विजय शेखर को अंग्रेजी नहीं समझ आई तो छोड़ी इंजीनियरिंग क्लास, बाद में बना दी Paytm

By Upasana
September 16, 2022, Updated on : Thu Sep 29 2022 03:35:16 GMT+0000
विजय शेखर को अंग्रेजी नहीं समझ आई तो छोड़ी इंजीनियरिंग क्लास,  बाद में बना दी Paytm
पेटीएम के फाउंडर विजय शेखर शर्मा इंडिया में फाइनैंशल गैप को भरना चाहते थे. इस मकसद के साथ उन्होंने पेटीएम की शुरुआत की. 2010 में शुरू हुुई कंपनी 2015 में यूनिकॉर्न बन गई.
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साल 2016, तारीख 8 नवंबर, समय शाम के 8.15 बजे! यही वो समय है जब हमें नोटबंदी नाम का सरप्राइज मिला था. कैसे भूल सकते हैं, वो गली-गली एटीएम के लिए भाग दौड़ करना, घरों में पड़े नोट निकालकर बैंक में जमा करना. लेकिन कहा गया है ना, हर आपदा किसी न किसी के लिए अवसर जरूर लेकर आती है. ऐसा ही कुछ हुआ पेटीएम के साथ. नोटबंदी कनेक्शन भी जानेंगे लेकिन उससे पहले जानते हैं पेटीएम के यूनिकॉर्न बनने की कहानी. 


तो कहानी शुरू होती है, अलीगढ़ के एक स्कूल में हिंदी मीडियम से पढ़ने वाले होनहार बीरवान छात्र विजय शेखर शर्मा से. विजय इतने टैलेंटेड थे कि उन्होंने 14 साल की उमर में ही 12वीं पास कर ली. सभी सब्जेक्ट में अव्वल दर्जे से पास होते थे. टीचर भी खुश पैरेंट्स भी. विजय ने बड़े अरमानों के साथ दिल्ली के इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला लिया. लेकिन वहां जो हुआ उसने विजय की जिंदगी को अपसाइड डाउन कर दिया. 


अभी तक जिस शख्स ने सारी पढ़ाई हिंदी में की थी उसे सारी चीजें अंग्रेजी में सुनने को मिल रही थीं. एक दिन प्रोफेसर ने विजय से सवाल पूछ दिया, जवाब वो तब देते जब उन्हें सवाल समझ आता. उस दिन सभी को ये मालूम पड़ गया कि विजय को इंग्लिश बिल्कुल नहीं आती. विजय को बहुत शर्मिंदगी हुई और स्कूल में फ्रंटबेंचर रहने वाला स्टूडेंट बैकबेंचर बन गया. 

ऐसे आया आइडिया

विजय धीरे-धीरे क्लास भी छोड़ने लगे, और अपना समय लाइब्रेरी, कम्प्यूटर सेंटर में बिताने लगे. उस दौर ने उन्हें बहुत कुछ सीखाया. विजय को किताबों, मैगजीन का साथ भाने लगा और प्रोग्रामिंग करने में मजा आने लगा. 


उसी समय की बात है एक बार विजय सेकंड हैंड किताबें देखने दरियागंज मार्केट गए थे. इत्तेफाक से कुछ मैगजीन ने उस समय सिलिकन वैली पर आर्टिकल छापे थे. उसे पढ़ते हुए विजय को लगा कि इंडिया में भी सिलिकन वैली होना चाहिए. ये 1995-1996 की बात है. उस समय इंडिया में इंटरनेट नहीं था. इंटरनेट बिजनेस तो दूर की बात है वेबसाइट नहीं हुआ करती थी. उन दिनों वेबसाइट बनाना ही लोगों का बिजनेस हुआ था.


विजय के दिमाग में सिलिकन वैली का कीड़ा तो बैठ ही चुका था. फिर एक और इत्तेफाक हुआ.  एक दिन कम्प्यूटर सेंटर में एक मैगजीन में उन्हें मार्क एंड्रीसन का इंटरव्यू दिखा. जिसमें उन्होंने नेटस्केप का बिजनेस मॉडल समझाया था. 

