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औरत अन्नपूर्णा ही नहीं अन्नदाता भी है

सबकुछ करते हुए भी औरत किसान के दर्जे से वंचित है। वो किसानी के सभी कार्यो को शिद्दत और शिफत के साथ अंजाम भी देती है, लेकिन सरकार उसे किसान नहीं मानती। पेश है उन महिला किसानों की दास्तान, जिन्होंने किसान होने का दर्ज़ा पुरुषवादी समाज से मांगा नहीं छीना है।

प्रणय विक्रम सिंह
13th Apr 2017
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"महिला किसान कुल श्रमशक्ति का 60 प्रतिशत हिस्सा अकेले है। खेती का 80 प्रतिशत कार्य उसके दायित्व के दायरे में आता है, वो भी अन्य घरेलू जिम्मेदारियों के साथ। लेकिन, विडम्बना देखिये कि कार्यक्षेत्र में वो किसान के रूप में स्थापित नहीं है। आइये जानते हैं, कुछ ऐसी ही कोशिशों के बारे में जिन्होंने व्यवस्था की पेशानी पर महिला के किसान होने की पटकथा लिख कर औरों के लिए एक मिसाल कायम कर दी है!"

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ये दास्तान है महिला किसानों के, आत्मविस्मृति से मुक्ति की, आत्मबोध के अहसास की। ये उद्बोधन है, पितृसत्तात्मक समाज के अलम्बरदारों के लिए जो नारी श्रम का उपभोग तो करते हैं, लेकिन श्रम को सम्मान नहीं देते।

शाहजहांपुर की 'सावित्री देवी' ने स्थापित किया कीर्तिमान

सबसे पहले बात करते हैं, ग्राम ऐंठा (हुसैनपुर, जिला शाहजहांपुर, उत्तर प्रदेश) की महिला बागवान सावित्री देवी की। सावित्री देवी ने न केवल कृषि क्षेत्र में अपितु बागवानी में भी जनपद में कीर्तिमान स्थापित किया है। बाग में लगे नींबू, अनार, आम, अमरूद, जामुन के मीठे फल एवं पक्षियों का कलरव, बाग के बीच में पर्णकुटी जिसमें सावित्री देवी का वानप्रस्थ-सा जीवन बीतता है।

सावित्री देवी विनोबा सेवा आश्रम से जुड़ीं और जैविक खेती का प्रशिक्षण प्राप्त कर खेत और परिवार दोनों के स्वास्थ्य का ध्यान रखते हुए 65 बीघे खेत को केवल जैविक खाद और कीटनाशक के जरिये संभाला और उत्पादन किया। 2006 में आरोह अभियान से जुड़ने के बाद सावित्री देवी ने अपने पति से अपने नाम जमीन अथवा खेत खरीदने का आग्रह किया। पति सहर्ष मान गये और 10 बीघे का बाग खरीदा जो सावित्री देवी के नाम बैनामा हुआ। सावित्री ने उस बाग को पुन: संवारा और अनेक उन्नत प्रजातियों के आम व अन्य फल रोपे। सावित्री 04 बीघे खेत में पूर्णत: जैविक सब्जी की खेती करती हैं। स्वयं को किसान बताती हैं और मण्डी स्वयं जाना और सब्जी बेचना इनकी दिनचर्या है।

महिलाएं ही असली किसान हैं: 'लीलावती'

किसान, गरीबी और कर्ज पर्याय हैं, ऐसी उक्ति प्रचलित है परन्तु 68 वर्षीय महिला किसान लीलावती ने उपरोक्त पंक्तियों पर विराम लगाते हुए जो नयी गाथा लिखी वह अतुलनीय और अनुकरणीय होने के साथ-साथ प्रशंसनीय और आदरणीय भी है। लीलावती भी शाहजहांपुर उत्तर प्रदेश के उसी गांव से हैं, जहां से सावित्री देवी हैं। लीलावती गरीबी में पली-बढ़ी और बाल विवाह की भेंट चढ़ी।

लीलावती को महज 13 वर्ष की कम उम्र में असाक्षर मिश्रीलाल के साथ ब्याह दिया गया था और वो उतनी कम उम्र में ससुराल आ गयीं। लीलावती ने अपने पति को अक्षर ज्ञान कराया व पांचवी के स्तर तक पहुंचाकर प्रेरित किया कि वो अब आगे की पढ़ाई करें। लीलावती स्वयं एक स्कूल में बच्चों को पढ़ाने लगीं और साथ ही पति के 07 बीघे खेत पर पति के साथ खेती करने लगीं। समय के साथ लीलावती 07 बच्चों की मां बनीं और घोर गरीबी और अभाव से जूझते हुए भी बच्चों को पढ़ाया। लीलावती ने वास्तविक महिला किसान बनने का स्वप्न संजोया और हकीकत में बदलने के लिए अपने गहने गिरवी रखकर 15 बीघा खेत खरीदा। उस पर अपने नाम के.सी.सी. बनवाकर मण्डी समिति में दाखिल हुईं।

