मैं अपने “अब्बा जान” की पहली कॉपी हूँ - ज़ाकिर खान

By Rajat Pandey
December 17, 2022, Updated on : Sat Dec 17 2022 05:22:53 GMT+0000
मैं अपने “अब्बा जान” की पहली कॉपी हूँ - ज़ाकिर खान
उम्मीद (Umeed), कक्षा ग्यारवीं (Kaksha Gyarvi), चाचा विधायक हैं हमारे (Chacha Vidhayak Hain Humare) के जरिए ज़ाकिर ने आपना फैन बेस तेज़ी से बढ़ाया है. राहत इन्दौरी (Rahat Indori) के इंदौर से आने वाले ज़ाकिर आज देश और दुनिया में अपनी एक अलग पहचान बना चुके हैं.
  • +0
    Clap Icon
Share on
close
  • +0
    Clap Icon
Share on
close
Share on
close

आज की तारीख़ में ज़ाकिर खान (Zakir Khan) एक ऐसा नाम बन चुके हैं, जिनसे हर युवा खुद को रिलेट कर पाता है. ज़ाकिर की हर स्टैंड-अप (Standup) देखकर यही लगता है कि ये कहानी कह तो ज़ाकिर रहे हैं, मगर ये कहानी एक बड़े युवा वर्ग की है. हर उस युवा की कहानी जो घर से बाहर पढ़ने या नौकरी करने आया है, उन सबके हिस्से के किस्से, एहसास, उनके ब्रेकअप की कहानियां सब उनकी ओर से ज़ाकिर अपने स्टैंड-अप के जरिए कहते हैं. यही कारण है कि यंग जनरेशन ज़ाकिर को बेहद पसंद करती है. जब भी ज़ाकिर खुले स्टेज पर अपने फैन्स के बीच आते हैं, तब फैन्स जोर-जोर से बोलने लगते हैं कि ‘लाल फूल, नीला फूल …ज़ाकिर भईया ब्यूटीफुल.’


उम्मीद (Umeed), कक्षा ग्यारवीं (Kaksha Gyarvi), चाचा विधायक हैं हमारे (Chacha Vidhayak Hain Humare) के जरिए ज़ाकिर ने आपना फैन बेस तेज़ी से बढ़ाया है. राहत इन्दौरी (Rahat Indori) के इंदौर से आने वाले ज़ाकिर आज देश और दुनिया में अपनी एक अलग पहचान बना चुके हैं. 


बीते कुछ दिनों पहले ज़ाकिर का एक नया स्टैंड-अप शो “तथास्तु” (Tathastu) अमेज़न प्राइम (Amazon Prime) पर रिलीज़ हुआ है. इस बार ज़ाकिर ने अपनी ज़िन्दगी के अनसुने किस्सों के बारे में बताया. अपने बचपन के बारे में, परिवार से अपने रिलेशन के बारे में, परिवार की एहमियत के बारे में, घर से दूर होकर रहने के एहसास के बारे में, सब कुछ ज़ाकिर ने अपने खुशनुमा अंदाज़ में बताया है. ज़ाकिर ने कही हसाया है तो, कही रुलाया है.


तथास्तु में ज़ाकिर ने अपनी ज़िन्दगी को तीन पार्ट्स में बांटा है - स्वर्ग (Paradise), वनवास (Exile) और घर वापसी. पहले सेगमेंट “स्वर्ग” में ज़ाकिर अपने शुरूआती दौर के बारे में बताते हैं, अपने घर-परिवार (Zakir's Family Relations) के बारे में, उनके और उनके वालिद (Zakir Khan Father) के बीच के रिलेशन के बारे में, अपने कॉलेज के दिनों (Zakir Khan College Days) के बारे में. उनके पूरे स्टैंड-अप के सबसे मुख्य किरदार हैं उनके अब्बा जान (दादाजी). जो उनके गुरु भी हैं. ज़ाकिर बड़े गर्व से कहते हैं कि “मैं अपने अब्बा जान की पहली कॉपी हूँ.” 


दुसरे सेगमेंट “वनवास” में ज़ाकिर उन दिनों का ज़िक्र करते हैं जब वो इंदौर छोड़कर दिल्ली आ जाते हैं रेडियो जॉकी का कोर्स करने. घर से नौकरी के बारे में लगातार पूछने पर ज़ाकिर झूट बोल देते हैं कि उनकी नौकरी लग गई. वो कहते है नौकरी लग जाने की बात सुनकर घरवालों ने खर्च भेजना बंद करदिया. इस पर ज़ाकिर कहते हैं - “बेरोजगार के साथ-साथ अब मैं गरीब भी हो गया था.“ आखिर सेगमेंट “घर वापसी” में ज़ाकिर अपनी घर वापसी के बारे में बताते हैं. 


पूरे स्टैंड-अप में ज़ाकिर ने अपने “अब्बा जान “ का बहुत ज़िक्र किया है. ज़ाकिर बताते हैं मेरे अब्बा जान मेरे गुरूर थे, मेरे गुरु थे, मेरा एड्रेस थे, मेरी पहचान थे. तथास्तु में ज़ाकिर बताते है एक दिन जब मैं मुंबई में था, मेरे वालिद साहब ने फ़ोन कर अब्बा जान के इंतकाल की जानकारी दी. हम सब गाँव पहुंचे. अब्बा जान की शव यात्रा में हजारों लोग शामिल हुए. दूर-दूर से लोग उन्हें आखिरी बार देखने आए थे. ज़ाकिर ने जब उनका फ़ोन देखा तब यूट्यूब पर ज़ाकिर की वीडियो चल रही थी. ज़ाकिर के आसू लगातार बहते रहें. ज़ाकिर कहते हैं मैं बहुत कुछ अब्बा जान से कहना चाहता था, उनसे बहुत सारी बातें करना चाहता था, उन्हें बहुत सारे किस्से बताने थे, मगर वो सब अनकहा रह गया. 


ज़ाकिर अक्सर कहते हैं मैं लोगों से कभी कुछ नही माँगता, मैं सबसे बस एक गुज़ारिश करता हूँ कि जब मैं मरुँ तब मुझे देखने जरुर आना. ज़ाकिर कहते हैं किसी भी व्यक्ति की असल कमाई इस बात से पता चलती है कि उसके मरने पर कितने लोग उसे देखने आते हैं. इसी पर वो कहते हैं - “मेरे दो-चार ख्वाब हैं, जो आसमान से दूर चाहता हूँ, ज़िन्दगी भले गुमनाम रहे, मौत मैं मशहूर चाहता हूँ.”