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त्रिपुरा किसानों को सिखाया जा रहा आधुनिक मछलीपालन, ताकि पूरी हो सके मांग

त्रिपुरा किसानों को सिखाया जा रहा आधुनिक मछलीपालन, ताकि पूरी हो सके मांग

Thursday September 27, 2018 , 4 min Read

 चारों तरफ पहाड़ी इलाकों से घिरे इस राज्य में सीमित संसाधनों के बावजूद लोग अपनी आजीविका का प्रबंध कर लेते हैं और इसमें उनकी मदद करता है मछलीपालन।

मछलीपालन में जुटे ग्रामीण

मछलीपालन में जुटे ग्रामीण


त्रिपुरा के मत्स्यपालन विभाग के आंकड़ों के अनुसार अभी मछलीपालन के लिए 23,477 हेक्टेयर क्षेत्र इस्तेमाल किया जा रहा है, लेकिन इससे आपूर्ति नहीं हो पा रही है।

भारत के उत्तर पूर्वी हिस्से में प्राकृतिक छटा से भरपूर एक छोटा सा राज्य है त्रिपुरा। इस छोटे से राज्य में 95 फीसदी लोगों का मुख्य भोजन मछली है। चारों तरफ पहाड़ी इलाकों से घिरे इस राज्य में सीमित संसाधनों के बावजूद लोग अपनी आजीविका का प्रबंध कर लेते हैं और इसमें उनकी मदद करता है मछलीपालन। त्रिपुरा के मत्स्यपालन विभाग के आंकड़ों के अनुसार अभी मछलीपालन के लिए 23,477 हेक्टेयर क्षेत्र इस्तेमाल किया जा रहा है, लेकिन इससे आपूर्ति नहीं हो पा रही है। इस वजह से दूसरे राज्यों जैसे आंध्र प्रदेश और यहां तक कि बांग्लादेश से भी मछली का आयात किया जाता है। यह आंकड़ा दिखाता है कि राज्य में मछली की मांग और पूर्ति के बीच कितना अंतर है।

त्रिपुरा में प्रति वर्ष प्रति व्यक्ति 3.26 किलोग्राम मछली का अंतर होता है। यह दिखाता है कि अगर प्रदेश में मछलीपालन को बढ़ावा दिया जाए तो अधिक से अधिक लाभ कमाया जा सकता है। राज्य सरकार टाटा ट्रस्ट के समर्थन से जिन प्रतिकृति विकास मॉडल पर काम कर रही है, मत्स्यपालन उनमें से एक है। संभावित आकलन के बाद, मत्स्यपालन विभाग ने छह प्रशासनिक ब्लॉक में गांवों की पहचान की इसमें ढलाई जिले के मनु और चौमनु, पद्मबिल और खोवई जिले के तुलासिखर, और सेपहिजला जिले के मोहनभोग और कठलिया शामिल हैं।

इस पहल के तहत बड़ी संख्या में तालाबों, मत्स्यपालन के बड़े क्षेत्र, मछुआरों की बड़ी संख्या, कम ढलान वाले गांवों का चयन किया गया। मोहनभोग ब्लॉक के चंदुल गांव में जनजाति समुदाय की अच्छी आबादी निवास करती है। खास बात यह है कि यहां 80 प्रतिशत घरों में तालाब होता है, लेकिन गांव के लोग सिर्फ खुद के उपभोग के लिए मछलीपालन करते थे। अब उन्हें मत्स्यपालन से जुड़ी सारी जानकारी दी जा रही है। ग्रामीणों को अच्छी गुणवत्ता वाले मछली के बीज और वैज्ञानिक तरीके से मछलीपालन की तकनीक बताई जा रही है।

चंदुल गांव में 10-15 मछली पालने वाले ग्रामीण साथ आए और उन्होंने मिलकर क्रियात्मक समूह का निर्माण किया। उन्होंने मछलीपालन के विभिन्न तरीकों के बारे में जानकारी हासिल की, इसमें तालाब की सही तरीके से देखरेख, स्टॉकिंग, प्रॉडक्शन, बीमारियों से बचाव जैसी जानकारियां जुड़ी होती हैं।

चुनौतियों को अवसरों में बदलना

दो महिलाओं सहित 10 सदस्यों के साथ, गोमती मत्स्य उत्पादान समिति चंदुल के गतिविधि समूहों में से एक है जिसे मछली पालन पर प्रशिक्षण प्राप्त हुआ। त्रिपुरा के मछली किसानों के लिए हमेशा अच्छी गुणवत्ता वाली मछली बीज की पहचान और खरीद करना हमेशा एक चुनौती रहा है। अभी जो पहल चल रही है उसका पूरा ध्यान इस चुनौती को एक अवसर में बदलने पर है। इस समूह के दो प्रतिनिधियों ने त्रिपुरा के गोमती जिले के उदयपुर में एक हैचरी का दौरा किया और वहां पर कमर्शियल उद्देश्य के लिए कृत्रिम रूप से नियंत्रित मछली के अंडों की देखभाल के बारे में सीखा। इस यात्रा ने उन्हें प्रशिक्षण के दौरान प्राप्त ज्ञान पर निर्माण करने में मदद की और उन्होंने इसे अन्य समूह के सदस्यों के साथ साझा किया।

प्रशिक्षित ग्रामीण

प्रशिक्षित ग्रामीण


इस ट्रेनिंग को पूरा करने के बाद ग्रुप के लोगों ने मछली पालन शुरू करने का फैसला किया। समूह ने 1.2 कैनी जमीन लीज पर ली। सभी किसानों ने बराबर पैसे दिए। इससे रिस्क भी कम हो गया। उन्होंने पूरे वैज्ञानिक तरीके से मछली की नर्सरी तैयार की। एक महीने के बाद ग्रुप ने जो मछली की नर्सरी तैयार की थी उससे उन्हें 93,250 रुपये की आय हुई। इस आमदनी से उत्साहित होकर किसानों ने नर्सरी मछली पालन के कार्य को आगे भी जारी रखने का फैसला किया। यह काम साल में दो से तीन बार दोहराया जा सकता है।

इसके बाद समूह ने टेबल मछली पालन के बारे में सीखा। इस तकनीक के जरिए मछली को तभी पानी से निकाला जाता है जब वह खाने के लिए पूरी तरह से तैयार हो जाती है। ऐसे ही एक ग्रामीण स्वप्न दास कहते हैं कि अब वे मछलीपालन की बदौलत हर साल 1,50,000 लाख रुपये की आय अर्जित कर लेते हैं। साथ ही गांव के किसान खेती भी करते हैं जिससे उनकी बाकी जरूरतें भी पूरी होती हैं। 

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