महंगे इलाज का दंश देख 1.5 लाख का कर्ज लेकर लॉन्च किया ऐप; आज 51 करोड़ की है कंपनी

By Vishal Jaiswal
October 14, 2022, Updated on : Wed Oct 26 2022 14:17:01 GMT+0000
महंगे इलाज का दंश देख 1.5 लाख का कर्ज लेकर लॉन्च किया ऐप; आज 51 करोड़ की है कंपनी
देवकर साहेब ने कहा, ''मैंने 1.50 लाख रुपया कर्ज लेकर 'श्री च्यवन आयुर्वेद' की शुरुआत की थी. आज मेरी कंपनी में करीब 100 लोग काम कर रहे हैं. दिवाली के बाद 50 और लोगों की हायरिंग की तैयारी है. मैंने अपने जीवनकाल में दो लाख लोगों को रोजगार देने की कसम खाई हुई है.''
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आक्सफैम इंटरनेशनल और डेवलपमेंट फाइनेंस इंटरनेशनल द्वारा तैयार सीआरआईआई रैंकिंग में हेल्थ सेक्टर में भारत पांचवां सबसे खराब स्थिति वाला देश है. हाल ही में आई इस रैंकिंग में भारत दो स्थान गिरकर 157वें पायदान पर आ गया.


भारत में सरकार के कुल खर्च में स्वास्थ्य पर खर्च की हिस्सेदारी मात्र 3.64 प्रतिशत है, जो ब्रिक्स देशों में सबसे कम है. चीन और रूस का स्वास्थ्य खर्च 10 प्रतिशत, ब्राजील का 7.7 प्रतिशत और दक्षिण अफ्रीका का 12.9 प्रतिशत है. यही कारण है कि कोविड-19 महामारी के दौरान देश की स्वास्थ्य व्यवस्था बुरी तरह से चरमरा गई थी.


देश की जर्जर स्वास्थ्य व्यवस्था का सबसे अधिक खामियाजा गरीब तबके के लोगों को भुगतना पड़ता है. सरकारी अस्पतालों में किसी बड़ी बीमारी के इलाज के लिए उन्हें महीनों और सालों इंतजार करना पड़ता है जबकि अस्पताल पहुंचने के बाद घंटों लाइनों में खड़े रहना पड़ता है. वहीं, प्राइवेट अस्पतालों में भारी फीस के कारण वे या तो जा नहीं पाते हैं या वहां इलाज कराने पर उन्हें गहने, खेत और घर तक बेचना पड़ जाता है.


इन्हीं सब समस्याओं को देखते हुए 15 साल की उम्र में सन्यास ले चुके, छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर स्थित सोनपैरी के रहने वाले देवकर साहेब ने Emergency Health Offer (EHO) ऐप बनाया है. इस ऐप से छत्तीसगढ़ के 100 प्राइवेट अस्पताल जुड़े हुए हैं. यह ऐप टेली कंसल्टेशन, प्राइवेट अस्पताल में डायरेक्ट अपॉइंटमेंट, अफोर्डेबल प्राइस पर सर्जरी बुकिंग के साथ दवाइयां भी मुहैया कराता है.

ऐसे हुई शुरुआत

32 वर्षीय देवकर साहेब सत्संग कार्यक्रमों के लिए छत्तीसगढ़ के साथ-साथ उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, झारखंड जाते थे. इस दौरान उन्होंने देखा कि समाज में आज भी इतनी आर्थिक असमानता है कि अधिकतर लोग अच्छा इलाज अफोर्ड नहीं कर सकते हैं.


साल 2015 में उनकी पहचान के एक शख्स की प्राइवेट अस्पताल में इलाज कराने में करीब लाख का खर्च आ गया और इसमें उनकी करीब 1.5 एकड़ की जमीन बिक गई. ऐसे कई और मामले मेरे सामने आए. यह सब देखने के बाद उन्होंने हेल्थकेयर पर काम करने का फैसला किया है.


YourStory Hindi से बात करते हुए देवकर ने कहा कि अधिकतर लोग 5-6 हजार मासिक कमा पाते हैं. ऐसे में अगर उनके परिवार में कोई ऑपरेशन या हेल्थ से जुड़ी बड़ी समस्या आ गई तो वे उसका खर्च नहीं उठा पाते हैं. मैंने धीरे-धीरे चीजों को समझना शुरू किया कि क्या-क्या समस्याएं हैं? इन्हें कैसे सही किया जा सकता है. मुझे पता चला कि अस्पतालों की भारी फीस के पीछे उनके विज्ञापन आदि में लगने वाले खर्च की भी बड़ी भूमिका होती है.

2016 में की 'परोपकार कार्ड' की शुरुआत

देवकर साहेब ने बताया, ‘’इसके बाद मैंने 2016 के आखिर में परोपकार कार्ड बनाया और पूरे छत्तीसगढ़ के 70 अस्पतालों को जोड़ा. इसमें बहुत बड़े अस्पताल तो नहीं लेकिन वहां के सामान्य अस्पताल शामिल थे. हर परोपकार कार्ड 500 रुपये का था. वह एक साल के लिए था. मैंने केवल 6 महीने में 11 हजार परिवारों तक अपना परोपकार कार्ड पहुंचाया.’’


