आपको सच में पता है कि क्लाइमेट चेंज असल में है क्या और कितना ख़तरनाक है?

By Prerna Bhardwaj
June 27, 2022, Updated on : Fri Aug 26 2022 10:43:29 GMT+0000
आपको सच में पता है कि क्लाइमेट चेंज असल में है क्या और कितना ख़तरनाक है?
क्लाईमेट चेंज पृथ्वी पर मनुष्य जीवन के हर पहलू के लिए एक ख़तरा है और मनुष्य की हर गतिविधि किसी न किसी तरह कलाइमेट चेंज के लिए ज़िम्मेवार है. पर आख़िर यह है क्या?
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पिछले कई सालों से हम सुन रहे हैं कि दुनिया का क्लाईमेंट बदल रहा है. दुनिया में गर्मी बढ़ रही है. ओज़ोन की परत में कुछ हो गया है. आने वाले सालों में किसी भी जगह का मौसम जैसा है वैसा नहीं रहेगा. सुनने में यह भी आता है कि इसको लेकर सेमिनार हो रहे हैं, बच्चों को स्कूलों में पढ़ाया जा रहा है इसके बारे में, सरकारें इससे निपटने के लिए पैसा खर्च कर रही है, इसके लिए मंत्रालय बन गए हैं. भारत सरकार का ही एक मंत्रलाय है  - पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय. राज्य स्तर पर भी विभाग हैं, मंत्री हैं. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संयुक्त राष्ट्र संघ है, अर्थ सम्मिट हैं, और इसके लिए आवाज़ उठाते हज़ारों प्रदर्शनकारी हैं. 


लेकिन इसके बावजूद हम में से कई यह नहीं जानते कि दरअसल यह ठीक ठीक है क्या? क्या सच में दुनिया इसके वजह से एक दिन नष्ट हो जायेगी? 

क्या है क्लाइमेट चेंज?

एक जगह पर सालों तक चलने वाले अलग-अलग मौसम को क्लाईमेट कहते हैं. उन सालों तक एक जैसे चलने वाले मौसम की औसत अवस्था में किसी तरह के बदलाव को क्लाईमेट चेंज कहते हैं. 


क्लाईमेट में यह बदलाव मनुष्यों द्वारा बिठाई गयीं फैकटरियों से निकलते हुए धुंए से, और हमारी गाड़ियों, घरों, वाहनों में गैस, तेल, कोयले की खपत के  कारण होता है. 


जब फॉसिल फ्युएल जलने पर ग्रीनहाउस गैसेस एमिट करते हैं, मुख्यतः कार्बन डाईऑक्साइड (CO2). ग्रीनहाउस गैस खतरनाक होती हैं क्योंकि ये सूरज की गर्मी को ट्रैप करती हैं जिसकी वजह से धरती का तापमान बढ़ता है. 


19वीं सदी के मुकाबले आज पृथ्वी का तापमान 1.2 डिग्री सेल्सियस ज़्यादा है और हवा में तब के मुक़ाबले डेढ़ गुणा कार्बन डाईऑक्साइड (CO2) है. 

मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर हमें पृथ्वी बचानी है तो किसी भी सूरत में वैश्विक तापमान को इससे ज्यादा नहीं बढ़ने देना होगा जबकि हाल ही में प्रकाशित हुए एक रिपोर्ट के मताबिक, इस सदी के अंत तक पृथ्वी का तापमान 2.4 डिग्री तक बढ़ जाने का अनुमान है. 

क्या प्रभाव पड़ेगा ग्लोबल वार्मिंग का?

मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक़, कुछ इलाके बढ़ते तापमान के कारण रहने के काबिल नहीं रह जायेंगे. इसके उलट जैसा जर्मनी, चीन, बेल्जियम जैसे देशों में देखा जा रहा है  कुछ इलाकों में अत्यधिक बारिश की वजह से, बाढ़ आयेगी जिससे जान-माल की क्षति होगी. 


विकासशील और गरीब देशों को इसका सबसे अधिक नुकसान उठाना पड़ेगा. बाढ़, हरिकेन, सुखा, अकाल, के कारण हुए नुकसान की भरपाई करने में ये देश असक्षम रहेंगे जिससे इन देशों की इकॉनमी पर अच्छा-ख़ासा असर पड़ेगा. 


