स्वतंत्रता दिवस विशेष: भारत के ये गांव हैं 'फौजियों की फैक्ट्रियां'

हम सभी भारतवासी आज स्वतंत्रता दिवस की 76वीं वर्षगांठ मना रहे हैं. इस मौके पर आज हम आपको भारत के उन गांवों के बारे में बताने जा रहे हैं जहां से आने वाले हजारों जवान देश की सेवा और रक्षा के लिए हर समय तैयार है.

स्वतंत्रता दिवस विशेष: भारत के ये गांव हैं 'फौजियों की फैक्ट्रियां'

Tuesday August 15, 2023,

5 min Read

आज हम सभी आजादी की 76वीं वर्षगांठ मना रहे हैं, और हर कोई आजादी के जश्न में सराबोर है. स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तिरंगा फहराया.

आज के इस पावन अवसर पर हम आपको भारत के उन गांवों के बारे में बताने जा रहे हैं जिन्हें सही मायनों में “फौजियों की फैक्ट्रियां” कहा जा सकता है... अर्थात इन गांवों ने देश को सबसे ज्यादा वीर जवान दिए हैं. इन गांवों के हर घर से देश सेवा की खुशबू और किस्से सुनने को मिलते हैं.

f

फोटो साभार: bloombergquint

गहमर, गाजीपुर, उत्तर प्रदेश

उत्तरप्रदेश के गाजीपुर जिले का गहमर गाँव न सिर्फ एशिया के सबसे बड़े गांवों में शुमार है, बल्कि इसे फौजियों के गांव की भी ख्याति प्राप्त है. इस गांव के करीब दस हज़ार से अधिक फौजी इस समय भारतीय सेना में जवान से लेकर कर्नल तक अलग-अलग पदों पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं, जबकि पाँच हज़ार से अधिक भूतपूर्व सैनिक हैं.

रोचक बात यह है कि औसतन गांव के हर परिवार का कोई न कोई सदस्य भारतीय सेना में कार्यरत है. प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध हों या 1965 और 1971 के युद्ध या फिर कारगिल की लड़ाई, सब में यहाँ के फौजियों ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया है. विश्वयुद्ध के समय अंग्रेजों की फौज में गहमर के 228 सैनिक शामिल थे, जिनमें 21 मारे गए थे. इनकी याद में गहमर में एक शिलालेख लगा हुआ है.

गहमर के भूतपूर्व सैनिकों ने पूर्व सैनिक सेवा समिति नामक संस्था बनाई है. गांव के युवक गांव से कुछ दूरी पर गंगा तट पर स्थित मठिया चौक पर सुबह-शाम सेना की तैयारी करते नजर आ जाते हैं. गहमर भले ही गांव हो, लेकिन यहाँ शहरों की तरह तमाम सुविधायें विद्यमान हैं.

हरियाणा के गांव

हरियाणा राज्य के गांवों के हर घर में देशभक्ति का जज्बा और हर युवा के दिल में सैनिक बन कर देश की सेवा करने की हसरत रही है. शायद यही वजह है कि राज्य के कई गांवों में, जहां कई पीढ़ियों से देश सेवा के लिए फौजी बनना एक परम्परा बन चुकी है. झज्जर जिले का गांव बिसाहन हो या भिवानी का बापोड़ा. कैथल का गुलियाणा हो या यमुनानगर का तिगरा, या फिर करनाल जिले का गांव जयसिंहपुर... ये तमाम ऐसे गांव हैं, जहां घर-घर में सैनिक हैं. इन गांवों में कई ऐसे परिवार भी हैं, जहां चार-चार पीढिय़ां सेना में हैं.

बापोड़ा पूर्व सेनाध्यक्ष बीके सिंह और बिसाहन पूर्व सेनाध्यक्ष दलबीर सिंह सुहाग का गांव है.

रिपोर्ट्स के मुताबिक, गांव बिसाहन की आबादी करीब 3000 की है. गांव के लिए गौरव की बात यह है कि लगभग हर परिवार से कोई न कोई किसी न किसी रूप से सेना से जुड़ा हुआ है. इस गांव से निकलकर 50 से अधिक सुपुत्र सेना में लेफ्टिनेंट, कर्नल, मेजर, सूबेदार, सिपाही जैसे पदों पर रहते हुए देश की रक्षा कर रहे हैं. वहीं कैथल के गांव गुलियाणा से करीब 400 फौजी हैं. 

