टीवी साल 1987 से साल 2003 तक हमारे घर में रहा. मॉडल न ही याद है और न ही कहीं नोट किया हुआ है क्योंकि तब हमें पता नहीं था कि सालों बाद हम उस टीवी पर कुछ लिखेंगे. टीवी लकड़ी के एक चैनल/शटर वाले कैबिनेट में हुआ करता था. आम बोलचाल में हम उसे शटर वाला टीवी कहते हैं. वेस्टन (Westway Electronics) ने 1972 में टीवी बनाना शुरू किया. 1990 में इसने पहला कलर टेलीविजन लॉन्च किया. यह भारत में कलर टेलीविजन लॉन्च करने वाली पहली कंपनी थी.

संभालकर लगाना होता था हाथ

तो.. वह शटर वाला टीवी अलग ही किस्म का आकर्षण पैदा करता था. उसका लकड़ी का कैबिनेट ब्लैक कलर का था, जिस पर थोड़ा कपड़ा मारते ही वह यूं चमचमाता था जैसे कि एकदम नया हो. टीवी था तो सेकंड हैंड लेकिन जान था. बड़ी ही नजाकत के साथ उसे रखा जाता था और इस नजाकत में एक्सपर्ट थे हमारे नानाजी. वह हर चीज को संभालकर और करीने से रखने में यकीन रखते थे. टीवी के साथ भी ऐसा ही था. नानाजी बच्चों को टीवी को बड़ा ही संभलकर हाथ लगाने देते थे. लेकिन जैसा कि कहा कि वह वेस्टन टीवी अपनी ओर खींचता था. ऊपर से हम बचपन के दौर में थे, जब बच्चे के लिए हर चीज नई होती है और सब कुछ जानने-सीखने की ललक भी चरम पर होती है. तो हमारे अंदर भी कीड़ा था बाकी हर चीज के साथ-साथ उस ब्लैक एंड व्हाइट टीवी से जुड़ा सब कुछ जान लेने का..या यूं कहें उसका वैसे ही एक्सपर्ट बन जाने का जैसा कि नानाजी और घर के बाकी बड़े लोग थे.

..ये एक्सपर्ट मतलब?

अब आप सोचेंगे कि कैसा एक्सपर्ट? क्या टीवी के कलपुर्जों का एक्सपर्ट? अरे नहीं भई, एक्सपर्ट मतलब उस टीवी को कैसे चलाना है, पिक्चर कैसे क्लियर करना है, व्हाइटनेस कैसे कम-ज्यादा करनी है, चैनल कैसे बदलना है.. वगैरह, वगैरह. जिस वेस्टन टीवी की यहां बात हो रही है, उसमें एक नॉब था, जिससे चैनल बदल सकते थे. लेकिन उस वक्त हम एंटीना वाले थे और केवल दूरदर्शन ही आता था. हां कभी-कभी किसी केबल टीवी का कनेक्शन एंटीना कैच कर लेता था और चैनल चेंज करने पर धुंधला ही सही लेकिन कोई केबल टीवी वाला चैनल दिखने लगता था. बाद में DD Metro भी आने लगा और तब उस चैनल बदलने वाले नॉब का इस्तेमाल प्रॉपर तरीके से शुरू हुआ. बाद में DD Metro की जगह DD News ने ले ली.

इसके अलावा जहां तक याद है, उस टीवी में व्हाइटनेस कम-ज्यादा करने का, वॉल्यूम कम-ज्यादा करने का, स्क्रीन सेट करने का नॉब भी था. स्क्रीन सेट करने से मतलब कभी-कभी टीवी का स्क्रीन ऊपर-नीचे या आढ़ा-टेढ़ा चलने लगता था यानी एक जगह सेट नहीं रहता था. तो नॉब से उसे बेहद प्यार से, हल्के हाथों से सेट करना होता था. यह बात वह व्यक्ति अच्छे से समझ सकता है, जिसने कभी वह टीवी चलाया हो. वहां नजाकत का अहम रोल रहता था. अक्सर ऐसी कुछ दिक्कत आने पर बड़े सेट करते थे लेकिन क्योंकि हमें उस टीवी का एक्सपर्ट बनना था तो हमारी कोशिश रहती थी कि यह मौका हमें मिले. जब सीख लिया तो उछलकर सबसे पहले टीवी सेट करने हम ही आगे आते थे. पहली बार जब बिना किसी बड़े की मदद से उसे सेट किया था और बदले में शाबास सुनने को मिला था तो खुशी के मारे फूल कर ऐसे घूम रहे थे मानो न जाने कितना बड़ा कारनामा कर लिया हो. अगर कभी टीवी के शटर को धड़ाम से बंद कर दिया या नॉब को बेदर्दी से घुमा दिया तो डांट तो पक्की थी ही, टीवी से दूर रहने का फरमान भी जारी हो जाता था. इसलिए गांठ बांध ली कि भैया नजाकत का ध्यान रखना है.

