क्यों भाग रहे हैं हजारों अमीर देश से और करोड़ों गरीब गांव से?

By जय प्रकाश जय
March 24, 2018, Updated on : Thu Sep 05 2019 07:15:18 GMT+0000
क्यों भाग रहे हैं हजारों अमीर देश से और करोड़ों गरीब गांव से?
डालें देश के भागे हुए अमीरों और यहां रहने वाले गरीबों पर एक नज़र...
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यह किस तरह का पलायन है कि अब तक 23 हजार अमीर वतन छोड़कर यूके, दुबई, सिंगापुर, ऑकलैंड, मोंट्रियाल, तेल अवीव, टोरंटो में जा बसे हैं और उ.प्र., म.प्र., झारखंड, उत्तराखंड, ओडिशा, प.बंगाल, छत्तीसगढ़, बिहार, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल, मेघालय आदि के करोड़ों गरीब महाराष्ट्र, हरियाणा, दिल्ली, पंजाब, राजस्थान में। इस दोतरफा पलायन की एक भयावह सच्चाई है, दलालों, एजेंसियों के माध्यम से गरीब बेटियों की बड़े पैमाने पर खरीद-फरोख्त।

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कोई लोन न चुका पाने से भागा है तो कोई भ्रष्टाचार से धन जुटाने के बाद। जहां तक इस समय दुनिया के अरबपतियों की बात है, सबसे ज्यादा 540 अरबपति अमेरिका में, 251 चीन में, 120 जर्मनी में, लगभग नब्बे भारत में, 77 रूस में, 63 हांगकांग में, 43 इटली में, 39 फ्रांस में और 33 अरबपति कनाडा में हैं।

देश के लाखों, करोड़ों मेहनतकश गरीब किसान-मजदूर तो बेरोजगारी, निर्धनता की मार से त्रस्त होकर अपनी जड़ों से उजड़ रहे हैं, अपने गांवों से पलायन कर रहे हैं लेकिन इन अमीरों को आखिर हुआ क्या है कि पतली गली से धीरे-धीरे लगभग तेईस हजार हिंदुस्तानी करोड़पति अपना वतन छोड़कर विदेशों में जा बसे हैं। इनमें से लगभग सात हजार करोड़पति अभी पिछले साल ही भारत छोड़ गए हैं। कोई बता रहा है कि कानूनी कार्रवाइयों के डर से भाग रहे हैं तो कोई बताता है कि माल-मत्ता समेट लेने के बाद अब विदेशी आबोहवा में मजे की जिंदगी बिताने चले गए। एक सर्वे के बाद मॉर्गन स्टेनली इनवेस्टमेंट मैनेजमेंट का आंकड़ा खुलासा कर रहा है कि एक करोड़ डॉलर से अधिक की सम्पत्ति वाले 2.1 प्रतिशत भारतीय अमीर, 1.3 फ्रेंच अमीर और 1.1 चीनी रईस अपना-अपना देश त्याग कर यूके, दुबई, सिंगापुर, ऑकलैंड, मोंट्रियाल, तेल अवीव, टोरंटो में जा बसे हैं। कोई लोन न चुका पाने से भागा है तो कोई भ्रष्टाचार से धन जुटाने के बाद। जहां तक इस समय दुनिया के अरबपतियों की बात है, सबसे ज्यादा 540 अरबपति अमेरिका में, 251 चीन में, 120 जर्मनी में, लगभग नब्बे भारत में, 77 रूस में, 63 हांगकांग में, 43 इटली में, 39 फ्रांस में और 33 अरबपति कनाडा में हैं। दूसरी तरफ देश के भीतर के पलायन के हालात पर नजर डालते हैं तो पता चलता है कि पर्वतीय राज्यों, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल, उत्तराखंड, मेघालय के अलावा आदिवासी बहुल राज्यों छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, बंगाल आदि प्रदेशों से पलायन कर रहे आदिवासी युवाओं के जड़ों से उजड़ने की लहर सी आई हुई है। इसकी एक वजह, आदिवासियों के हितों के संरक्षण से जुड़े कानूनों, पंचायत (अधिसूचित क्षेत्र विस्तार) अधिनियम, 1996 अनुसूचित जाति एवं अन्य परंपरागत वन्य जाति वनाधिकार अधिनियम 2006 को ठीक से लागू नहीं किया जाना है।

