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लोकप्रिय 'बिज्जी' की कहानियों पर बनीं दर्जनों फ़िल्में

लोकप्रिय 'बिज्जी' की कहानियों पर बनीं दर्जनों फ़िल्में

Saturday November 10, 2018 , 5 min Read

राजस्थानी लोक कथाओं एवं कहावतों का अद्भुत संकलन करने वाले पद्मश्री विजयदान देथा एक जादुई कथाकार थे। चाहने वाले लाखों पाठक जिनको प्यार से 'बिज्जी' कहते हैं। उनकी लिखी कहानियों पर दो दर्जन से ज़्यादा फ़िल्में बन चुकी हैं। आज (10 नवम्बर) उनकी पुण्यतिथि है।

विजयदान देथा

विजयदान देथा


राजस्थान की रंग रंगीली लोक संस्कृति को आधुनिक कलेवर में पेश करने वाले, लोककथाओं के अनूठे चितेरे विजयदान देथा ताउम्र राजस्थानी में लिखते रहे और लिखने के सिवा कोई और कोई काम नहीं किया।

राजस्थानी लोक कथाओं एवं कहावतों का अद्भुत संकलन करने वाले पद्मश्री विजयदान देथा, जिनको चाहने वाले लाखों पाठक प्यार से 'बिज्जी' कहते हैं, आज (10 नवम्बर) उनकी पुण्यतिथि है। उनकी कर्मस्थली, उनका पैतृक गांव बोरुंदा (जोधपुर) रहा। इस छोटे से गांव में बैठकर पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हो उठे राजस्थानी लोक संस्कृति की प्रमुख संरक्षक संस्था रूपायन संस्थान के सचिव रहे 'बिज्जी' का जन्म 1 सितंबर 1926 को हुआ था। प्रारम्भ में 1953 से 1955 तक बिज्जी ने हिन्दी मासिक 'प्रेरणा' का सम्पादन किया। बाद में हिन्दी त्रैमासिक 'रूपम', राजस्थानी शोध पत्रिका 'परम्परा', 'लोकगीत', 'गोरा हट जा', राजस्थान के प्रचलित प्रेमाख्यान का विवेचन, जैठवै रा सोहठा और कोमल कोठारी के साथ संयुक्त रूप से वाणी और लोक संस्कृति का सम्पादन किया।

विजयदान देथा की लिखी कहानियों पर दो दर्जन से ज़्यादा फ़िल्में बन चुकी हैं, जिनमें मणि कौल द्वारा निर्देशित 'दुविधा' पर अनेक राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं। इसके अलावा वर्ष 1986 में उनकी कथा पर चर्चित फ़िल्म निर्माता-निर्देशक प्रकाश झा द्वारा निर्देशित फिल्म 'परिणीति' भी काफ़ी लोकप्रिय रही। राजस्थान साहित्य अकादमी ने उन्हें विशिष्ट साहित्यकार के रूप में सम्मानित किया। 'दुविधा' पर आधारित हिंदी फिल्म 'पहेली' में अभिनेता शाहरुख खान और रानी मुखर्जी मुख्य भूमिकाओं में हैं। यह उनकी किसी रचना पर बनी अंतिम फिल्म थी। रंगकर्मी हबीब तनवीर ने विजयदान देथा की लोकप्रिय कहानी 'चरणदास चोर' को नाटक का स्वरूप प्रदान किया था। बाद में श्याम बेनेगल ने इस पर एक फिल्म भी बनाई।

वर्ष 2007 में पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित विजयदान देथा को 2011 के साहित्य नोबेल पुरस्कार के लिए भी नामांकित किया गया था, हालांकि बाद में यह अवॉर्ड टॉमस ट्रांसट्रॉमर को दे दिया गया। इसके अतिरिक्त उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार, मरूधरा पुरस्कार तथा भारतीय भाषा परिषद पुरस्कार भी प्रदान किए गए। आज से पांच साल पहले 10 नवंबर, 2013 को दिल का दौरा पड़ने से बोरुंदा गांव में ही 'बिज्जी' का निधन हो गया था।

