आईएलएस ने कोविड-19 की दवा बनाने की दिशा में मदद के लिए बड़े कदम उठाए

आईएलएस ने कोविड-19 की दवा बनाने की दिशा में मदद के लिए बड़े कदम उठाए

Tuesday July 14, 2020,

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भुवनेश्वर, कोविड-19 के लिए दवा बनाने में मदद करने में सक्षम एक बड़ी उपलब्धि के तहत यहां के इंस्टीट्यूट ऑफ लाइफ साइंसेज (आईएलएस) ने वेरो कोशिकाओं का इस्तेमाल करते हुए मरीज के नमूनों से कोरोना वायरस का ‘इन विट्रो (टेस्ट ट्यूब) कल्चर’ सफलतापूर्वक स्थापित किए हैं।


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फोटो साभार: shutterstock


संस्थान के एक शीर्ष अधिकारी ने सोमवार को यह जानकारी दी।


इन विट्रो कल्चर मनुष्य या जानवरों की बजाय टेस्ट ट्यूब में जैविक लक्षणों के अध्ययन से जुड़ा है।


अधिकारियों ने बताया कि बायोटेक्नोलॉजी विभाग के तहत स्वायत्त संस्थान, आईएलएस ने देश के अलग-अलग स्थानों से नमूने लेकर 17 वायरस कल्चर स्थापित किए हैं जिनमें वायरस लोड (विषाणु की मात्रा) अलग-अलग था।


पूरी तरह कोशिका आधारित निष्क्रिय टीकों को विकसित करने के लिए वीरो सेल कल्चर तकनीक का दुनिया भर में इस्तेमाल होता है।


आईएलएल के निदेशक अजय परीडा ने कहा,

“यह महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है क्योंकि भारत की केवल तीन अन्य प्रयोगशालाओं ने अब तक ‘वायरस कल्चर’ स्थापित करने में सफलता प्राप्त की है।”

संभावित दवा लक्ष्यों की जांच एवं स्क्रीनिंग, दवा तैयार करने के साथ ही टीकों के विकास में यह अहम हो सकता है।


परीडा ने भरोसा जताया कि यह कोविड-19 वैश्विक महामारी के खिलाफ जंग में और भविष्य की तैयारी में देश के लिए महत्त्वपूर्ण संसाधन साबित हो सकता है।


उन्होंने कहा कि भविष्य में, ये वायरल कल्चर कोविड-19 वैश्विक महामारी के निदान, जांच एवं प्रबंधन में योगदान देने वाले विभिन्न एंटीवायरल उत्पादों की जांच एवं प्रमाणन के लिए उद्योगों के साथ-साथ शिक्षाविदों के लिए भी उपयोगी होंगे।


एक अधिकारी ने बताया कि इन वायरस कल्चर को सभी अंतरराष्ट्रीय प्रोटोकॉल एवं सुरक्षा उपायों का पालन करते हुए वैज्ञानिक सोमा चटोपाध्याय और गुलाम एच सैयद के नेतृत्व में आईएलएस की टीम ने विकसित किया है।


स्थापित कल्चर में किसी तरह के परिवर्तन एवं स्थिरता को समझने के लिए जीनोम सीक्वेंसिंग का इस्तेमाल करने वाले अध्ययन किए जा रहे हैं।



Edited by रविकांत पारीक