'तालेरंग', कुशल कामगारों की फौज तैयार करने की कोशिश

By Pooja Goel
June 09, 2015, Updated on : Thu Sep 05 2019 07:20:58 GMT+0000
'तालेरंग', कुशल कामगारों की फौज तैयार करने की कोशिश
भारत में कामगारों को और अधिक कुशल और पेशेवर बनाने का सपना लेकर शुरू किया ‘तालेरंग’फिहलाल मुंबई और दिल्ली में हैं क्रियाशील, जल्द ही पूरे देश में विस्तार की है योजना‘टीच फार इंडिया’ और ‘हिंदुस्तान यूनिलीवर’ के साथ काम करने के दौरान आया यह विचारभारत के कामगारों का जीवन सुधारने का लक्ष्य लेकर अमरीका की नोकरी छोड़कर आ गईं भारत
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श्वेता रैना एक ऐसी उद्यमी हैं जो दुनिया से बिल्कुल जुदा हैं। हार्वर्ड बिजनेस स्कूल की यह पूर्व छात्रा भारत मे कामगारों के बीच कौशल विकसित करने का सपना लेकर वापस लौटी और इस चुनौती से पार पाने के लिये ‘तालेरंग’ की स्थापना की।

17 वर्ष की उम्र में पढ़ाई के लिये मुंबई छोड़कर ब्राउन यूनिवर्सिटी जाते समय किसी ने भी नहीं सोचा था कि श्वेता आगे जाकर जीवन में इस राह पर चल पड़ेंगी। अपनी उम्र के अन्य महत्वाकांक्षी लोगों की तरह वे भी कई इंटर्नशिप करने की जुगत में लगी रहीं और फिर कुछ समय के न्यूयाॅर्क की मैक्किंसे एण्ड कंपनी के साथ जुड़ी रहीं। काफी समय बाद टीच फाॅर इंडिया और हिंदुस्तान यूनिलीवर के साथ काम करने के अनुभवों के बाद उनके मन में ‘तालेरंग’ की अवधारणा उभरकर आई।

हमने इस बारे में और अधिक जानने के लिये श्वेता रैना के साथ विस्तृत वार्ता की।

वाईएसः ‘तालेरंग’ को शुरू करने का विचार आपके मन में कैसे आया? इस स्टार्टअप के लिये आप किस चीज से सबसे अधिक प्रेरित हुईं?

श्वेताः अपनी स्नातक की पढ़ाई के दौरान मैंने अपने मुख्य रूप से यह पता लमाने में समय बिताया कि मैं अपने जीवन में क्या करना चाहती हूँ। मैंने गर्मियों के दिनों को फ्रांस में एक संचार कंपनी के साथ काम करके बिताया। इसके बाद मैंने अपनी दूसरी गर्मियों मुंबई में एक बैंक के लिये काम करने में गुजार दीं और अगली गर्मियों में मैं अमरीका में थीं और गोल्डमैन सैच्स के लिये काम कर रही थी। स्नातक कर डिग्री हासिल करने के बाद मैंने न्यूयाॅर्क में मैक्किंसे के साथ काम करना शुरू किया। हालांकि मैक्किंसे में मैं जो कुछ कर रही थी वह काफी प्रभावशाली था लेकिन समय के साथ मुझे अहसास हुआ कि मेरा असल क्षेत्र तो सामाजिक उद्यम ही है।

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उस समय मैक्किंसे ‘टीच फाॅर इंडिया’ के साथ जुड़ा हुआ था और मैंने इस बारे में एक नेटवर्क के बारे में जाना। इसके बाद मैं भारत आ गई और ‘टीच फाॅर इंडिया’ के सीईओ से मिली जिन्होंने मुझे अपनी प्रारंभिक टीम के एक सदस्य के रूप में चुन लिया। मैं उनके मार्केटिंग और भर्तियों से संबंधित क्षेत्र की निगरानी कर रही थी। इस दौरान मेरा काम देशभर के 100 से भी अधिक चुनिंदा काॅलेजों का दौरा कर वहां के छात्रों को टीएफआई फेलोशिप चुनने के लिये उन्हें तैयार करने का था।

