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एक ऐसा गज़लकार जिनकी गज़लों ने मोहब्बत के दर्द में भी किया राहत का काम

प्रज्ञा श्रीवास्तव
11th Oct 2017
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जगजीत सिंह, दुनिया भर में अपने प्रशंसकों के बीच ग़ज़ल किंग के रूप में जाने जाते हैं। जगजीत सिंह ने अपनी पत्नी और गायिका चित्रा के साथ ग़ज़ल जैसी जटिल परंपरागत संगीत के रूप को सरल बना डाला। उन्होंने संगीत पर अधिक जोर दिया और भारतीय शास्त्रीय उपकरणों, जैसे तबला और सितार के साथ साथ सैक्सोफोन्स और गिटार जैसे पश्चिमी वाद्ययंत्रों का इस्तेमाल किया।

साभार: सोशल मीडिया

साभार: सोशल मीडिया


इन सब ताम-झाम के बावजूद उन्होंने अपनी गायिकी में कविता के किसी भी भावुक प्रभाव का त्याग नहीं किया। जब वो गाते थे तब सामने बैठे श्रोताओं- दर्शकों की आंखों से आंसुओं में की श्रृंखला बह निकलती थी।

फरवरी 2014 में, भारत सरकार ने संगीत की दुनिया में अपना बड़ा योगदान मनाने के लिए उनके सम्मान में एक डाक टिकट जारी किया था। 10 अक्टूबर 2011 को जगजीत सिंह इस दुनिया को छोड़ कर चले गए। आज गजल की दुनिया के महान कलाकार जगजीत सिंह हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी मधुर और सदाबहार आवाज हमेशा हमारे साथ हैं।

जगजीत सिंह, दुनिया भर में अपने प्रशंसकों के बीच ग़ज़ल किंग के रूप में जाने जाते हैं। जगजीत सिंह ने अपनी पत्नी और गायिका चित्रा के साथ ग़ज़ल जैसी जटिल परंपरागत संगीत के रूप को सरल बना डाला। उन्होंने संगीत पर अधिक जोर दिया और भारतीय शास्त्रीय उपकरणों, जैसे तबला और सितार के साथ साथ सैक्सोफोन्स और गिटार जैसे पश्चिमी वाद्ययंत्रों का इस्तेमाल किया। इन सब ताम-झाम के बावजूद उन्होंने अपनी गायिकी में कविता के किसी भी भावुक प्रभाव का त्याग नहीं किया। जब वो गाते थे तब सामने बैठे श्रोताओं- दर्शकों की आंखों से आंसुओं में की श्रृंखला बह निकलती थी।

यहां पर आपको बता दें, ग़ज़ल 6 वीं शताब्दी की अरबी कविता में उत्पन्न हुआ है और आम तौर पर पांच या अधिक छद्म दोहरों की एक श्रृंखला, एक मक़ता और एक मतला शामिल होता है। आम तौर पर प्यार, वफा और जफा के उदासीन विषयों के बीच ही ग़ज़ल केंद्रित होती है, लेकिन ऐसा होना कोई जरूरी भी नहीं है। ग़ज़ल दिल्ली में मुगलों की सल्तनत के दौराम सूफी रहस्यवादी कवियों के साथ भारत में फैला और एक उर्दू काव्य रूप के रूप में विकसित हुआ। आमतौर पर ग़ज़ल गायन शास्त्रीय यंत्रों का इस्तेमाल करने वाले संगीतकारों के साथ संगत बिठाकर किया जाता बै। यद्यपि आज ग़ज़ल भारतीय उपमहाद्वीप की कई भाषाओं की कविता में पाया जाता है, फिर भी पारंपरिक रूप से इसे अभिजात वर्ग की कविता के रूप में देखा गया है।

साभार: एचटी

साभार: एचटी


जगजीत जैसा जादू जहान में कहीं नहीं-

जगजीत सिंह एकमात्र संगीतकार और गायक हैं जिन्होंने भारत के पूर्व प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी (जोकि एक कवि भी हैं) के दो एल्बमों, नयी दिशा (1999) और समवेदना (2002) में लिखे गीतों को अपनी आवाज के साथ दर्ज किया और रिकॉर्ड किया। यह सम्वेदना, 'क्या खोया क्या पया' संकलन से एक गीत था, जिसमें उन्होंने अमिताभ बच्चन, शाहरुख खान और यश चोपड़ा के साथ काम किया। यह वाजपेयी द्वारा लिखा गया था, जिसे जगजीत सिंह ने गाया, इसका वीडियो का निर्देशन चोपड़ा ने किया था, शाहरुख खान द्वारा प्रस्तुति दी गई और बच्चन साहब ने इसे नैरट किया था।

