17,500 किसान, 36,000 एकड़ में खेती और 355 करोड़ रुपये का रेवेन्यू, कैसे Gourmet Popcornica ने भारत में खड़ा किया पॉपकॉर्न इकोसिस्टम? जानिए
Gourmet Popcornica ने भारत में पॉपकॉर्न मक्का की पूरी वैल्यू चेन तैयार की है. 17,500 से अधिक किसानों और 36,000 एकड़ खेती के साथ कंपनी ने आयात निर्भरता घटाने की कोशिश की है. जानिए कैसे पट्टाभि रामा राव ने खेती, रिसर्च और फूड प्रोसेसिंग को जोड़कर 355 करोड़ रुपये रेवेन्यू वाला कारोबार खड़ा किया.
सिनेमा हॉल में फिल्म शुरू होने से पहले पॉपकॉर्न का एक बड़ा टब लेना आज आम बात है. लेकिन कुछ साल पहले तक भारत में उस पॉपकॉर्न के पीछे की कहानी शायद ही कोई जानता था. खासकर उस मक्के की, जिससे पॉपकॉर्न बनता है. भारत में पॉपकॉर्न की मांग लगातार बढ़ रही थी, लेकिन अच्छी क्वालिटी के पॉपकॉर्न मक्का के लिए देश को आयात पर काफी निर्भर रहना पड़ता था.
यही सवाल पट्टाभि रामा राव (Pattabhi Rama Rao) के मन में भी आया. आखिर लाखों किसानों वाले देश को पॉपकॉर्न मक्का के लिए दूसरे देशों पर निर्भर क्यों रहना चाहिए? इसी सवाल ने 2014 में Gourmet Popcornica की नींव रखी. कंपनी ने केवल पॉपकॉर्न बेचने पर ध्यान नहीं दिया. उसने बीज से लेकर किसान, खेती, प्रोसेसिंग, स्टोरेज और बाजार तक एक पूरी वैल्यू चेन तैयार करने की कोशिश की.
आज कंपनी 9 राज्यों में 17,500 से अधिक किसानों के साथ काम करती है और 36,000 एकड़ से अधिक जमीन पर पॉपकॉर्न मक्का की खेती को सपोर्ट करती है.
एक दशक पहले भारत प्रीमियम पॉपकॉर्न मक्का के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर था. अब तस्वीर बदल रही है. ICAR के अनुसार, देश में पॉपकॉर्न का घरेलू उत्पादन 2025-26 में करीब 90,000 टन तक पहुंच गया और इससे घरेलू मांग का लगभग 65-70% पूरा होने का अनुमान है. ICAR (Indian Council Of Agricultural Research) ने 2030 तक पॉपकॉर्न आयात पूरी तरह खत्म करने का लक्ष्य भी रखा है.
इसी बदलाव में निजी कंपनियों, रिसर्च संस्थानों और किसानों के बीच साझेदारी की भूमिका बढ़ी है. Gourmet Popcornica के मैनेजिंग डायरेक्टर पट्टाभि रामा राव की कहानी इसी बदलाव का एक उदाहरण है.
खेती से शुरू हुई कारोबारी सोच
पट्टाभि रामा राव का रिश्ता खेती से काफी पुराना है. उनका परिवार आंध्र प्रदेश के ईस्ट गोदावरी जिले के कपिलेश्वरपुरम मंडल से आता है. परिवार की कृषि परंपरा करीब 700 साल पुरानी है. बचपन से उन्होंने खेती और जमीन को करीब से देखा. हालांकि, उनका पेशेवर सफर फूड और हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री से शुरू हुआ.
SPI Cinemas में काम करते हुए उन्होंने ग्राहक की पसंद और मनोरंजन के साथ खाने के रिश्ते को समझा. यहीं पॉपकॉर्न ने उनका ध्यान खींचा. इसके बाद CookieMan में काम करने के दौरान उन्होंने प्रोडक्ट की गुणवत्ता, एक जैसी क्वालिटी बनाए रखने और ऑपरेशनल अनुशासन को करीब से समझा.
रामा राव के मुताबिक, इन दोनों अनुभवों ने उन्हें एक अहम बात सिखाई कि किसी भी सफल फूड बिजनेस के पीछे एक मजबूत सप्लाई चेन जरूरी होती है.
बीज से बाजार तक पूरी वैल्यू चेन
जब Gourmet Popcornica ने काम शुरू किया, तब भारत में प्रीमियम पॉपकॉर्न मक्का की उपलब्धता सीमित थी. कंपनी ने शुरुआत में अमेरिका की Preferred Popcorn के साथ काम किया. मकसद था अच्छी क्वालिटी का पॉपकॉर्न मक्का उपलब्ध कराना और साथ ही भारतीय परिस्थितियों के लिए उपयुक्त गैर आनुवंशिक रूप से संशोधित हाइब्रिड विकसित करना.