समुद्र में रहने वाले जीव-जंतुओं पर इसका असर इतना भयावह होगा जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती. ऑस्ट्रेलिया के ‘द ग्रेट बैरियर रीफ’ का 50 प्रतिशत ख़त्म हो चूका है समुद्र का पानी गरम हो जाने के कारण. वैज्ञानिकों का मानना है की लगभग इस सदी के अंत तक जीव जंतुओं की 550 प्रजातियाँ ख़त्म हो जाएँगी अगर क्लाइमेट को लेकर हमारा यही रवैया कायम रहा तो. 


अमेरिका में वाईल्डफायर का आम होना भी क्लाइमेट के गर्म और सूखे होने के कारण ही है. 


पोलर बेयर बर्फ के पिघलने के कारण अपनी रहने के जगह खो सकते हैं. जिसका सीधा असर उनके अस्तित्व पर पड़ेगा. हाथी, जिसे 150-300 लीटर पानी रोजाना की जरुरत होती है, का तो जीवन ही संकट में पड़ सकता है. 


मनुष्यों की दुनिया में मध्य पूर्व के देशों में अभूतपूर्व हीट-वेव का प्रकोप होगा. इंग्लैंड और यूरोप में कभी भी बाढ़ आने की संभावना बढ़ जायेगी. अफ्रीकी देशों में सूखा पड़ेगा. अमेरिका में सूखा और तूफ़ान दोनों की सम्भावना बढ़ जायेगी. 

इसको कैसे रोक सकते हैं? आप क्या कर सकते हैं? 

125 साल पहले केमिस्ट्री में नोबेल पुरस्कार जीतने वाले स्वीडिश वैज्ञानिक  स्वांत आरीनियस ने हवा में छोड़ी जा रही कार्बन डाई ऑक्साइड से तापमान में होने वाली वृद्धि का अनुमान लगाने का तरीक़ा खोज निकाला था. और 1960 तक तो एक अमेरिकी वैज्ञानिक ने हवा में उपस्थित कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा को ट्रेक करने के लिए एक सिस्टम बना लिया था जिसे उनके नाम पर Keeling Curve कहा जाता है. कहने का अर्थ यह है कि इस ख़तरे को भाँपने में, इसका अध्ययन करने में वैज्ञानिक हमेशा की तरह समय से आगे थे. 


और हमेशा की तरह थोड़ा देर से चल रही थीं दुनिया भर की सरकारें. 1990 में पहली बार मसले पर एक अन्तर्राष्ट्रीय पैनल बना. असल बदलाव आया 1992 के यूएनओ के रियो सम्मिट से. उसके बाद धीरे धीरे लेकिन निश्चित और निर्णायक प्रगति हुई है.  


2015 में हुए पेरिस अग्रीमेंट में दुनिया भर के देशों ने ग्लोबल वार्मिंग को 1.5 डिग्री तक रोक कर रखने की दिशा में काम करने का संकल्प लिया. बहुत सारे देशो ने साल 2050 तक ‘जीरो एमिसन’ अचीव करने का प्रण लिया है. 


इंग्लैंड में इस साल नवम्बर में COP26 आयोजित होने वाला है जिसमे विभिन्न देश साल 2030 तक कार्बन कम करने के लिए क्या क्या पॉलिसीस बनायी जा सकती हैं इस पर चर्चा करेंगे.  

आप क्या कर सकते हैं?

पर्यावरण को लेकर सरकार और कम्पनियों की ज़िम्मेदारी के अलावा हमारी भी जवाबदेही बनती है. हमारे छोटे लेकिन सोच-समझ कर लिए निर्णय से भी बहुत फ़र्क पड़ता है. जैसे इलेक्ट्रिक गाड़ियों का इस्तेमाल करें. जितनी जरुरत हो उतनी ही लाइट्स को यूज में लायें.एनर्जी सेव करने वाली प्रोडक्ट्स को इस्तेमाल करें. गैस के बदले इलेक्ट्रिक हीट पंप को यूज करें. 

  

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