ग्रामीण महिलाओं के लिए वित्तीय समावेशन में बदलाव ला रहे हैं बैंकिंग कॉरेस्‍पॉन्‍डेंट

इस आलेख में यह विश्लेषण किया गया है कि ग्रामीण महिलाओं के वित्तीय समावेशन को आगे बढ़ाने में बैंकिंग कॉरेस्पोंडेंट किस प्रकार सहायक हो सकते हैं.

ग्रामीण महिलाओं के लिए वित्तीय समावेशन में बदलाव ला रहे हैं बैंकिंग कॉरेस्‍पॉन्‍डेंट

Thursday February 08, 2024,

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भारत में हमें यदि समावेशी विकास करना है तो गांवों की महिलाओं को सभी तरह की वित्तीय गतिविधियों में शामिल करना बहुत जरूरी है. लेकिन, अधिकांश ग्रामीण महिलायें सरकारी लाभों की निकासी के अलावा दूसरी औपचारिक वित्तीय सेवाओं में ज्‍यादा रुचि नहीं लेती हैं. इस सम्बन्ध में, बैंकिंग कॉरेस्पोंडेंट (बीसी) यानी बैंकिंग अभिकर्ता बैंकों और सेवा से वंचित समुदायों के बीच बिचौलिए की भूमिका निभाते हुए वित्तीय सेवाओं को ज्यादा ग्रामीण महिलाओं तक पहुँचा सकते हैं.

इस आलेख में यह विश्लेषण किया गया है कि ग्रामीण महिलाओं के वित्तीय समावेशन को आगे बढ़ाने में बैंकिंग कॉरेस्पोंडेंट किस प्रकार सहायक हो सकते हैं.

ग्रामीण महिलाओं के वित्तीय समावेशन की आवश्यकता

प्रधान मंत्री जन धन योजना (पीएमजेडीवाई) के तहत व्यापक प्रयासों के चलते 513 मिलियन (51 करोड़ 30 लाख) भारतीयों को बुनियादी बैंक खाते का स्वामित्व मिला है, जिनमें 55% महिलायें हैं. लेकिन अधिकतर ग्रामीण महिलायें पीएमजेडीवाई खाते का प्रयोग कभी-कभार केवल सरकार से मिले पैसों की निकासी के लिए ही करती हैं. जागरूकता की कमी के कारण वे बचत, ऋण, बीमा या पेंशन के लिए अपने खाते का परिचालन नहीं करतीं.

उनकी सीमित गतिशीलता और वित्तीय साक्षरता उनकी सक्रिय भागीदारी को रोक देती हैं. लेकिन वित्तीय समावेशन से ग्रामीण महिलाओं का बहुत ज्यादा आर्थिक सशक्तिकरण हो सकता है. बैंक खातों की सुलभता से महिलाओं का बचत और वित्त पर नियंत्रण बढ़ता है. ऋण का लाभ उठाने से आमदनी के अवसर खुलते हैं और स्थायी आजीविका का निर्माण होता है. बीमा आकस्मिक परिस्थितियों या विपत्तियों के दौरान आमदनी बंद होने पर तात्कालिक राहत प्रदान करता है. इसलिए, ग्रामीण महिलाओं का वित्तीय समावेशन आवश्यक है और इस पर विशेष ध्यान देने की ज़रूरत है.

बैंकिंग कॉरेस्पोंडेंट का उद्भव

बैंकिंग कॉरेस्पोंडेंट्स (बीसी) ने पिछले दशकों में औपचारिक वित्तीय संस्थानों और बुनियादी सुविधाओं से वंचित ग्रामीण समुदायों के बीच अंतर काफी कम कर दिया है. बीसी माइक्रो-एटीएम, बायोमेट्रिक उपकरणों, और मोबाइल फोन के माध्यम से बुनियादी बैंकिंग लेन-देन को सरल बनाते हैं. ई-केवाईसी, रुपे कार्ड और आधार-समर्थित इंटरफ़ेस से लैस बीसी बैंक खाते खोले, राशि जमा करने, निकासी, विप्रेषण और भुगतानों में सहायता करते हैं और इस प्रकार वित्तीय साक्षरता बढ़ाते हैं.

ग्रामीण महिलाओं के वित्तीय समावेशन सामर्थ्य के प्रति बीसी के लिए योजनायें

भारत में ग्रामीण महिलाओं के बीच वित्तीय समावेशन को बेहतर बनाने के लिए एक बहु-आयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है. सबसे पहला कदम है महिला बैंकिंग कॉरेस्पोंडेंट (बीसी) नेटवर्क का विस्तार करना. महिला बीसी की संख्या बढ़ाने से ज्यादा ग्रामीण महिलाओं के लिए प्राथमिकता-आधारित पहुँच बढ़ाई जा सकती है, क्योंकि महिला बीसी के साथ बातचीत करने में उन्हें अधिक सुविधा महसूस हो सकती है. सरकार ने इसी योजना के अनुरूप कॉरेस्‍पॉन्‍डेंट में महिला बीसी का अनुपात बढ़ा कर एक-तिहाई करने का लक्ष्य रखा है.

