स्त्री-पीड़ा के अमर चितेरे कवि देवताले नहीं रहे

By जय प्रकाश जय
August 15, 2017, Updated on : Thu Sep 05 2019 07:16:30 GMT+0000
स्त्री-पीड़ा के अमर चितेरे कवि देवताले नहीं रहे
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पंद्रह अगस्त 2017 की सुबह की यह सबसे दुखद सूचना हो सकती है कि हमारे समय के महत्वपूर्ण कवि चंद्रकांत देवताले (81) नहीं रहे। 14 अगस्त की देर रात दिल्ली के एक निजी अस्पताल में उनका इंतकाल हो गया। वह एक महीने से यहां भर्ती थे। मेरे लिए व्यक्तिगत रूप से यह अनहोनी और भी दुखद इसलिए भी है कि उनसे दो माह पूर्व एक फोन वार्ता में मुलाकात का समय सुनिश्चित होना था। उसके बाद ही वह काफी अस्वस्थ हो चले थे। उस वक्त उन्होंने अपनी सद्यः प्रकाशित पुस्तक पढ़ने का सुझाव देते हुए कहा था- आओ मिलो, तुमसे खूब बातें करने का मन हो रहा है। राजकमल से सद्यः प्रकाशित मेरी पुस्तक पढ़ो।

डॉ. चंद्रकांत देवताले, फोटो साभार: सोशल मीडिया

डॉ. चंद्रकांत देवताले, फोटो साभार: सोशल मीडिया


चन्द्रकान्त देवताले हिन्दी के उन वरिष्ठ कवियों में अग्रणी रहे हैं, जिन्होंने अपनी कविता में भारतीय स्त्री के विविध रूपों, दुखों और संघर्षों को सर्वाधिक पहचाना है।

विख्यात कवि विष्णु खरे का यह कथन ' चन्द्रकान्त देवताले ने स्त्रियों को लेकर हिन्दी में शायद सबसे ज्यादा और सबसे अच्छी कविताएँ लिखी हैं' वाजिब ही है। दिल्ली के निजी अस्पताल में भर्ती होने से पहले वह उज्जैन (मध्य प्रदेश) में रह रहे थे। कुछ ही माह पूर्व उनकी पत्नी कमल देवताले का निधन हुआ था।

चंद्रकांत देवताले ने अपने समय की लड़कियों, स्त्रियों को केंद्र में रखकर कई श्रेष्ठ रचनाएं की हैं। उनमें एक कविता 'बालम ककड़ी बेचने वाली लड़कियाँ' को तो हिंदी साहित्य जगत में अपार प्रसिद्धि मिली। बालम ककड़ी बेचने वाली लड़कियों को प्रतीक बनाते हुए वह देश के एक बड़े वर्ग के दुखों की हजार तहों तक जाते हैं और लगता है, तब हमारे सामने, दिल-दिमाग में हमारे आसपास का खुरदरा, दहकता सच जोर-जोर से धधक उठता है, अपनी दानवी जिह्वाओं से हमारे समूचे अस्तित्व को, मनुष्यता पर बरसते तेजाब को और अधिक लहका देता है। कैसी हैं बालम कंकड़ी बेचने वाली लड़कियां- 'कोई लय नहीं थिरकती उनके होंठों पर, नहीं चमकती आंखों में ज़रा-सी भी कोई चीज़, गठरी-सी बनी बैठी हैं सटकर लड़कियाँ सात सयानी और कच्ची उमर की, फैलाकर चीथड़े पर अपने-अपने आगे सैलाना वाली मशहूर बालम ककड़ियों की ढीग, ''सैलाना की बालम ककड़ियाँ केसरिया और खट्टी-मीठी नरम''- जैसा कुछ नहीं कहती, फ़क़त भयभीत चिड़ियों-सी देखती रहती हैं वे लड़कियाँ सात, बड़ी फ़जर से आकर बैठ गई हैं पत्थर के घोड़े के पास, बैठी होंगी डाट की पुलिया के पीछे....।'

शिरीष मौर्य के शब्दों में- चन्द्रकान्त देवताले हिन्दी के उन वरिष्ठ कवियों में अग्रणी रहे हैं, जिन्होंने अपनी कविता में भारतीय स्त्री के विविध रूपों, दुखों और संघर्षों को सर्वाधिक पहचाना है। उनके बारे में विख्यात कवि विष्णु खरे का यह कथन 'चन्द्रकान्त देवताले ने स्त्रियों को लेकर हिन्दी में शायद सबसे ज्यादा और सबसे अच्छी कविताएँ लिखी हैं' वाजिब ही है। दिल्ली के निजी अस्पताल में भर्ती होने से पहले वह उज्जैन (मध्य प्रदेश) में रह रहे थे। कुछ ही माह पूर्व उनकी पत्नी कमल देवताले का निधन हुआ था। आइए, पढ़ते हैं, उनकी स्मृतियों को समर्पित 'औरत' शीर्षक उनकी एक महत्वपूर्ण रचना-

वह औरत आकाश और पृथ्वी के बीच

कब से कपड़े पछीट रही है

पछीट रही है शताब्दियों से

धूप के तार पर सुखा रही है

वह औरत

आकाश और धूप और हवा से वंचित घुप्प गुफा में

कितना आटा गूँथ रही है?