देवकर के परोपकार कार्ड धारकों को उनके साथ जुड़ने अस्पतालों में 30 से 50 फीसदी तक छूट मिलती थी. उन्हें कई तरह से ऑपरेशनों में छूट भी मिलती थी. सरकारी अस्पतालों में लगभग सबकुछ फ्री होता है इसलिए उन्होंने प्राइवेट अस्पतालों के साथ टाइअप किया था.

वह बताते हैं कि लोगों के लिए 500 रुपये देना इसलिए मुश्किल नहीं था क्योंकि उन्हें हमारे टाइअप वाले अस्पतालों में कोई ओपीडी चार्ज नहीं देना था. मेरा समझौता था कि उनका विज्ञापन मैं देखूंगा और उन्हें कोई पीआरओ भी रखने की जरूरत नहीं होगी.


देवकर के साथ प्राइवेट अस्पताल इसलिए जुड़ने के लिए तैयार हुए क्योंकि उनके 4 यूट्यूब चैनलों पर 2016 में 3-4 लाख सब्सक्राइबर्स थे. अब इन सभी यूट्यब चैनलों पर कुल मिलाकर 20 लाख सब्सक्राइबर्स हैं. वहीं, फेसबुक पर अभी सभी चैनलों पर मिलाकर 4-5 लाख सब्सक्राइबर्स हैं. एक चैनल स्वामीजी के नाम से है, दूसरा उनके गुरु असंगदेव के नाम से है, तीसरा देवकर साहेब के ही नाम से है और चौथा सुखद सत्संग के नाम से है.

'परोपकार कार्ड' बंद कर, हर्बल प्रोडक्ट्स पर रिसर्च शुरू की

हालांकि, इसी दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार आयुष्मान कार्ड लेकर आई. आयुष्मान भारत योजना की शुरुआत केंद्र सरकार द्वारा 2017 में की गई थी. इस योजना का मकसद लाभ लेने वालों को 5 लाख रु. तक का हेल्थ इंश्योरेंस कवर प्रदान करना है. जिसके पास आयुष्मान भारत कार्ड है वह इसका इस्तेमाल कर के किसी भी सरकारी या निजी अस्पताल में अपना इलाज करवा सकते हैं.


इसके बाद देवकर को लगा कि वह जिस समस्या का समाधान करना चाहते थे, उसका समाधान तो निकल जाएगा. इसलिए उन्होंने एक साल पूरा होते ही परोपकार कार्ड को वहीं पर रोक दिया. हालांकि, समाज के गरीब तबके के लोगों के लिए अफोर्डेबल हेल्थकेयर मुहैया कराने के लिए उन्होंने दूसरी दिशा में सोचना कर दिया. उन्होंने हर्बल प्रोडक्ट्स के ऊपर रिसर्च करना शुरू कर दिया.

2018 में 'श्री च्यवन आयुर्वेद' की शुरुआत की

देवकर ने कहा, ‘’मैं बहुत सारे आयुर्वेदाचार्य, डॉक्टर और फैक्टरियों से भी मिला. मुझे समझ में आया कि हर्बल में भी ऐसे बहुत से प्रोडक्ट्स हैं, जिनके इस्तेमाल से कई ऐसी बीमारियां सही की जा सकती हैं, जिनमें सर्जरी की जरूरत होती है या उनमें 50 हजार रुपये तक का खर्च आ सकता है.’’


इसके बाद देवकर सूरत की एक 60 साल की वैद्य साध्वी से मिले और उन्होंने इन हर्बल प्रोडक्ट्स के निर्माण में मदद की. वहीं, MBBS और MS डॉक्टर मेघजी भाई घुघारी मिले, जिन्होंने इन्हें आधुनिक तरीके से निर्माण की देखरेख करने, ड्रग लाइसेंस लेने आदि में मदद की.


देवकर ने बताया कि मैंने दोनों लोगों के साथ टाइअप किया और मैन्यूफैक्चरिंग शुरू कर दिया. इसके लिए मैंने 13 जून, 2018 में अपना ब्रांड 'श्री च्यवन आयुर्वेद' नाम का ब्रांड बनाया. इसके माध्यम से हम आज तक 50 हजार लोगों तक पहुंच चुके हैं. हम पाइल्स, ज्वाइंट पेन, सफेद दाग और पथरी जैसे रोगों की बहुत अच्छी मेडिसिन बनाते हैं. इसके अलावा कब्ज या कांस्टिपेशन जैसे बहुत ही छोटे-छोटे रोगों के लिए भी प्रोडक्ट्स बनाते हैं. इन प्रोडक्ट्स का कोई साइड इफेक्ट नहीं होता है और ये बीमारियां सही भी हो जाती हैं.