लेकिन जल्द ही साफ हो गया कि केवल बीज लाकर बेचने से समस्या हल नहीं होगी. किसानों को सही बीज चाहिए. खेती की तकनीक चाहिए. फसल खरीदने की गारंटी चाहिए. इसके बाद फसल को सही तरीके से स्टोर और प्रोसेस करने की व्यवस्था भी चाहिए.
कंपनी ने इसी सोच के साथ किसानों के साथ सीधे काम करना शुरू किया. उन्हें एग्रीनॉमी सपोर्ट, गुणवत्तापूर्ण बीज, तकनीकी सलाह और सुनिश्चित खरीद की सुविधा दी गई. इसके बाद फसल की सफाई, ग्रेडिंग, कंडीशनिंग, स्टोरेज और पैकेजिंग की व्यवस्था तैयार की गई.
YourStory से बात करते हुए रामा राव बताते हैं, “हमने शुरुआत में सिर्फ पॉपकॉर्न मक्का का उत्पादन बढ़ाने के बारे में नहीं सोचा. हमें पूरी वैल्यू चेन बनानी थी. बीज से लेकर किसान तक, फिर खेती से प्रोसेसिंग और बाजार तक हर कड़ी को मजबूत करना जरूरी था. अगर किसी एक हिस्से में कमी रह जाती, तो पूरी व्यवस्था कमजोर हो जाती. इसलिए हमने किसानों, रिसर्च संस्थानों, प्रोसेसिंग और बाजार को एक साथ जोड़ने पर ध्यान दिया.”
17,500 किसानों का तगड़ा नेटवर्क
आज Gourmet Popcornica का किसान नेटवर्क इसकी कहानी का एक अहम हिस्सा है. कंपनी 9 राज्यों में 17,500 से अधिक किसानों के साथ काम करती है. इनके जरिए 36,000 एकड़ से ज्यादा जमीन पर पॉपकॉर्न मक्का की खेती को सपोर्ट किया जा रहा है.
कंपनी के मुताबिक, किसानों को खेती से पहले तकनीकी सलाह और इनपुट दिए जाते हैं. फसल तैयार होने के बाद बाजार और खरीद की व्यवस्था भी उपलब्ध कराई जाती है. इससे किसानों को फसल बेचने की अनिश्चितता कम होती है. कई किसानों ने छोटे क्षेत्र से शुरुआत की और नियमित रिटर्न तथा बाजार मिलने के बाद अपना रकबा बढ़ाया.
इस सफर में रिसर्च संस्थानों की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है. Gourmet Popcornica ने ICAR IIMR के साथ मिलकर पॉपकॉर्न मक्का की नई किस्मों पर काम किया. इसी सहयोग से LPCH 3 जैसे स्वदेशी हाइब्रिड को बड़े स्तर पर अपनाने में मदद मिली. आगे भारतीय और अमेरिकी पॉपकॉर्न गुणों को मिलाकर नई हाइब्रिड किस्में भी विकसित की गईं.
रामा राव कहते हैं, “किसान हमारे कारोबार की नींव हैं. हमारा काम केवल उनसे फसल खरीदना नहीं है. हम उन्हें खेती से जुड़ी तकनीकी जानकारी, गुणवत्तापूर्ण बीज और बाजार उपलब्ध कराने की कोशिश करते हैं. ICAR IIMR जैसे संस्थानों के साथ सहयोग ने इस काम को और मजबूत किया है. रिसर्च, निजी क्षेत्र और किसानों की साझेदारी से ऐसी खेती तैयार की जा सकती है, जिसमें बेहतर उत्पादन के साथ किसान की आय और बाजार दोनों पर ध्यान दिया जाए.”
355 करोड़ रुपये का कारोबार
Gourmet Popcornica का कारोबार भी इस सफर के साथ बढ़ा है. कंपनी का रेवेन्यू वित्त वर्ष 24 में 309 करोड़ रुपये था. वित्त वर्ष 25 में यह बढ़कर 346 करोड़ रुपये हुआ. वित्त वर्ष 26 में कंपनी ने 355 करोड़ रुपये का रेवेन्यू दर्ज किया.
कंपनी की कमाई केवल एक स्रोत पर निर्भर नहीं है. इसमें पॉपकॉर्न मक्का की खेती और खरीद, कर्नेल प्रोसेसिंग, सिनेमा सप्लाई, फूड सर्विस पार्टनरशिप और रिटेल प्रोडक्ट शामिल हैं. कंपनी प्रीमियम रिटेल प्रोडक्ट रेंज Krug & Co भी चलाती है.
