रोज ऑफ़िस नहीं लौटना चाहते Gen Z और मिलेनिअल्स

रोज ऑफ़िस नहीं लौटना चाहते Gen Z और मिलेनिअल्स

Thursday May 26, 2022,

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पिछले दो सालों के कोविड के अनुभव ने ज़िंदगी को लेकर हमारी सोच और प्राथमिकताओ को बदला है. या कम से कम उन पर दोबारा सोचने का मौका दिया है. दुनिया की जानी मानी ऑडिट और कंसलटिंग फार्म Deloitte ने Gen Z और मिलेनिअल्स को लेकर एक सर्वे जारी किया है जिसके मुताबिक़  पर्यावरण और वर्क/लाइफ बैलेंस Gen Z और मिलेनिअल्स की पहली प्राथमिकता बनकर उभरे हैं. इस सर्वे में 95% Gen Z और मिलेनिअल्स [Millennials] ने पर्यावरण को लेकर अपनी चिंता जाहिर की है. उन्हें बदलाव चाहिए. इस सर्वे के मुताबिक, 68% Gen Z और 72% मिलेनिअल्स ने अपने ऑफीसेज या वर्क-स्पसेज को पर्यावरण को लेकर सजग बनाने की सफलतापूर्ण कोशिश भी की है.

कौन हैं Gen Z और मिलेनिअल्स?

Gen Z

समाज में बदलाव की उनकी चाह पर्यावरण तक ही सीमित नहीं है; ऑफिस के एनवायरनमेंट, ऑफिस के वर्किंग आवर्स से लेकर काम और अपनी ज़िन्दगी के बीच में एक बैलेंस के लिए वो बदलाव चाहते हैं. सर्वे को देखकर यह लगता है कि अगर Gen Z या मिलेनिअल्स के हाथ में बागडोर हो तो वह सबसे पहले अपने वर्किंग आवर्स को फ्लेक्सिबल करेंगे जो उन्हें  अपनी भाग-दौड़ की ज़िन्दगी से थोड़ी राहत देते हुए अपनी मनपसंद चीज़ करने की रियायत दे सके. इसीलिए ऑफिसेज में हाइब्रिड मोड को वापस लाने की इच्छा रखने वालों की संख्या सर्वे में अधिक थी क्यूंकि यह हाइब्रिड मोड उनके समय और पैसों दोनों की बचत करता है. 


एक नयी बात जो सर्वे से निकल कर आई है वह यह है कि दो तिहाई  से ज्यादा Gen Z और 80% मिलेनिअल्स ने बताया कि वह अपने रिटायरमेंट को लेकर निश्चिन्त हैं, फायनान्शिअल इनसेक्यूरिटी इंडिया के Gen Z और मिलेनिअल्स में अन्य देशों के मुकाबले कम है. इस सर्वे के मुताबिक. इसकी एक वजह उनकी एक साथ दो काम करने की क्षमता भी है. सर्वे में 62% Gen Z और 51% मिलेनिअल्स ने बताया कि वह अपने प्राइमरी जॉब के साथ साथ एडिशनल जॉब भी करते हैं. हाइब्रिड मोड से उन्हें एडिशनल जॉब करने की फ्लेक्सिबिलिटी मिलती है, सर्वे में  66% Gen Z और 67% मिलेनिअल्स ने हाइब्रिड मोड के पक्ष में अपना बहुमत दिया है.


वर्क-लाइफ बैलेंस के अलावा सिंगल-यूज प्लास्टिक का बहिष्कार, अपने खान-पान की आदतों या च्वाइसेस को लेकर सजगता, नए नए स्किल्स को सिखने की लगन, अपने निजी ज़िन्दगी में अपने मनपसंद काम करने की स्वतंत्रता, अपने दिमाग और ज़हन के स्वास्थ्य की चिंता, वर्क-प्लेस में सेक्सुअल हरासमेंट की पालिसी को लेकर संवेदनशीलता इत्यादि आज के इंडिया के Gen Z और मिलेनिअल्स के मुद्दे बन कर उभरे हैं.

इसके अलावा दूसरे महत्त्वपूर्ण मुद्दों  जैसे बेरोज़गारी, स्वास्थ्य, कास्ट ऑफ़ लिविंग को लेकर Gen Z और मिलेनिअल्स की क्या राय है यह हम नीचे देख सकते हैं:

Graph

इस सर्वे को पढ़कर 100 साल पहले की स्लोगन "8 घंटे काम, 8 घंटे आराम, और 8 घंटे हम जो करना चाहते हैं" की याद ताज़ा हो जाती है जो अमेरिका के मिनेसोटा के सेंट पॉल यूनियन एडवोकेट द्वारा लम्बे वर्किंग आवर्स के खिलाफ चलायी गयी मुहीम की एक प्रमुख मांग थी. इस मांग को लेकर ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, मेक्सिको और कई अन्य देशों में में भी मुहीम चलायी गयी थी. इसी का असर था कि साल 1914 में फोर्ड कंपनी 8 घंटे काम करने की पालिसी लागू करने वाली पहली कंपनी बनी. यही स्लोगन आगे चलकर ‘मे  डे’ (May Day) का स्लोगन भी बना था. 

सेंट पॉल यूनियन एडवोकेट न्युजपेपर में छपा पोस्टर.

क्या मिलेनिअल्स और Gen Z में वर्क-लाइफ़ बेलेंस की खोज उसी 8 घंटे के काम वाले दिन की तलाश है जो आजकी दुनिया में फिर से ख़त्म हो गया है, ऐसा पूर्णतः सत्य नहीं है. क्यूंकि सर्वे की रिपोर्ट को पढ़ते हुए एक-दो बातों पर ध्यान अटक जाता है क्यूंकि ये बातें आपस में विरोधाभासी प्रतीत होती हैं. जैसे, Gen Z और मिलेनिअल्स जहाँ अपने कास्ट ऑफ़ लिविंग से आहत दीखते हैं वहीँ सस्टेनेबल लिविंग के प्रति जागरूक और सजग होते हुए उस तरह की जीवन शैली मेंटेंन करने में अपनी सैलरी का एक अहम् हिस्सा खर्च देते हैं. या यह कि अपने वर्किंग-आवर्स को फ्लेक्सिबल को करने की ख्वाहिश के साथ ही साथ वह एडिशनल जॉब करने में भी भरोसा रखते हैं. दूसरी जॉब, पार्ट-टाइम ही सही, पर यह खुद के लिए बचाए गए वक़्त से कटौती करने के सामान है जो फ्लेक्सिबल आवर्स के पूरे उद्देश्य को ही नष्ट कर देना है.


पर शायद Gen Z और मिलेनिअल्स इन विरोधाभासों का भी एक नाम है.