पिछले साल की EHO ऐप की शुरुआत

एक साल से अधिक समय तक अपनी वेबसाइट के माध्यम से हर्बल प्रोडक्ट्स बेचने के बाद देवकर साहेब ने पिछले साल अपने हर्बल प्रोडक्ट्स और परोपकार कार्ड के माध्यम से प्राइवेट अस्पतालों में सुविधाजनक और अफोर्डेबल हेल्थकेयर मुहैया कराने के आइडिया को एक साथ पेश करने का फैसला किया. इसके लिए उन्होंने पिछले साल दिसंबर में इहो हेल्थकेयर ऑफर (EHO) नाम के मोबाइल ऐप की शुरुआत की. EHO Health Care ऐप के साथ अभी 100 प्राइवेट अस्पताल जुड़े हैं.


उन्होंने बताया कि अब हम अपने हर्बल प्रोडक्ट्स को इहो हेल्थकेयर ऑफर (EHO) नाम के मोबाइल ऐप के माध्यम से भी लोगों को उपलब्ध करा रहे हैं. इस पर अब तक 1.5 लाख से अधिक यूजर्स आ चुके हैं. इसमें हम प्रोडक्ट्स उपलब्ध कराने के साथ हम 100-150 रुपये की मामूली कीमत पर टेली कंसल्टेशन भी मुहैया कराते हैं, क्योंकि डॉक्टर के पास जाने पर आपको कम से कम 500 रुपये का कंसल्टेशन फीस देनी पड़ती है. वहां से लोगों को दवाइयां भी मिल जाती हैं और सर्जरी कराने की स्थिति में अफोर्डेबल प्राइस पर अस्पताल में बुकिंग भी हो जाती है.


देवकर ने कहा, ''हालांकि, हमें पता है कि आयुर्वेदिक और हर्बल प्रोडक्ट्स से सभी बीमारियों का इलाज नहीं किया जा सकता है. उदाहरण के तौर पर हाइड्रोसिल की समस्या का समाधान आयुर्वेद से नहीं किया जा सकता है. ऐसी समस्याओं के लिए सर्जरी कराना अनिवार्य हो जाता है. ऐसे में हमारा इहो ऐप काफी मददगार होता है. उसके माध्यम से आप डॉक्टर की अपॉइंटमेंट ले सकेंगे.''


हमने एक कस्टमर केयर भी स्थापित किया है जहां करीब 40 लोग काम करते हैं. लोग वहां से जानकारी ले सकते हैं और दवाइयां ऑर्डर कर सकते हैं. अभी हम रायपुर और छत्तीसगढ़ में हैं. हम आगे लखनऊ में विस्तार करने की तैयारी कर रहे हैं. अगले एक साल में हमारी छ्त्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, झारखंड, मध्य प्रदेश सहित पूरे हिंदी बेल्ट को कवर करने की योजना है.

1.50 लाख रुपये उधार लेकर की थी शुरुआत

देवकर साहेब ने कहा, ''मैंने 1.50 लाख रुपया कर्ज लेकर 'श्री च्यवन आयुर्वेद' की शुरुआत की थी. आज मेरी कंपनी में करीब 100 लोग काम कर रहे हैं. दिवाली के बाद 50 और लोगों की हायरिंग की तैयारी है. मैंने अपने जीवनकाल में दो लाख लोगों को रोजगार देने की कसम खाई हुई है.''


उन्होंने आगे कहा कि हमारे ऊपर कोई कर्ज नहीं है. कंपनी का कुल रिवेन्यू 6-7 करोड़ है और वैल्यूएशन 51 करोड़ रुपये है. इस वैल्यूएशन पर अभी हमने रायपुर के दो एंजल इंवेस्टर्स से 1.5 करोड़ की फंडिंग हासिल की है. हम सीधे कस्टमर्स को अपना सामान बेचते हैं. हमारे प्रोडक्ट्स पर हमें 70 फीसदी प्रॉफिट मिलता है.

15 साल की उम्र में ले लिया था सन्यास

देवकर साहेब की उम्र 32 साल है और उन्हें सन्यास लिए हुए 17 साल हो चुके हैं. वह मूल रूप से छत्तीसगढ़ के धनतरी जिले के खिसारी गांव से हैं.


उन्होंने बताया कि मेरे परिवार में माता-पिता और एक छोटा भाई है. हालांकि, सन्यास लेने के कारण मेरा उनसे कोई सीधा संबंध नहीं है. मेरा छोटा भाई अपना बिजनेस करता है और परिवार के साथ रहता है. 10वीं पढ़ाई के दौरान ही मैंने 15 साल की उम्र में सन्यास ले लिया था. मैं 10वी क्लास तक पढ़ाई में सबसे तेज बच्चों में से था. सन्यास के बाद मैं स्वामी असंगदेव जी के आध्यात्म आश्रम चला था और वहां के गुरुकुल से बाकी की आध्यात्म, समाज, आयुर्वेद, बिजनेस आदि की पढ़ाई की.