जगजीत सिंह ने अपनी ग़ज़ल गायिकी में अभूतपूर्व ऊंचाइयों को छुआ है और उनके कई गाने क्लासिक माने जाते हैं। जगजीत सिंह को अभिजात ग़ज़ल गायिकी को जनता की गजल बनाने का श्रेय जाता है। उन्होंने एक 'बेयॉन्ड टाइम' (1987) नामक एक विशुद्ध रूप से डिजिटल सीडी एल्बम रिकॉर्ड लॉन्च किया था। इस तरह से वो डिजिटल सीडी एल्बम रिकॉर्ड लॉन्च वाले पहले भारतीय संगीतकार भी हैं। 'होठों से छूलो तुम, मेरा गीत अमर कर कर दो' इस महान गायक की पसंदीदा गज़ल थी। और उनके गीत वास्तव में हर जगह अमर रहेंगे। जगजीत सिंह को सन 2003 में भारत सरकार द्वारा कला के क्षेत्र में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। फरवरी 2014 में, भारत सरकार ने संगीत की दुनिया में अपना बड़ा योगदान मनाने के लिए उनके सम्मान में एक डाक टिकट जारी किया था। 10 अक्टूबर 2011 को जगजीत सिंह इस दुनिया को छोड़ कर चले गए। आज गजल की दुनिया के महान कलाकार जगजीत सिंह हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी मधुर और सदाबहार आवाज हमेशा हमारे साथ हैं।

साभार: ट्विटर

साभार: ट्विटर


8 फरवरी, 1941 को राजस्थान के गंगानगर में जगमोहन सिंह धिमान के घर में जगजीत सिंह का जन्म हुआ था। ये एक सिख परिवार था।जगजीत को हमेशा से ही संगीत सीखने में दिलचस्पी थी। वो अपने युवा दौर में भी खूब मन लगाकर गुरुद्वारों में गुरुबानी गाते थे। हालांकि उनके पिता सरदार अमर सिंह धिमान, जो कि एक सरकारी सर्वेक्षक थे, वो उन्हें एक इंजीनियर या एक आईएएस अधिकारी बनने हुए देखना चाहते थे। इसलिए उन्होंने जगजीत को 1959 में जालंधर भेज दिया। जगजीत ने डीएवी कॉलेज में स्नातक स्तर की पढ़ाई के लिए प्रवेश लिया, लेकिन अपने छात्रावास के कमरे में किताबों की तुलना में वो अधिक संगीत वाद्य यंत्रों के ज्यादा करीब थे। जल्द ही उन्होंने संगीत में एक पेशेवर करियर के तौर पर रुचि विकसित कर ली। फिर उन्होंने पंडित छगनलाल शर्मा और सेनिया घाराना के उस्ताद जमाल खान द्वारा शास्त्रीय संगीत में प्रशिक्षण देने का फैसला किया। और बाकी, जैसा वे कहते हैं, इतिहास है ही।

संगीत उनके लिए प्राणवायु थी और उनका संगीत हमारे लिए-

जगजीत सिंह की पहली रिकॉर्डिंग 52 साल पहले जालंधर अखिल भारतीय रेडियो स्टेशन में हुई थी। वह एयर जालंधर के लिए एक साल में छह बार लाइव कॉन्सर्ट करते थे। बाद में एक गायक के रूप में अपने करियर को आगे बढ़ाने के लिए वो वहां से मुंबई (तब-बॉम्बे) चले गए। शुरू में तो उन्हें वहां अपना गुजारा करने के लिए इधर-उधर काम करना पड़ा। फिर वो ड्रामा कंपनियों में पार्ट टाइम अभिनय करने लगे। उनकी कड़ी मेहनत और लगन जल्द ही रंग दिखाने लगी। धीरे-धीरे उन्हें रेडियो में विज्ञापन के लिए जिंगल बनाने का काम मिलने लगा। वो शादियों में भी परफॉर्मेंस देने लगे ताकि उनका गुजारा चलता रहे। वरली में चार अन्य लोगों के साथ एक छोटे सा कमरा ले लिया था। अपने भोजन का जुगाड़ करने के लिए वो दादर तक चले गए, जहां रेस्तरां के मालिक ने उसे मुफ्त में भोजन दिया। धीरे-धीरे, उन्होंने विज्ञापन जिंगल की दुनिया में खुद का नाम बनाया और एक पार्श्व गायक के रूप में काम करना शुरू कर दिया।

