संस्करणों
विविध

बिना हाथ के धवल ने कैनवास पर उकेरीं सैकड़ों पेंटिंग!

जय प्रकाश जय
30th Oct 2018
26+ Shares
  • Share Icon
  • Facebook Icon
  • Twitter Icon
  • LinkedIn Icon
  • Reddit Icon
  • WhatsApp Icon
Share on

इसे कहते हैं, असंभव को संभव कर देना। गुजरात के तीस वर्षीय युवा ऑर्टिस्ट धवल के. खत्री, एक ऐसी ही शख्सियत हैं। एक हादसे के बाद कुहनियों के नीचे दोनो हाथ काट दिए जाने के बावजूद अब तक वह तीन सौ से अधिक पेंटिंग्स बना चुके हैं। उन्होंने अपनी कुहनियों को ही हथेली और उंगलियों में तब्दील कर लिया है।

धवल खत्री

धवल खत्री


 कभी-कभी तो कठिनाइयों, मुश्किलों से मिलने वाला सबक ही दूसरी राह सुझा देता है, दिमाग और तेजी से बेहतर काम करने लगता है। बल्कि वह तो मानते हैं कि मुश्किलें ही अपनी सबसे सच्ची दोस्त होती हैं। 

अहमदाबाद (गुजरात) के मशहूर चित्रकार धवल के. खत्री, जिन्होंने बचपन में ही अपने दोनो हाथ गंवा दिए थे, उनके सामने सैकड़ों मुसीबतें आईं लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। अब तक वह बिना उंगली, बिना हथेली के सैकड़ों पेंटिंग्स बनाकर वह ये साबित कर चुके हैं कि जिंदगी में कुछ भी नामुकिन नहीं होता है। उन्होंने बचपन में बिजली का नंगा तार पकड़ लिया था, जिससे उनके दोनों हाथ काटने पड़े। वह कहते हैं - 'मत कर यकीन अपने हाथों की लकीरों पर, नसीब उनके भी होते हैं, जिनके हाथ नहीं होते।' धवल जब सन् 2003 में 14 वर्ष के थे, बिजली के नंगे तारों में फंसी अपनी पतंग निकाल रहे थे। उनके दोनो हाथ हाई वोल्‍टेज करंट वाले तारों से चिपक गए। करंट ने उन्हें झकझोर कर रख दिया। पूरा शरीर झन्ना उठा। करीब चौदह फुट की ऊंचाई से जमीन पर गिरे तो बेहोश। सांस थम गई। तभी मॉर्निंग वॉक पर निकले दो डॉक्‍टरों ने पहले तो घटनास्थल पर ही उनके मुंह में हार्टपंप किया, अपने मुंह से सांस भरने की कोशिश की, सांस आ गई। फिर उनको आनन-फानन में अस्‍पताल पहुंचाया गया। जान तो बच गई, हाथ नहीं। घाव गहरे थे, उनमें गैंग्रीन हो गया था। पूरे शरीर में फैल जाने का खतरा। माता-पिता को समझाया गया कि दोनों हाथ काट दिए जाने के अलावा और कोई रास्‍ता नहीं। कोहनी से नीचे दोनों हाथ काट दिए गए।

माता-पिता भी उनको किसी भी कीमत पर निराशा के अँधेरे में डूबने नहीं देना चाहते थे। हाथ कट जाने के बावजूद वे लगातार बेटे को को प्रेरित करते रहे। वह जब हॉस्पिटल में ही थे, तभी मां उन्हें पैन और पैन्सिल पकड़ने की प्रेक्टिस कराने लगीं। इससे प्रेरित-उत्साहित होकर वह भी रोजाना कुछ न कुछ लिखने, साथ-साथ पेंटिंग का भी प्रयास करने लगे। इस तरह आठ महीनों की कड़ी मेहनत के बाद वह बिना हाथ के पेंटिंग बनाना सीख गए। आज वह सफल चित्रकार ही नहीं, मोटिवेशनल स्पीकर भी हैं। दरअसल, उन्हीं कठिनाइयों ने धवल की कुहनियों को हथेलियों, उंगलियों की तरह काम करने का आदती बना डाला। पैन हो या ब्रश, वह उसी तरह उनका इस्तेमाल करने लगे, जैसे आम लोग करते हैं। कोई मुश्किल, कोई अड़चन नहीं। ऐसा भी नहीं कि वह कोई अत्यंत मेधावी छात्र रहे, पढ़ाई और पेंटिंग, दोनों में औसत लेकिन घटना के बाद से जो नई बात उन्होंने अपने अंदर देखी, मां की प्रेरणा, पिता के प्रोत्साहन ने चित्रकारी का उनमें जुनून सा भर दिया। एक बार सोनी टीवी के प्रोग्राम 'इंटरटेन्‍मेंट के लिए कुछ भी करेगा' में जब उन्होंने तमाम लोगों के बीच कैमरे के सामने पेंटिंग बनाई तो अचानक उन्हें पूरी दुनिया जान गई। आज तीस वर्ष के वह हो चुके, वह तमाम बड़े खिलाड़ियों, फिल्म-टीवी सितारों की पेंटिंग बना चुके हैं। इसके अलावा वह वॉल पेंटिंग भी कर लेते हैं।