हालांकि, इस मुकाम तक पहुंचना आसान नहीं था. शुरुआत में सबसे बड़ी चुनौती यह साबित करना था कि प्रीमियम पॉपकॉर्न मक्का भारत में बड़े पैमाने पर उगाया जा सकता है. किसानों के बीच जागरूकता की कमी थी. पोस्ट हार्वेस्ट मैनेजमेंट भी चुनौती थी. पॉपकॉर्न मक्का के लिए नमी, स्टोरेज और प्रोसेसिंग का खास ध्यान रखना पड़ता है.
रामा राव कहते हैं, “जब हमने शुरुआत की, तब भारत में पॉपकॉर्न मक्का की खेती के बारे में स्थानीय अनुभव बहुत सीमित था. हमें ट्रायल करने पड़े. किसानों को समझाना पड़ा. बीज विकसित करने और पोस्ट हार्वेस्ट इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने में निवेश करना पड़ा. सबसे जरूरी था भरोसा बनाना. इसमें समय लगा. लेकिन जब किसानों को लगातार अच्छे परिणाम और बाजार मिलने लगे, तो यह भरोसा मजबूत होता गया. इसी भरोसे ने हमारे पूरे इकोसिस्टम को आगे बढ़ाने में मदद की.”
अब एक्सपोर्ट की तैयारी
Gourmet Popcornica की कहानी केवल एक फूड बिजनेस की कहानी नहीं है. यह उस बदलाव को भी दिखाती है, जिसमें भारत आयात पर निर्भर रहने के बजाय अपनी कृषि क्षमता के आधार पर एक नया बाजार तैयार कर सकता है.
कंपनी के अनुसार, जब उसने इस क्षेत्र में काम शुरू किया था, तब पॉपकॉर्न मक्का के लिए भारत आयात पर काफी निर्भर था. पिछले एक दशक में बीज विकास, किसान नेटवर्क, प्रोसेसिंग और बाजार के विस्तार के साथ घरेलू उत्पादन ने स्थिति बदली है. आज कंपनी का दावा है कि घरेलू उत्पादन देश की करीब 70 प्रतिशत मांग पूरी करता है.
अब कंपनी अगले तीन से पांच साल में खेती का रकबा बढ़ाने, ज्यादा किसानों को जोड़ने, प्रोसेसिंग क्षमता मजबूत करने और निर्यात बढ़ाने की तैयारी कर रही है. लक्ष्य दक्षिण पूर्व एशिया तक पहुंचना और अगले दो वर्षों में भारतीय पॉपकॉर्न मक्का का निर्यात शुरू करना है.
रामा राव के लिए यह सफर आखिरकार किसानों तक पहुंचने वाले मूल्य का सवाल है.
रामा राव बताते हैं, “ग्यारह साल पहले भारत में खाए जाने वाले हर पॉपकॉर्न के पीछे कमाई का एक हिस्सा अर्जेंटीना और ब्राजील के किसानों तक जाता था. हमारा प्रयास रहा है कि बेहतर क्वालिटी के इनपुट, मजबूत कृषि व्यवस्था और भरोसेमंद बाजार के जरिए उस मूल्य का बड़ा हिस्सा भारतीय किसानों तक पहुंचे. हमारा अगला लक्ष्य इस मॉडल को दक्षिण पूर्व एशिया तक ले जाना और आने वाले वर्षों में भारतीय पॉपकॉर्न मक्का को वैश्विक बाजार में पहुंचाना है.”
Gourmet Popcornica के सामने अब चुनौती सिर्फ कारोबार बढ़ाने की नहीं है. उसे यह साबित करना है कि भारत विशेष कृषि उत्पादों के लिए वैश्विक सप्लाई चेन का मजबूत हिस्सा बन सकता है.
पॉपकॉर्न देखने में भले ही एक छोटा स्नैक हो. लेकिन उसके पीछे बीज, किसान, रिसर्च, खेती, प्रोसेसिंग और बाजार की लंबी कहानी है. रामा राव की कोशिश इसी कहानी को भारत में लिखने की है. उनका मानना है कि कृषि में सफलता जल्दी नहीं मिलती. इसके लिए धैर्य और लंबी सोच चाहिए.
यही शायद इस सफर की सबसे बड़ी सीख भी है. किसी कृषि कारोबार को सिर्फ उत्पाद बेचकर बड़ा नहीं बनाया जा सकता. उसके पीछे किसानों का भरोसा, सही तकनीक और मजबूत बाजार भी चाहिए. Gourmet Popcornica ने इसी पूरी कड़ी को जोड़ने की कोशिश की है. अब देखना होगा कि भारतीय पॉपकॉर्न की यह कहानी आने वाले वर्षों में देश की सीमाओं से कितनी दूर तक जाती है.