लीलावती ने हाल ही में अपनी तीनों पुत्रवधुओं के नाम 30 बीघा खेत खरीदा है। लीलावती कहती हैं, कि महिलाएं ही असली किसान हैं अत: खेत भी उन्हीं के नाम रहना चाहिए। हुसैनापुर गांव की लीलावती जनपद में अग्रणी किसान हैं, ये कम लागत की सब्जी उत्पादन करती हैं, स्वयं से जैविक खाद बनाना, सब्जी के खेत की रखवाली एवं मण्डी (शाहजहांपुर) तक पहुंचाने हेतु इन्होंने साइकिल खरीदी और उसी से भ्रमण भी करती हैं। साईकिल के कैरियर पर बंधी टोकरी में भरी सब्जियां और हैण्डिल पर लटकते थैले से झांकती हरी, ताजी, पत्तेदार सब्जियां, सलाद के पत्ते, 68 वर्ष की उम्र में साईकिल का हैण्डिल सम्भाले मण्डी जाते लीलावती की पहचान हुसैनापुर की किसान के रूप में है। इन्हें देखकर ये पंक्तियां खुद-ब-खुद ज़ेहन में दौड़ जाती हैं,

"तू बढ़ा है जब कभी तो क्रांतियां लजा गयीं,

रास्ते कदम-कदम पर मंजिले सजा गयीं।"

आन्दोलन, संघर्ष और अधिकारों की आवाज हैं 'सहोदरा'

उत्तर प्रदेश का बुन्देलखण्ड क्षेत्र कला और सांस्कृतिक रूप से समृद्धि के साथ दस्यु, दबंग और सामंती ताकतों का भी इतिहास समेटे है। यहां लोग आज भी घोर गरीबी और जागरूकता की कमी के कारण बन्धुआ जीवन जीने को मजबूर हैं। यहां आन्दोलन, संघर्ष और अधिकारों के लिए आवाज उठाना कठिन काम है, लेकिन ग्राम बड़ोखर खुर्द (बांदा) की सहोदरा ने जिस साहस और हिम्मत का परिचय दिया वो मिसाल बन गया है। सहोदरा आज से 30 साल पहले जब दुल्हन बनकर ससुराल आई तो संयुक्त परिवार में कई कमियों के बावजूद खुशहाली थी। वो भी खुश थी परन्तु नियति ने उससे खुशी छीन ली। वो विधवा हो गई। गोद में तीन छोटे बच्चे। कैसे आगे बढ़े? सोच भी ना पायी कि उसके जेठ ने कहा, जमीन पर तुम अकेले खेती करोगी, नियम भी नहीं है कि तुम्हें खेत मिले। अत: मेरे परिवार के साथ रहो, काम करो और खाओ।

सहोदरा को मालूम भी नहीं था, कि जिस खेत पर वह मजदूर है, वो उसकी विधिक हकदार है। वो सालों तक उस खेत में मजदूरी करती रही। उसके बाद 2009 में वो भूमि हकदारी प्रशिक्षण में आरोह टीम से मिली। सहोदरा ने जब जाना कि पति की जोत जमीन पर उसकी मृत्यु के बाद वह प्राकृतिक रूप से विधिक उत्तराधिकारी है तो वह हैरान हुई व अपनी पूरी कहानी बतायी। सहोदरा ने अब अपने खेत पर हक जमाना शुरू किया और अपने जेठ को बताया, कि वो इसकी हकदार है, तो संघर्ष शुरू हो गया। एक ओर सहोदरा दूसरी ओर उनके जेठ का परिवार।

सहोदरा ने एसडीएम को प्रार्थना पत्र दिया, ये देखकर उसके जेठ उससे मारपीट करने लगे। सहोदरा ने बड़ोखर खुर्द थाने में जेठ के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई परन्तु कोई सुनवाई नहीं हुई। तहसील दिवस एवं थाना दिवस पर मंच के सभी सदस्यों ने मिलकर एसडीएम एवं एसपी से सारी घटना सुनाई एवं आन्दोलन की चेतावनी दी। एसडीएम के आदेश पर सहोदरा के खेत की नपाई हुई और उसे कब्जा दिया गया। सहोदरा अब अपने खेत की विधिक स्वामी और किसान है।

सहारनपुर की साहसी 'सुरेशो'