स्टेब्लाइजर, एंटीना नहीं संभाला तो क्या खाक एक्सपर्ट बने..

उस जमाने के टीवी का पूरी तरह एक्सपर्ट आपको तब तक नहीं माना जा सकता, जब तक टीवी के स्टेब्लाइजर और एंटीना को सेट करना आप न जानते हों. पहले के टीवी के साथ अलग से स्टेब्लाइजर चाहिए होता था ताकि वोल्टेज कम या ज्यादा होने पर टीवी को फुंकने से बचाया जा सके. केवल टीवी ही नहीं फ्रिज के साथ भी ऐसा था. वोल्टेज ज्यादा होने पर स्टेब्लाइजर की लाल रंग की लाइट ऑन हो जाती थी और आपको स्टेब्लाइजर की नॉब को घुमाकर वोल्टेज डाउन करनी पड़ती थी. जब कभी चलती फिल्म के दौरान ऐसा होता था तो बड़ी ही फुर्ती से वोल्टेज डाउन करने को हाथ आगे बढ़ता था ताकि फिल्म न निकल जाए. जब वोल्टेज कम होती थी तो टीवी ऑन ही नहीं होता था तो फिर आपको वोल्टेज बढ़ानी पड़ती थी. इस तरह आप स्टेब्लाइजर के एक्सपर्ट बनते थे.

जहां तक एंटीना की बात है तो अगर आप 90s किड हैं और छत पर एंटीना घुमाते हुए 'आया क्या...?' आवाज नहीं दी तो ​आपके 90s किड होने पर शक किया जा सकता है. एंटीना के तार टूटने पर उसे कैसे लगाना है और कैसे एंटीने को टीवी पर एकदम साफ पिक्चर क्वालिटी आने तक घुमाना है, इसे भी एक कला समझा जाता था.

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Representative Image: YouTube

TV को लकड़ी के कैबिनेट से नहीं किया गया जुदा

वापस आते हैं वेस्टन के उस टीवी पर. टीवी का जो लकड़ी का शटर वाला कैबिनेट था, उसकी ऊपरी सतह यानी कैबिनेट की छत एकदम फ्लैट होती थी. इसलिए वह टीवी स्टेब्लाइजर के अलावा कई छोटी-मोटी चीजों को अपने ऊपर भी रख लेता था. फिर चाहे वह घर की सजावट का कोई सामान हो या फिर बच्चों का पेंसिल बॉक्स. जैसे-जैसे वह टीवी बूढ़ा हुआ, उसके डॉक्टर यानी टीवी मैकेनिक के साथ अपॉइंटमेंट बढ़ते गए. आखिरकार साल 2003 के आखिर में उस टीवी ने दम तोड़ दिया. घर में केबल टीवी का कोई सीन नहीं था, न ही तब तक हमें कोई दिलचस्पी थी. हम अपने ब्लैक एंड व्हाइट टीवी पर रंगोली, चित्रहार, वीकएंड्स पर फिल्म, कुछ कार्टून्स और कुछ अच्छे शो जैसे आरोहण, उड़ान, स्वाभिमान, युग, चंद्रकांता, सुराग, अलिफ लैला, शक्तिमान, श्रीकृष्णा आदि देखकर ही खुश थे. लिहाजा उस टीवी के आखिर तक हमने उस पर दूरदर्शन, डीडी मैट्रो/डीडी न्यूज ही देखा. टीवी के अलविदा कहने पर उसके उस लकड़ी वाले कैबिनेट को किसी और काम के लिए इस्तेमाल भी नहीं किया गया. टीवी को उसके कैबिनेट से जुदा न करते हुए दोनों को घर से एक साथ विदाई दी गई.

भले ही वह टीवी चला गया लेकिन उसकी यादें आज भी जिंदा हैं. बचपन की खूबसूरत यादों में शामिल है वह टीवी, उसे चलाना, उसे बंद करना, खराब होने पर उसे बनता हुआ देखना, दिवाली-होली पर घर की सफाई के दौरान उसे उठाने में मदद करना, उसके शटर कैबिनेट में छोटा ताला और उसकी छोटी चाबी को बड़े ही चाव से देखना, चलती फिल्म के दौरान रुकावट के लिए खेद आ जाना...और भी न जाने क्या-क्या. भले ही वह Weston टीवी ब्लैक एंड व्हाइट था लेकिन उसकी यादें और किस्से बड़े रंगीन थे, हैं और हमेशा रहेंगे....

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