'बिज्जी' ने राजस्थान की लोक कथाओं को पहचान और आधुनिक स्वरूप प्रदान करने में अहम भूमिका निभाई। उनकी कहानियों में एक तरफ लोक का जादुई आलोक है तो दूसरी तरफ सहज चिंतन और गहरे सामाजिक सरोकारों से ओतप्रोत एक सजग रचनाकार का कलात्मक एवं वैचारिक स्पर्श। राजस्थानी भाषा में आठ सौ से अधिक लघुकथाएं लिखने वाले विजयदान देथा की कृतियों का हिंदी, अंग्रेज़ी समेत विभिन्न भाषाओं में अनुवाद हुआ है। उन्होंने कविताएँ भी लिखीं और उपन्यास भी। वे कलात्मक दृष्टि से उतने सफल नहीं नहीं हो सके। संभवतः उनकी रचनात्मक क्षमता खिल पाई लोक कथाओं के साथ उनके अपने काम में।

विजयदान देथा ने रंगमंच और सिनेमा को अपनी ओर खींचा। एक अच्छी ख़ासी आबादी है, जो उन्हें 'चरणदास चोर' के माध्यम से ही जानती है। राजस्थान की रंग रंगीली लोक संस्कृति को आधुनिक कलेवर में पेश करने वाले, लोककथाओं के अनूठे चितेरे विजयदान देथा ताउम्र राजस्थानी में लिखते रहे और लिखने के सिवा कोई और कोई काम नहीं किया। बने बनाए सांचों को तोड़ने वाले देथा ने कहानी सुनाने की राजस्थान की समृद्ध परंपरा से अपनी शैली का तालमेल किया। चतुर गड़ेरियों, मूर्ख राजाओं, चालाक भूतों और समझदार राजकुमारियों की जुबानी विजयदान देथा ने जो कहानियां बुनीं, उन्होंने उनके शब्दों को जीवंत कर दिया।

राजस्थान की लोककथाओं को मौजूदा समाज, राजनीति और बदलाव के औजारों से लैस कर उन्होंने कथाओं की ऐसी फुलवारी रची है, जिसकी सुगंध दूर-दूर तक महसूस की जा सकती है। दरअसल वे एक जादुई कथाकार थे। अपने ढंग के अकेले ऐसे कथाकार, जिन्होंने लोक साहित्य और आधुनिक साहित्य के बीच एक बहुत ही मज़बूत पुल बनाया। उन्होंने राजस्थान की विलुप्त होती लोक गाथाओं की ऐसी पुनर्रचना की, जो अन्य किसी के लिए लगभग असंभव मानी जाती है। सही मायनों में वे राजस्थानी भाषा के भारतेंदु हरिश्चंद्र थे, जिन्होंने उस अन्यतम भाषा में आधुनिक गद्य और समकालीन चेतना की नींव डाली। अपने लेखन के बारे में उनका कहना था- 'अपच उच्छिष्ट का वमन करने में मुझे कोई सार नज़र नहीं आता। आकाशगंगा से कोई अजूबा खोजने की बजाय पाँवों के नीचे की धरती से कुछ कण बटोरना ज्यादा महत्त्वपूर्ण लगता है अन्यथा इन कहानियों को गढ़ने वाले लेखक की कहानी तो अनकही रह जाएगी।'

विजयदान देथा की कहानियाँ पढ़कर विख्यात फिल्मकार मणि कौल इतने अभिभूत हुए कि उन्होंने तत्काल उन्हें लिखा- 'तुम तो छुपे हुए ही ठीक हो। ...तुम्हारी कहानियाँ शहरी जानवरों तक पहुँच गयीं तो वे कुत्तों की तरह उन पर टूट पड़ेंगे। ...गिद्ध हैं नोच खाएँगे। तुम्हारी नम्रता है कि तुमने अपने रत्नों को गाँव की झीनी धूल से ढँक रखा है।' हुआ भी यही, अपनी ही एक कहानी के दलित पात्र की तरह- जिसने जब देखा कि उसके द्वारा उपजाये खीरे में बीज की जगह 'कंकड़-पत्थर' भरे हैं तो उसने उन्हें घर के एक कोने में फेंक दिया, किन्तु बाद में एक व्यापारी की निगाह उन पर पड़ी तो उसकी आँखें चौंधियाँ गयीं, क्योंकि वे कंकड़-पत्थर नहीं हीरे थे। उनकी कहानियाँ अनूदित होकर जब हिन्दी में आयीं तो पाठकों की आँखें चौंधियाँ गयीं। चार साल की उम्र में पिता को खो देने वाले बिज्जी ने न कभी अपना गांव छोड़ा,न अपनी भाषा।

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