आज भी धवल को, जनवरी महीने के उत्‍तरायण का वह गुजरात के काइट फेस्टिवल वाला दिन, जब आसमान रंग-बिरंगी पतंगों से पटा था, याद आता है तो खुद के होशोहवास पर काबू पाना उनके लिए आसान नहीं होता है। फिर धीरे-धीरे वह खुद ही नॉर्मल हो लेते हैं। हादसे के उस दिन वह अपने गांव गए हुए थे। बिना रेलिंग वाली छत पर खड़े होकर अन्य बच्चों के बीच जब हाथ में चरखी हो, डोर ढीली हो, पतंग आसमान में फर्राटे भर रही हो और उम्र लड़कपन की तो फिर होश कहां रहता है। ऐसे में जो होना था, हो चुका, अब उसे क्यों जिंदगी भर बिसूरते रहना। उस समय वह नौवीं क्‍लास में थे। इलाज खत्म होने के बाद स्‍कूल ने ठुकरा दिया। प्रबंधन का कहना था कि जब हाथ ही नहीं, तो कैसे लिखोगे, किताबें कैसे पकड़ोगे।

धवल कहते हैं, जिंदगी के हर रास्ते, हर कदम, हर मोड़ पर सिर्फ, और सिर्फ हिम्मत काम आती है। जिंदगी की एक गली बंद होती है, दूसरी खुल जाती है। कभी-कभी तो कठिनाइयों, मुश्किलों से मिलने वाला सबक ही दूसरी राह सुझा देता है, दिमाग और तेजी से बेहतर काम करने लगता है। बल्कि वह तो मानते हैं कि मुश्किलें ही अपनी सबसे सच्ची दोस्त होती हैं। उस स्कूल से ठुकरा दिए जाने के बाद वह साल भर तो घर पर ही रह कर पढ़े, फिर उन्हे दूसरे स्कूल में दाखिला मिल गया। कुहनियों के सहारे फिर तो वहीं से दसवीं भी पास, बारहवीं भी। धवल ने कभी भी खुद पर अपनी कमजोरियों को हावी नहीं होने दिया। सच तो ये रहा कि अपनी कमजोरी को ही उन्होंने अपनी सबसे बड़ी ताकत बना ली। वह केवल पेंटिंग ही नहीं बनाते, गिटार भी अच्छा बजा लेते हैं, हर हफ्ते क्रिकेट-फुटबॉल खेलते हैं। और तो और, अपने साथ हुए उतने भयानक हादसे के बावजूद आज भी उनकी बचपन की वह प्यारी लत गई नहीं है, वह आज भी पतंग उड़ाते हैं। वह कहते हैं कि आज जब कभी वह पीछे मुड़कर देखते हैं, लगता है कि जैसे कोई पूर्वजन्म की बात हो। उन्हें आज आर्टिस्टों से, अपने जानने वालों से, मीडिया से, प्रतिष्ठित हस्तियों से भरपूर सम्मान मिल रहा है।

यह भी पढ़ें: अहमदाबाद का यह शख्स अपने खर्च पर 500 से ज्यादा लंगूरों को खिलाता है खाना

26+ Shares
  • Share Icon
  • Facebook Icon
  • Twitter Icon
  • LinkedIn Icon
  • Reddit Icon
  • WhatsApp Icon
Share on
Report an issue
Authors

Related Tags

Latest Stories