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पीछे मुड़कर देखने पर मुझक अहसास होता है कि ‘तालेरंग’ की उत्पत्ति तो यात्राओं के उसी दौर में हो गई थी। उस दौरान मैं कानून, इंजीनियरिंग के अलावा मानवीय धाराओं से भरे हजारों लोगों से मिली और तब मुझे अहसास हुआ कि भारत के युवा अपने जीवन को लेकर कितनी दुविधा में हैं। अधिकतर युवा आने वाले जीवन में उन्हें वास्तव में क्या करना है इसको लेकर काफी भ्रमित दिखे। सिर्फ एक अच्छे काॅलेज में दाखिला पा लेना ही सभी समस्याओं का हल नहीं है। एचबीएस के साथ काम करने के दौरान मैंने एक पूरी गर्मियां हिंदुस्तान यूनिलीवर के साथ काम करते हुए बिताईं थीं और उस दौरान मैंने सर्विस टीम के साथ काम कर रहे कई लोगों के साथ बातचीत की थी। हालांकि वे लोग बहुत स्मार्ट थे लेकिन उनकी शिक्षा ने उन्हें उस भूमिका के लिये पूरी तरह से तैयार नहीं किया था। मैंने सर्विस सेंटर में कार्यरत इन लोगों को विभिन्न परिस्थितियों के अनुकूल बनाने में मदद करने के लिये कुछ प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन किया ताकि वे लोग किसी विशेष या आपात परिस्थिति से निबटने के लिये तैयार रहें।

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हिंदुस्तान लीवर के साथ गर्मियां बिताने के बाद मैं वापस एचबीएस लौट आई। मैं काफी सौभाग्यशाली रही कि उसी समय मेरी मुलाकात एक ऐसे प्रोफेसर से हुई जो भारत में कामगारों और कार्य की प्रभावशीलता से जुड़े मुद्दों से निबटने के लिये मेरे साथ काम करने को बेकरार था। हमने परीक्षण के तौर पर भारत के कुछ काॅलेजों को चुना और वहां पर पायलट प्रोजेक्ट पर काम शुरू कर दिया। और इस तरह से विभिन्न उत्सर्जन अनुभवों के मध्य से गुजरते हुए भारत में एक प्रभावी और कुशल कामगारों की फौज विकसित करने का उद्देश्य लेकर ‘तालेरंग’ की स्थापना हुई।

वाईएसः आपका अबतक का सफर कैसे रहा है?

श्वेताः क्योंकि मैंने पहले से ही स्टार्टअप के वातावरण में काम किया है इसलिये मुझे एक स्टार्टअप के साथ काम करने का बहुत अनुभव था और मैं एक स्टार्टअप के साथ काम करने का मतलब समझती थी। ‘तालेरंग’ के माध्यम से मैं पहले दिन से ही एक ऐसा स्थाई व्यवसाय करना चाहती थी जिसका एक सामाजिक प्रभाव हो। हमारा उद्देश्य पैसा कमाने के साथ-साथ समाज के बीच एक प्रेरक प्रभाव छोड़ने का भी है और यही भावना मुझे संतुष्टि देती है। हम एक अंधे की लाठी की लाठी की तरह हैं जिसका सीधा मतलब यह है कि हम वित्त की कमी के चलते अपने पास उम्मीदवारों को वापस नहीं भेजते हैं। इस काम के अपने दबाव हैं लेकिन इसमें बिताए गए हर क्षण के अपने मायने हैं!

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हमारा इरादा आने वाले तीन से पांच वर्षों के अंदर खुद को राष्ट्रीय फलक तक ले जाना है। फिलहाल हम सिर्फ दिल्ली और मुंबई में ही कार्यशील हैं। हमारा इरादा आने वाले तीन वर्षों में विभिन्न माॅडलों की सहायता से 10 हजार से अधिक छात्रों और कंपनियों में कार्यरत कर्मचारियों तक अपनी पहुंच बनाना है। जब हमारे साथ जुड़े किसी व्यक्ति को एक नौकरी मिलती है तो वह क्षण हमारे लिये बेहद खुशी से भरा होता है क्योंकि अब वह व्यक्ति आर्थिक स्वतंत्रता और एक सार्थक नौेकरी की बदौलत एक बेहतर और खुशहाल जीवन जीने में समर्थ होता है।

वाईएसः आप हमें ‘तालेरंग’ के प्रशिक्षण माॅड्यूलों के बारे में और अधिक बताएं और यह भी बताएं कि कैसे यह लोगों को रोजगार के लिये तैयार करने में मदद करते हैं?