एक ताजा जानकारी के मुताबिक शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार में देश के आदिवासियों की स्थिति दलितों से भी बदतर हो चुकी है। इस उपेक्षा से आदिवासी समूह नेस्तनाबूद होने की कगार पर पहुंच गए हैं। अधिकतर आदिवासी युवा दक्षिण भारत की ओर कूच कर रहे हैं। अपने छोटे-छोटे खेतों की मामूली फसली उपज से साल के कुछ महीने जी लेने के बाद बाकी वक्त भूख से तड़पने की बजाए वह शहरों, महानगरों के मध्यमवर्गीय परिवारों में घरेलू टहल को ज्यादा मुफीद मान रहे हैं। मनरेगा से भी उनका पलायन नहीं थमा है। उन्हें नगरों, महानगरों की ओर हांक ले जाने में तमाम प्लेसमेंट एजेंसियां भी जुट गई हैं। ऐसे आदिवासी लोगों की तादाद अकेले मुंबई, दिल्ली, कोलकाता में ही पांच लाख से अधिक पाई गई है। इसी तरह उन उत्तरी राज्यों में भी पलायन की बाढ़ सी आई हुई है, जहां मानसून आधारित खेती ही जीविकोपार्जन का एक साधन है और प्राकृतिक आपदाएं जिनकी बदकिस्मती बन चुकी हैं।

अमूमन अशिक्षा, गरीबी और बेरोजगारी इनको पलायन के लिए मजबूर कर रही है। ऐसे पलायर की दर सबसे ज्यादा बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिसा और मध्य प्रदेश में है। भारत सरकार की 2011 की जनगणना के मुताबिक लगभग डेढ़ दशक पहले ही वर्ष 1991 से 2001 के बीच करोड़ों की संख्या में ग्रामीण शहरों की ओर पलायन कर चुके थे। आज इस रफ्तार में 37 से 40 प्रतिशत तक इजाफा हो चुका है। उनमें से लगभग 20 लाख महाराष्ट्र में, 67 लाख हरियाणा में, 68 लाख गुजरात में जा बसे हैं। इसका सबसे दुखद अध्याय है कि झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़ से बड़ी संख्या में पलायन करने वाली किशोरियों को दलाल महानगरों में बेंच रहे हैं। गरीब बालिकाओं को रोजगार, धंधे के लिए दलालों के हाथ बेचने के पीछे अशिक्षा और स्थानीय स्तर पर रोजगार का अभाव है।

बदलते भारत की इस दोहरी तस्वीर ने चुगली की है कि बीते डेढ़ दशक के भीतर देश के लगभग दस फीसदी लोग दौलतमंद हुए हैं, बाकी नब्बे फीसदी कटोरे में चिल्लर लिए डोल रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की एक रिपोर्ट से पता चला है कि निकट अतीत में आर्थिक गैरबराबरी काफी भयावह रूप ले चुकी है। स्विटजरलैंड की ज्यूरिख स्थित संस्था क्रेडिट सुईस तो बता रही है कि भारत में 53 फीसदी दौलत एक फीसदी धनकुबेरों के पास इकट्ठी हो चुकी है। देश की सबसे गरीब आबादी सिर्फ 4.1 फीसदी संपत्ति की हिस्सेदार बची है। बताया गया है कि मौजूदा दशक में वर्ष 2010 से 2015 के बीच देश की गरीब आबादी के हिस्से के संसाधन 5.3 फीसदी से घटकर 4.1 फीसदी रह गए, जबकि इसी दौरान देश की दौलत में लगभग 2.28 खरब डॉलर का इजाफा हुआ है। 

इस बढ़ोतरी का 61 फीसदी हिस्सा देश के एक प्रतिशत अमीरों के थैले में चला गया है और दस प्रतिशत हासिल कर लेने के साथ ये आकड़ा इक्यासी प्रतिशत पहुंच चुका है। आर्थिक असमानता के इस बेखौफ मैराथन में हमारा देश अमेरिका से भी आगे निकल चुका है। अमीरपरस्त नीतियां देश की वास्तविक तरक्की की राह में अब सबसे बड़ी रुकावट बन चुकी हैं। क्रेडिस सुईस की रिपोर्ट बताती है कि ‘भारत में धन दौलत तेज़ी से बढ़ रही है, अमीरों और मध्यम वर्ग की संख्या भी बढ़ रही है लेकिन इस विकास में हर कोई हिस्सेदार नहीं है।’

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