गूँथ रही है मनों सेर आटा

असंख्य रोटियाँ सूरज की पीठ पर पका रही है

एक औरत दिशाओं के सूप में खेतों को फटक रही है

एक औरत वक्त की नदी में दोपहर के पत्थर से

शताब्दियाँ हो गई, एड़ी घिस रही है

एक औरत अनन्त पृथ्वी को अपने स्तनों में समेटे

दूध के झरने बहा रही है

एक औरत अपने सिर पर घास का गट्ठर रखे कब से

धरती को नापती ही जा रही है

एक औरत अंधेरे में खर्राटे भरते हुए आदमी के पास

निर्वसन जागती शताब्दियों से सोई है

एक औरत का धड़ भीड़ में भटक रहा है

उसके हाथ अपना चेहरा ढूँढ रहे हैं

उसके पाँव जाने कब से सबसे अपना पता पूछ रहे हैं।

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उत्तर आधुनिकता को भारतीय साहित्यिक सिद्धांत के रूप में न मानने वालों को भी यह स्वीकार करना होगा कि देवताले की कविता में समकालीन समय की सभी प्रवृत्तियाँ मिलती हैं।

डॉ. चंद्रकांत देवताले जन्म 1936 में गाँव जौलखेड़ा, बैतूल (मध्य प्रदेश) में हुआ था। उनकी उच्च शिक्षा इंदौर से हुई तथा पी-एच.डी. सागर विश्वविद्यालय, सागर से। साठोत्तरी हिंदी कविता के प्रमुख हस्ताक्षर देवताले उच्च शिक्षा में अध्यापन से संबद्ध रहे। देवताले की प्रमुख कृतियाँ हैं- हड्डियों में छिपा ज्वर, दीवारों पर खून से, लकड़बग्घा हँस रहा है, रोशनी के मैदान की तरफ़, भूखंड तप रहा है, हर चीज़ आग में बताई गई थी, पत्थर की बैंच, इतनी पत्थर रोशनी, उजाड़ में संग्रहालय आदि। उनकी कविता में समय और सन्दर्भ के साथ ताल्लुकात रखने वाली सभी सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक प्रवृत्तियाँ समा गई हैं। उनकी कविता में समय के सरोकार हैं, समाज के सरोकार हैं, आधुनिकता के आगामी वर्षों की सभी सर्जनात्मक प्रवृत्तियां उनमें हैं। 

उत्तर आधुनिकता को भारतीय साहित्यिक सिद्धांत के रूप में न मानने वालों को भी यह स्वीकार करना होगा कि देवताले की कविता में समकालीन समय की सभी प्रवृत्तियाँ मिलती हैं। सैद्धांतिक दृष्टि से कोई उत्तरआधुनिकता को माने-न-माने, उनकी कविताएँ आधुनिक जागरण के परवर्ती विकास के रूप में रूपायित सामाजिक सांस्कृतिक आयामों को अभिहित करने वाली हैं। देवताले को उनकी रचनाओं के लिए अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया, जिनमें प्रमुख हैं- माखन लाल चतुर्वेदी पुरस्कार, मध्य प्रदेश शासन का शिखर सम्मान, साहित्य अकादमी सम्मान। उनकी कविताओं के अनुवाद प्रायः सभी भारतीय भाषाओं में और कई विदेशी भाषाओं में हुए हैं। देवताले की कविता की जड़ें गाँव-कस्बों और निम्न मध्यवर्ग के जीवन में रही हैं।

देवताले लिखते हैं कि 'माँ के लिए सम्भव नहीं होगी मुझसे कविता। अमर चिऊँटियों का एक दस्ता मेरे मस्तिष्क में रेंगता रहता है। माँ वहाँ हर रोज़ चुटकी-दो-चुटकी आटा डाल देती है, मैं जब भी सोचना शुरू करता हूँ, यह किस तरह होता होगा। घट्टी पीसने की आवाज़ मुझे घेरने लगती है और मैं बैठे-बैठे दूसरी दुनिया में ऊँघने लगता हूँ।' देवताले ने वैसे तो मां पर कई कविताएं लिखीं, लेकिन उनमें एक रचना की कुछ पंक्तियां बार-बार आज मन पर गूंज रही हैं- 'वे दिन बहुत दूर हो गए हैं, जब माँ के बिना परसे पेट भरता ही नहीं था, वे दिन अथाह कुँए में छूट कर गिरी, पीतल की चमकदार बाल्टी की तरह, अभी भी दबे हैं शायद कहीं गहरे, फिर वो दिन आए जब माँ की मौजूदगी में, कौर निगलना तक दुश्वार होने लगा था।'

लड़कियों को प्रतीक बनाते हुए उन्होंने स्त्री-पीड़ा के कई अविस्मरणीय चित्र उकेरे। उनकी एक कविता है- 'दो लड़कियों का पिता होने से'। देखिए, कि इस कविता में वह किस तरह पिता होने का अपार अवसाद रेखांकित करते हैं-

पपीते के पेड़ की तरह मेरी पत्नी

मैं पिता हूँ

दो चिड़ियाओं का जो चोंच में धान के कनके दबाए

पपीते की गोद में बैठी हैं

सिर्फ़ बेटियों का पिता होने भर से ही

कितनी हया भर जाती है

शब्दों में

मेरे देश में होता तो है ऐसा

कि फिर धरती को बाँचती हैं

पिता की कवि-आंखें.......

बेटियों को गुड़ियों की तरह गोद में खिलाते हैं हाथ

बेटियों का भविष्य सोच बादलों से भर जाता है

कवि का हृदय

एक सुबह पहाड़-सी दिखती हैं बेटियाँ

कलेजा कवि का चट्टान-सा होकर भी थर्राता है

पत्तियों की तरह

और अचानक डर जाता है कवि चिड़ियाओं से

चाहते हुए उन्हें इतना

करते हुए बेहद प्यार।

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