जिला सहारनपुर की सुरेशो उत्तर प्रदेश के उस हिस्से (ग्राम, सुल्तानपुर चिल्काना) से हैं, जिसे हरित क्रान्ति का हिस्सा कहा जाता है। पिता की मृत्यु के बाद सुरेशो का परिवार बिल्कुल ही असहाय हो गया। दो भाई और दो बहन तथा मां, पांच सदस्यों के भोजन का सवाल था। सुरेशो की पढ़ाई छूट गई। जीवन बहुत ही गरीबी और लाचारी में कट रहा था। आय का कोई साधन नहीं था। भाई छोटे थे। खेती योग्य 2 एकड़ जमीन थी, लेकिन उसकी जुताई एवं अन्य काम बिना पैसे में कैसे हो और उन दिनों खाने को ठीक से नहीं था तो खेती में लगाने के लिए कहां से पैसा लाएं?

पिता के समय में जो लोग खेत को जोतकर बाद में पैसा लेते थे वो जुताई से पहले पैसा मागने लगे, क्योंकि उनको मां और बेटियों (महिलाओं) की खेती पर भरोसा नहीं था। किसी प्रकार पैसो का इंतजाम किया और खेत की जुताई हुई। इस प्रकार कुछ हद तक भोजन की समस्या हल हुई। समाज में महिला के लिए कई दायरे बने है।

मां पर समाज का दबाव बढ़ने लगा, कि वो सुरेशो की शादी करें। शादी हुई लेकिन ससुराल में अनबन के बाद फिर मायका बना ठिकाना। तय किया खेती करने का और खेती शुरू की। फिर साथ मिला दिशा संस्थान का और साथियों के साथ आगे बढ़ने का हौसला आया। रात-दिन नयी चीज सीखने की धुन और जीवन को बेहतर बनाने का सपना तो था, लेकिन संसाधन सीमित थे। फिर चार लोगों का भरण-पोषण भी। ससुराल से कोई सहयोग नहीं मिलता। सुरेशो के मन में आया कि मेरे ससुराल में जो जमीन है क्यों न उस पर खेती करूं। ससुर से बात की तो वो बिगड़ गये, बोले: बेटे के रहते तुम्हें जमीन क्यों दूं। जाओ यहां से। 

सुरेशों के दोस्तों ने उसे सुझाया कि पति से भरण-पोषण पाने का हक है तुम्हें। अत: इस नाते उसकी आजीविका के स्रोत यानि जमीन पर तुम्हारा हक बनता है, उसे लेकर रहो। सुरेशो का हौसला बढ़ा। उसने पुन: अपने ससुर से कहा। उन्होंने कहा, तुम्हारे पति का हिस्सा अलग कर देता हूं उससे ले लो। सुरेशो ने कहा, हिस्सा लगाते समय आधा मुझे दे दो। सुरेशो जानती थी कि बिना भूमि पर नाम रहे सरकारी सुविधा नहीं मिलेगी और जब चाहे ये लोग हटा भी देंगे। काफी झगड़ा और संघर्ष के बाद ससुर ने कहा, ठीक है बैनामा का पैसा अपने पास से लगाना

सुरेशो ने किसी तरह से पैसों का इन्तजाम किया और छह बीघा जमीन का बैनामा करा लिया। जमीन अपने नाम करने के बाद सुरेशो ने बैंक से किसान क्रेडिट कार्ड बनाने के लिए आवेदन किया और क्रेडिट कार्ड मिलने के बाद उसने खेती से मन चाही फसल उगायी।

अब सुरेशों ट्रैक्टर से अपना खेत खुद जोतती है। वो सुरेशो बहुत खुश है, कि उसके परिवार को साल भर अच्छा भोजन मिलता है, दूध मिलता है, सब्जी मिलती है और साथ ही सामाजिक दायित्व निभाने के पैसे भी। वो कहती है 'मैं उस सुरेशो को पीछे छोड़ चुकी हूं जो केवल रो कर तकदीर को दोष देती थी। केवल अपना परिवार ही नहीं अपितु गांव की दूसरी बहनों को खेती, पशुपालन के लिए सहायता करती हूं। मेरा मानना है कि जब महिलाओं के पास पैसा होगा वो सबल होगीं। अपना हक पाने की लालसा जगेगी तो वो आगे भी आयेंगी। केवल महिला ही सबको रोटी खिला सकती है क्योंकि उसके मन में सबके लिए दया होती है। आज जरूरत है कि महिला किसान पूरी ताकत और हक से खेती करें और हक जमाये।' 

इन सबके बाद तो ये ही कहा जा सकता है, कि 

"जब औरत के हाथ में होगी खेत, तभी सबको मिलेगी रोटी और धोती।"


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