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विजय की पढ़ाई नहीं चल रही थी और सब्जेक्ट्स में बैक लग रहे थी इसलिए उन्हें भरोसा था कि जॉब तो आसानी से मिलने वाली नहीं. उन्हें समझ आया कि ये इंटरनेट बिजनेस मॉडल ही अब उनका कुछ कर सकता है. उन्होंने खुद का कुछ डिवेलप करने का प्लान बनाया. 

मिशन की शुरुआत 

प्लान पर काम शुरू हुआ. विजय ने अपने कुछ दोस्तों के साथ मिलकर एक सर्च इंजन बनाया, नाम रखा XS कम्यूनिकेशन. बाद में एक कंटेंट मैनेजमेंट सिस्टम की तरफ डिवेलप कर दिया. 1999 में विजय ने इसे एक अमेरिका के बिजनेसमैन को बेच दिया. 


विजय को लगा कि उन्हें खाली बैठने की बजाय कुछ और भी डिवेलप करना चाहिए, और अगले ही दिन कंपनी से रिजाइन कर दिया. यहीं से आया वन97 कम्यूनिकेशन शुरू करने का आइडिया. विजय बताते हैं कि उस समय इंटरनेट पर कोई रेवेन्यू मॉडल नहीं था. इंटरनेट एडवर्टाइजिंग में कुछ खास पैसे नहीं थे. 2001 तक ईकॉमर्स जैसी कोई चीज मौजूद ही नहीं थी. मेरे दिमाग में तब यही खयाल था कि मुझे इंटरनेट के प्रॉडक्ट्स पर कुछ खेलना है.


टेलीकॉम ऑपरेटर बड़े काम आ सकता है क्योंकि उनके पास कंज्यूमर के साथ बिल्कुल सीधा लेन देन होता है. हमने जो बिजनेस शुरू किया वो इंटनरनेट कंटेंट ऑन SMS मॉडल पर था. टेलीकॉम ऑपरेटर्स से हम कुछ लेते नहीं थे इसलिए उन्हें कोई दिक्कत नहीं थी. हम जो भी कंटेंट सर्विस देते थे उसके लिए कंज्यूमर से चार्ज करते थे. 

फंडिंग का जुगाड़

विजय बताते हैं कि XS को बेचने से जो पैसे मिले थे उसी के साथ वन97 को शुरू किया गया. उन्होंने अगले 6-7 सालों तक किसी से पैसे नहीं जुटाए. मैंने बेसिकली ऐसा मॉडल क्रैक किया जो उस समय काफी मुश्किल था. उसे बनाने के लिए ढेरों पैसे चाहिए होते थे और मैं उसे फ्री में दे रहा था. 


हालांकि कई मुश्किलें भी आईं. विजय को क्लाइंट्स से टाइम पर पैसा नहीं मिला और उनका कैश फ्लो ठीक बिगड़ गया. नतीजा ये हुआ कि विजय के ऊपर 8 लाख रुपये का लोन चढ़ गया. ये लोन उन्होंने अपने ही कुछ खास रिश्तेदारों से लिया था जिस पर उन्हें 24 फीसदी का इंटरेस्ट देना पड़ता था. 


ये सब देखकर घर वाले परेशान हो रहे थे. लेकिन विजय ने गिव अप नहीं किया. शुरू करते वक्त तो दोस्तों ने साथ दिया लेकिन फाइनैंशल हालत बिगड़ी तो बाकी दोनों को फाउंडर्स ने कंपनी छोड़ने का फैसला किया. विजय टिके रहे. 

ऐसे दिन भी देखे

विजय एक इंटरव्यू में बताते हैं कि मैंने वो दिन भी देखे हैं जब हर दिन के गुजारे के लिए दोस्तों पर निर्भर रहता था. खाने-पीने के लिए रहने के लिए दोस्तों से लोन लेने लगा. उस समय दो कप चाय मिलना भी मेरे लिए बहुत बड़ी बात होती थी. पैसे न खर्च हों इसके लिए 14 किमी पैदल चला. 


विजय कहते हैं, जब आप बाहर के रास्ते को ऑप्शन में रखना बंद कर देते हैं तो आपके पास आगे बढ़ने के अलावा कोई और रास्ता नहीं होता. मैं आगे बढ़ता रहा. मैंने लेक्चर पढ़ाने शुरू किए, ईमेल अड्रेस बनाता, नेटर्वक सेट करता लेकिन इससे उतनी कमाई नहीं होती थी कि लोन चुकता कर पाउं. तभी एक करिश्मा हुआ. 