भारतीय सेना में राज्य के रेवाड़ी जिले की कोसली विधानसभा क्षेत्र के गांव जाटूसाना के ऑन सर्विस 17,500 से ज्यादा जवान अपनी सेवा दे रहे हैं, और साल की हर तिमाही में चरखी दादरी कार्यालय से भर्ती की जाती है. जिसमें रेवाड़ी जिले से हर साल 1400 से 1500 जवान भर्ती होते हैं. जिले में 5848 जवान रिटायर होकर पेंशन ले रहे हैं.

कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारतीय सेना में हर दसवां सैनिक हरियाणा का है, और यही वजह है कि हरियाणा को भारत का टेक्सस कहा जाता है.

f

फोटो साभार: TheEconomicTimes

राजस्थान के झुंझुनूं जिले के गांव

आजादी के जश्न से लबरेज आज हम जाबांज वीरों को याद कर उन्हें नमन कर रहे हैं, ऐसे में जवानों की दासतां राजस्थान का जिक्र किए बिना अधूरी है. राजस्थान की मिट्टी ने देश की रक्षा के लिए अपने कितने ही बेटे सीमा पर भेजे. 1999 में हुए कारगिल युद्ध (भारत-पाकिस्तान के बीच) में सीकर, झुंझुनूं और चूरू के 32 जवान शहीद हुए थे. कारगिल के अलावा भी अन्य कई जंगों में यह तीन जिले देश की रक्षा करते रहे हैं.

झुंझुनूं जिले के भिर्र गांव, जिसमें की तकरीबन 900 घर हैं, से अब तक 1400 फौजी देश की रक्षा के लिए निकले हैं. आजादी के बाद देश के चार युद्धों का गवाह बना यह ऐसा गांव है, जहां के परिवारों में दादा से लेकर पोते तक ने सेना में सेवाएं दी है. गांव में पूर्व फौजी आज भी 1962, 1965, 1971 और कारगिल युद्ध के ऐसे-ऐसे किस्से बताते हैं कि आपके रोंगटे खड़े हो जाएं.

झुंझुनूं जिले की बुहाना तहसील का झारोडा गांव भी देश सेवा के लिए जाना जाता है. इस गांव में 700 के लगभग फौजी हैं, यानि कि प्रत्येक घर में एक या दो फौजी हैं.

जिले का एक और गांव है, धनूरी गांव, जिसे फौजियों की खान भी कहा जाता है. धनूरी गांव का रिकॉर्ड है कि यहां के हर दूसरे घर में फौजी है. 1500 घरों की आबादी वाले इस गांव के करीब 600 बेटे अभी सेना में रहकर देश की सेवा कर रहे हैं. इस गांव के 18 बेटों ने विभिन्न युद्धों में व सरहद की रक्षा करते हुए शहादत दी है.

झुंझुनूं जिले के चिड़ावा तहसील के किठाना गांव ने भी कई रण बांकूरे पैदा किए हैं.

महुलझिर, सिवनी, मध्यप्रदेश

मध्यप्रदेश के सिवनी ज़िले का महुलझिर गांव न सिर्फ प्रदेश के सबसे छोटे गांवों में गिना जाता है, बल्कि इसका नाम फौजियों के गांव के रूप में भी शुमार है. इस गांव के करीब 25 फौजी इस समय भारतीय सेना में जवान के पद पर कार्यरत हैं, जबकि 15 से अधिक भूतपूर्व सैनिक हैं. करीब 800 की आबादी वाला महुलझिर गांव अब वीरों सपूतों का गांव बन गया है.

ये तो बस बानगी भर है, भारत का हर एक नागरिक देश की सेवा के लिए तत्पर है और जरूरत पड़ने पर भारत मां की रक्षा के लिए प्राणों की आहूति देने से कभी नहीं कतराएगा. आजादी के 76वें साल पर हम सभी देशवासी इन जवानों को नमन करते हैं.