चित्रा के साथ जगजीत, साभार: म्यूजिक बाय लाइफ

चित्रा के साथ जगजीत, साभार: म्यूजिक बाय लाइफ


समय ने करवट ली और 1965 में जगजीत ने अपना पहला अल्बम लॉन्च किया। दो साल बाद, एक स्टूडियो में उनकी मुलाकात चित्रा सिंह से हुई। ये 1967 की बात है। चित्रा ने तब जगजीत के साथ उस विज्ञापन जिंगल गाने से इन्कार कर दिया। फिल्मफेयर को दिए एक साक्षात्कार में चित्रा ने उस मजेदार वाकये को याद करके बताया था कि मैंने संगीत निर्देशक को बोला, 'इन साहब की आवाज़ बहुत भारी है इसलिए मैं उनके साथ गाऊँगी ही नहीं।' हालांकि, दोनों ने स्टूडियो में और इसके बाहर क्लिक किया। फिर एक वक्त आया जब चित्रा ने जगजीत के साथ गायन करना शुरू कर दिया और दोनों को 'गज़ल जोड़ी' का नाम उनके चाहने वालों ने दिया। उनकी आवाज एक-दूसरे की खूबसूरती से मिलती-जुलती थी।

जगजीत की गहरी खनकती आवाज किसी नदी की तरह घूमती हुई थी, उस पर चित्रा की मधुर सुरमयी आवाज किसी धुंध की तरह नृत्य करती थी। इस प्यारी ग़ज़ल जोड़ी ने 1969 में एक-दूसरे से शादी कर ली। इसके बाद दोनों ने कंधे से कंधा मिलाकर गजल गायकी का ये सफर तय करना शुरू किया। चित्रा के साथ उनका पहला एलबम 'द अनफॉरगेटेबल्स' आया, जिसे असल में आज तक कोई नहीं भुला पाया है। दोंनों ने मिलकर ढेरों स्टेज शोज किए लेकिन कभी चित्रा की पतली आवाज और जगजीत की सिंह का बास साउंड बेमेल नहीं लगा। दर्शक दोनों को साथ में सुनकर झूम उठते थे।

साभार: सोशल मीडिया

साभार: सोशल मीडिया


वो अलहदा थे, उनकी आवाज भी और अंदाज भी-

जगजीत परंपरागत ग़ज़ल पर अपने आधुनिक ले जाने के लिए शुद्धवादियों के आपत्तियों को हमेशा खारिज करते रहे थे। उनका कहना था कि परंपरा एक नकली शब्द है। जिसे लोग प्रगति से बचने के लिए एक बहाना के रूप में इस्तेमाल करते हैं। हो सकता है कि अब से 50 साल बाद मैंने जो कुछ किया है, वह परंपरा होगी। मुझे चार नृत्यों, दो या तीन झगड़े और दो सेक्स के दृश्यों के साथ फिल्म पसंद नहीं है। अगर कोई मेरे पास आता है, तो मुझे गीत को देखना होगा। सबसे पहले, गीतों को सम्मानजनक होना चाहिए। इसका अर्थ है कोई अश्लील दोहरा अर्थ नहीं। फिर वो मेरी छवि से फिट होना चाहिए। मैं सिर्फ किसी बकवास नहीं गा सकता हूं।

जगजीत सिंह ने हिंदी फिल्मों के लिए भी कई गाने गाए हैं। लोकप्रिय फिल्मों में अर्थ, साथ साथ, प्रेमगीत, तुम बिन, सरफरोश, दुश्मन और तरकीब शामिल हैं। जगजीत सिंह ने एक प्रतिभा के रूप में खुद को साबित कर दिया है क्योंकि वह मिर्जा गालिब की कविता का सही अर्थ उन्हें गहन गायन के रूप में गाते हुए पेश करते हैं। उनकी अल्बम को संगीत जगत की एक उत्कृष्ट कृति के रूप में नाम दिया जा सकता है। उनकी आवाज की गुणवत्ता कभी भी झुकी नहीं। उन्होंने फिल्मों के अलावा कई भक्ति गीतों को भी गाया है जिन्हें सुनना किसी के लिए भी बहुत शांतिपूर्ण होता है। आधुनिक समय में जगजीत सिंह अविवादित ग़ज़ल कलाकार हैं।

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