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एंजल इनवेस्टर से मुलाकात

इसी दौर में विजय की मुलाकात एक बड़े नामी शख्स से हुई उन्होंने विजय को बड़े प्रोजेक्ट का जिम्मा दिया. काम से खुश हो कर उन्होंने विजय को कंपनी का सीईओ बनने का ऑफर दिया. विजय ने ये कहते हुए ऑफर ठुकरा दिया कि उनकी खुद की कंपनी है. विजय ने बाकी बातें भी बताई. 


उन्होंने विजय की कंपनी में 40 पर्सेंट हिस्से के बदले 8 लाख रुपये दिए और काम करने को ऑफिस भी दिया. कंपनी धीरे-धीरे ट्रैक पर आने लगी. फिर 2010 में स्मार्टफोन्स का दौर शुरू हुआ था. विजय ने सेंटिमेंट भांपते हुए कंज्यूमर बेस्ड ब्रैंड लाने का आइडिया पेश किया. एक ऐसा प्लैटफॉर्म जहां कस्टमर्स को कंटेंट नहीं बल्कि कई और चीजें उन्हें ऑफर की जाएं. और फिर शुरूआत हुई पेटीएम की.

बढ़ता गया ग्राफ

वन97 कम्यूनिकेशंस फीचर फोन और उसमें भी कंटेंट और मार्केटिंग फोकस्ड था. जबकि पेटीएम स्मार्टफोन और मोबाइल इंटरनेट पर फोक्स्ड था. पेटीएम का पहला कस्टमर स्नैपडील था. उसने पेटीएम को पेमेंट गेटवे बनाया था, लेकिन उनकी साइट पर ज्यादा कस्टमर नहीं आ रहे थे इसलिए पेटीएम को कुछ खास फायदा नहीं मिल रहा था. 


विजय ने बिजनेस मॉडल को थोड़ा और बदला. पेटीएम पर धीरे-धीरे रिचार्ज, बस टिकट्स, बिल पेमेंट के ऑप्शन जोड़े गए. फिर 2014 में फाइनली आया वॉलेट. पेटीएम का बिजनेस अच्छा खासा शुरू चल चुका था. फिर 2015 में जैक मा ने पेटीएम में 30 फीसदी हिस्सेदारी के बदले 575 मिलियन डॉलर देकर सबको चौंका दिया. 


यूनिकॉर्न का दर्जा

उसी साल पेटीएम को यूनिकॉर्न कंपनी का दर्जा भी मिल गया. साल के आखिर तक कंपनी को सॉफ्टबैंक से भी 1.4 अरब डॉलर का भारी भरकम निवेश मिला. 2016 में नोटबंदी ने पेटीएम की किस्मत को पलट ही दी. नोटबंदी के बाद पेटीएम ऐप डाउनलोड में 300 फीसदी की बढ़त हुई. 2 महीने के अंदर 2 करोड़ नए यूजर जुड़े.  


इस ग्रोथ से विजय को बहुत मोटिवेशन मिली. विजय ने 2017 में पेटीएम मॉल लॉन्च किया. इसे भी दिग्गज निवेशकों से जबरदस्त रेस्पॉन्स मिला. उसी साल आरबीआई से उसे पेमेंट्स बैंक लॉन्च करने की मंजूरी मिली. पेटीएम मुख्यतः कमिशन से अपना रेवेन्यू जेनरेट करती है. एस्क्रो अकाउंट्स के बिजनेस से भी इसकी कमाई होती है. पेटीएम का यूजर बेस इस समय 350 मिलियन के ऊपर है. हर महीने उसके प्लैटफॉर्म पर 1.2 अरब मंथली ट्रांजैक्शन हो रहे हैं. आखिर में, 2021 में विजय शेखर ने कंपनी को शेयर मार्केट में लिस्ट कराया. इतना ही नहीं पेटीएम सबसे ज्यादा वैल्यूएशन के साथ लिस्ट होने वाली कंपनी भी बन गई.

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