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आभासी दुनिया में भीड़नुमा रिश्ते

जय प्रकाश जय
28th Jul 2017
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आज जो जीवन में घट रहा है, साहित्य में भी, लेकिन पुस्तकें पहले की बनिस्बत ज्यादा प्रकाशित होने के बावजूद पाठकीय संकट से जूझ रही हैं। जिस तरह आभासी दुनिया में कचरे की भरमार है, वही हाल किताबी दुनिया का भी होता जा रहा है लेकिन दोनो जगह बहुत कुछ इतना अच्छा भी आ रहा है।

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पिछले कुछ सालों में सोशल मीडिया में वे लोग दाखिल हुए हैं, जिनके पास अपनी बात कहने का कोई मंच नहीं था। प्रकाशन के मंच से वंचित लोगों को इस माध्यम ने अभिव्यक्ति-सुख का अनंत आकाश दिया है। यह इस माध्यम का शुभंकर पक्ष है, पर सवाल है कि इसका हासिल क्या है? 

रचनात्मक स्पेस का विस्तार हुआ है लेकिन एक आश्चर्यजनक सच आज भी हमारा पीछा नहीं छोड़ रहा है कि पहले निरक्षरता दर अधिक होने अथवा आर्थिक अभावों के कारण किताबें उन लोगों तक नहीं पहुंच पाती थीं, जिनके लिए लिखी जाती रही हैं, उसी तरह आज भी आबादी का बड़ा हिस्सा आभासी दुनिया के संसाधनों की पहुंच से वंचित है।

आभासी दुनिया हमें भीड़नुमा रिश्ते दे रही है। उसकी आत्मीयता और विश्वास टटोलने में भी हमारा बहुत सारा वक्त जाया हो जाता है। दुखद है कि युवा वर्ग इसका सबसे ज्यादा शिकार हो रहा है। दुख की वजह है, आभासी दुनिया में उसका अपनों के बीच अकेलापन। व्हाट्सअप, फेसबुक, ट्विटर, हाईक तरह-तरह के माध्यमों ने सुरसा की तरह अपने में समेट लिया है। उस दुनिया में कहने को रिश्ते तो हजारों हैं लेकिन सुख-दुख के कितने। कई बार उन रिश्तों के सही नाम, सही चेहरे का तो हमें पता भी नहीं होता है।

बशीर बद्र साहब लाइनें हैं-

“हर धड़कते पत्थर को लोग दिल समझते हैं

उम्र बीत जाती है दिल को दिल बनाने में,

कोई जाने जानाँ भी बे-गरज नहीं मिलता

दोस्ती कहाँ होती है आज के जमाने में ”

आभासी दुनिया में साहित्य के नाम पर गर्द और प्रचार की आत्ममुग्धता से अक्सर घुटन सी होने लगती है। वहां हालात दयनीय हैं। हर माध्यम अपने साथ बहुत कुछ नया लेकर आता है। आभासी दुनिया ने शब्दों और मनुष्यों के एक बड़े वर्ग की मुलाकातें आसान की हैं तो साहित्य के नाम पर तरह-तरह डलाबघरों से भी हमे दो-चार होना पड़ता है। रचनात्मक स्पेस का विस्तार हुआ है लेकिन एक आश्चर्यजनक सच आज भी हमारा पीछा नहीं छोड़ रहा है कि पहले निरक्षरता दर अधिक होने अथवा आर्थिक अभावों के कारण किताबें उन लोगों तक नहीं पहुंच पाती थीं, जिनके लिए लिखी जाती रही हैं, उसी तरह आज भी आबादी का बड़ा हिस्सा आभासी दुनिया के संसाधनों की पहुंच से वंचित है।

आभासी दुनिया में ऐसे लोग दाखिल हुए हैं, जिनके पास कोई मंच नहीं था। प्रकाशन के मंच से वंचित लोगों को इस माध्यम ने अभिव्यक्ति-सुख का अनंत आकाश दिया है। यह इस माध्यम का शुभंकर पक्ष है, पर सवाल है कि इसका हासिल क्या है? इस माध्यम ने सबसे अधिक आलोचनात्मक माहौल को विकृत किया है। इसका परिणाम यह है कि अच्छे-बुरे का फर्क गायब है, अच्छी रचना और कमजोर रचना में अंतर करने का काम बंद है।

समाज में शब्द-सुख का अकाल बढ़ता जा रहा है। सबसे ज्यादा अकल्याण आत्मप्रचार ने किया है। यह बाजारवादी संस्कार हावी होने का कुफल है। बाजार मूल्यों को रौंद रहा है। ऐसे में हम जिस समाज का हिस्सा हैं, उसकी जड़ें हिल रही हैं।

रामचंद्र शुक्ल, नंददुलारे वाजपेयी, रामविलास शर्मा, नामवर सिंह के वक्त की तरह आज आभासी दुनिया ने कविता-कुकविता के फर्क को समर्थ, लोकस्वीकार्य आलोचना से वंचित कर दिया है। साधना का स्वर भी मद्धिम पड़ा है। आज मुक्तिबोध की तरह अपने लिखे को भला कितने रचनकार बार-बार स्वयं सुसंपादित करना चाहते हैं। जीवन की इस सच्चाई ने आभासी दुनिया को भी उसी तरह के भेड़िया धसान के हवाले छोड़ दिया है। आज हजारों पत्र-पत्रिकाएं निकल रही हैं, ई-पत्रिकाएं भी कम नहीं हैं, लेकिन उसी रफ्तार से लिखने वालों की अलग-अलग जमातें बनती जा रही हैं। इसके पीछे आत्ममुग्धता के साथ धैर्य की कमी भी दिखती है। यदि कुछ है, तो सिर्फ जल्दी से प्रसिद्ध होने की बेचैनी

देखने में आ रहा है कि कई बार बड़े कवि-लेखक भी इस आबोहवा में उलट-पुलट जाते हैं। आभासी दुनिया के कोलाहल में उनकी भी परख और स्वीकार्यता धरी रह जा रही है। इससे समाज में शब्द-सुख का अकाल बढ़ता जा रहा है। सबसे ज्यादा अकल्याण आत्मप्रचार ने किया है। यह बाजारवादी संस्कार हावी होने का कुफल है। बाजार मूल्यों को रौंद रहा है। ऐसे में हम जिस समाज का हिस्सा हैं, उसकी जड़ें हिल रही हैं। कवि-लेखक खुद ही अपनी-अपनी रचनाओं के लिए मुखर हैं कि आलोचक चुप साध जा रहे हैं। जिनसे कालजयी रचनाओं की संभावना हो, वह फेसबुक, ह्वाट्सेप पर डंटे रहें तो अच्छी किताबें कहां से आएंगी। रही-सही कसर रोज-रोज के पुरस्कार और सम्मान समारोह पूरे किए जा रहे हैं।

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