बीसी विशेष रूप से अभिकल्पित वित्तीय उत्पादों की समझ बढ़ाने में भी सहायक हो सकते हैं, जिनसे ग्रामीण महिलाओं की सूक्ष्म-बचत, ऋण, और सूक्ष्म-बीमा जैसी ज़रूरतों का समाधान होता है. लेकिन, ग्रामीण महिलाओं में डिजिटल जागरूकता की कमी के कारण इन उत्पादों के प्रयोग में बाधा आती है. इसलिए, डिजिटल साक्षरता को बढ़ावा देना महत्वपूर्ण है. बायोमेट्रिक उपकरणों और मोबाइल वॉलेट से लैस बीसी डिजिटल लेन-देन करा सकते हैं, लेकिन डिजिटल साक्षरता बढ़ाने के लिए बीसी और महिलाओं की स्वयं-सहायता समूहों (एसएचजी) की ज़रूरत है, ताकि इन उपकरणों का प्रभावी ढंग से उपयोग किया जा सके.

बीसी के लिए पद्धतियों, उत्पादों, टेक्‍नोलॉजी और संचार पर निरंतर प्रशिक्षण से सेवाओं और इन्हें अपनाने में सुधार होगा. इसके साथ-साथ आकर्षक संवाद से बीसी को ज्यादा ग्रामीण महिलाओं को औपचारिक वित्तीय दायरे में लाने की प्रेरणा मिल सकती है. खाता खोलने, ऋण सम्बद्धता और सूक्ष्म बीमा पॉलिसी वितरण के लिए गतिविधि-आधारित प्रोत्साहन विशेष रूप से प्रभावकारी हो सकता है.

‘अपने ग्राहक को जानें’ (केवाईसी) से सम्बंधित अपेक्षाओं के सरलीकरण से अधिक ग्रामीण महिलाओं को खाता खोलने में मदद मिलेगी और ई-केवाईसी पद्धतियों से कागजातों का सत्यापन आसानी से हो सकेगा. हालांकि, इन उपायों की सफलता बुनियादी संरचनाओं की उपलब्धता पर निर्भर करती है. बीसी के परिचालनों और महिलाओं की ऐक्सेस को मजबूत करने के लिए ग्रामीण बुनियादी संरचनाओं, जैसे कि बिजली, इन्टरनेट कनेक्टिविटी, और परिवहन के लिंक्स को बेहतर बनाना जरूरी है.

अंत में, महिलाओं के स्वयं-सहायता समूहों (एसएचजी) को शामिल करने से वित्तीय उत्पादों पर समकक्ष शिक्षण का निर्माण किया जा सकता है. आज 8 करोड़ से अधिक ग्रामीण महिलायें स्वयं-सहायता समूहों के माध्यम से माइक्रो फाइनेंस से जुड़ी हुई हैं. इसे देखते हुए इन समूहों के साथ साझेदारी करने से वित्तीय समावेशन की पहलकदमियों की पहुँच और प्रभाव काफी बेहतर हो सकता है. अंतर-सम्बद्ध और सुव्यवस्थित दृष्टिकोण से भारत में ग्रामीण महिलाओं के बीच वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देने में बीसी की भूमिका काफी बेहतर बन सकती है.

निष्कर्ष

बैंकिंग कॉरेस्पोंडेंट (बीसी) भारत में ग्रामीण इलाकों में वित्तीय सुलभता का लगातार विस्तार करके एक परिवर्तनकारी भूमिका निभाते हैं. औपचारिक वित्त और बुनियादी सुविधाओं के कमी वाले क्षेत्रों के बीच महत्वपूर्ण संपर्क के रूप में बीसी इन क्षेत्रों में अंतर को कम रहे हैं. सतत रूप से वित्तीय सुलभता के विस्तार के लिए बीसी की शक्ति को ‘अपने ग्राहक को जानें’ (केवाईसी) के नियमों में अनुकूल विनियामक बदलावों, ग्रामीण बुनियादी सुविधाओं का उन्नयन, और सार्वजनीन डिजिटल साक्षरता को बढ़ावा के माध्यम से स्वीकार किया जा रहा है. इन पहलों से अधिक समावेशी वित्तीय परिदृश्य का मार्ग प्रशस्त हो रहा है.

इन गतिविधियों के अतिरिक्‍त, और अधिक महिलाओं को बीसी की रूप में प्रशिक्षित करने के दिशा में संगठित प्रयास किये जा रहे हैं. इनके साथ महिला-केन्द्रित वित्तीय उत्पादों की पेशकश होने से ज्यादा ग्रामीण महिलायें औपचारिक वित्तीय व्यवस्था की ओर आकर्षित हो सकती हैं. ग्रामीण महिलाओं के वित्तीय समावेशन को प्राथमिकता देकर हम ग्रामीण परिवारों के लिए वित्तीय सुरक्षा और आमदानी में स्थिरता को काफी आगे बढ़ा सकते हैं. इस दृष्टिकोण से न केवल महिलाओं का सशक्तीकरण होगा, बल्कि ग्रामीण इलाकों के संपूर्ण वित्तीय विकास में भी मदद मिलेगी.

(लेखक ‘BLS E-Services’ के चेयरमैन हैं. आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं. YourStory का उनसे सहमत होना अनिवार्य नहीं है.)