श्वेताः आज के अधिकतर युवाओं के अपने संस्थानों में असफल होने के कारण पर नजर डालते हुए अधिक सीईओ ने इस ओर हमारा ध्यान आकर्षित किया कि आज के अधिकतर युवाओं को यही साफ नहीं है कि वे शीर्ष स्थान पर क्यों खड़े हैं। वे मात्र 6 महीनों में ही अपनी नौकरी को अलविदा कर देते हैं और फिर जहां भी जाते हैं बार-बार नौकरियां ही छोड़ते रहते हैं और यह परिदृश्य देशभर की कंपनियों में देखा जा सकता है।

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हमारा पहला माॅड्यूल व्यक्तिगत जागरुकता के बारे में हैं जिसमें हम छात्रों को यह पता लगाने में मदद करते हैं कि वे अल्पावधि में क्या करना चाहते हैं। इससे अगला माॅड्यूल उनके मूल्यों और दृष्टि के बारे में है। इस तरह से हमारे पहले दोनों सत्र ग्रुप थेरेपी की तरह हैं जो भारत के लिये एक बिल्कुल नई अवधारणा है। हमने इस दौरान कई लोगों को टूटते हुए और रोते हुए देखा है क्योंकि उन्होंने अतीत में इसका चिंतन करने का समय ही नहीं निकाला कि वे अपने जीवन में क्या करना चाहते हैं और वास्तव में हैं क्या। हमारे पास सही मायनों में ऐसे स्मार्ट लोग हैं जो यहां आते हैं और खुद में बदलाव लाते हुए चले जाते हैं। और मेरे लिये व्यक्तिगत रूप से यह बहुत सार्थक है।

एक बार अपने बारे में जानने के बाद आप अपने लक्ष्य को कैसे पा सकते हैं? माड्यूल के अगले सत्र मं हम यह सिखाते हैं। उदाहरण के लिये हमारे पास मौखिक और लिखित दोनों प्रकार का सबसे बेहतर संचार माध्यम मोजूद है। इसके बाद हमारे पास ‘‘वर्किंग स्मार्ट’ माॅड्यूल है जो प्राथमिकता तय करने, समस्याओं को हम करने और लक्ष्य स्थापित करने के बारे में है। इसके बाद हम उन्हें नोकरी पाने के तरीके सिखाते हुए बायोडाटा, साक्षात्कार कौशल, एक्सेल और पावरपाइंट में पारंगत करते हैं। हम उन्हें नेटवर्किंग समारोहों में दूसरों के साथ बेहतर रिश्तों को बनाना सिखाने में भी मदद करते हैं। आज के समय में जीवन और करियर में प्रगति करने के लिये इन सब चीजों का ज्ञान होना भी बहुत जरूरी है।

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प्रशिक्षण के बाद हम अपने छात्रों को कार्यस्थल पर ही अपने काम करने के कौशल में निखार लाने के इरादे के साथ उन्हें विभिन्न संस्थानों में इंटर्नशिप के लिये भेजते हैं। भारत के शीर्ष विश्वविद्यालयों के 50 प्रतिशत के करीब छात्रों तक को काॅलेज के दिनों में इंटर्नशिप का मौका नहीं मिलता है जिसके फलस्वरूप वे अपनी पहली नौकरी में ही काम करना सीखते हैं और कार्यस्थल के वातावरण से रूबरू होते हैं। ओर यह सब भारत के सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों के छात्रों के साथ होता है। लेकिन यही भारत की एक बहुत बड़ी सच्चाई है और अब वह समय आ गया है जब हमें छात्रों को शौक्षिक कौशल से बाहर निकालते हुए उन्हें उच्च प्रदर्शन करने वाले पेशेवरोें में बदलना होगा।

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