अमेरिका की खुशहाल जिंदगी छोड़कर प्राकृतिक खेती कर रहे कोलकाता के दंपति

By जय प्रकाश जय
February 21, 2020, Updated on : Sat Feb 22 2020 12:33:56 GMT+0000
अमेरिका की खुशहाल जिंदगी छोड़कर प्राकृतिक खेती कर रहे कोलकाता के दंपति
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अमेरिका में प्रोफेसर रहीं अपराजिता और एक कंपनी में सॉफ्टवेयर डेवलपर रहे देबल केमिकलाइज खाद्य से ऊबकर अपने कोलकाता के गांव लौट आए। प्राकृतिक खेती करने के साथ ही बच्चों को पढ़ाने-लिखाने लगे। इसके साथ ही, वे आसपास के किसानों को रासायनिक खेती छोड़कर अपनी तरह की खेती में ट्रेंड कर रहे हैं।


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अपने कोलकाता के खेत में अपराजिता और देबल (फोटो क्रेडिट: सोशल मीडिया)



अमेरिका की नौकरी से अपनी ज़िंदगी में खुशहाल होने के बावजूद पश्चिमी बंगाल लौटकर प्राकृतिक खेती कर रहे अपराजिता सेन गुप्ता और उनके पति देबल मजुमदार पिछले कुछ वर्षों से अपने दो एकड़ के खेत में ही जरूरत भर को दाल, चावल, सब्ज़ियाँ, फल, मसाले पैदा कर लेते हैं। वे बताते हैं कि नोटबंदी के दौरान उनको दो सप्ताह तक तो बैंक जाने की ज़रूरत ही नहीं महसूस हुई क्योंकि मात्र सौ-दो सौ रुपये में उनका गुज़ारा हो जा रहा था।


अंग्रेजी से पीएचडी अपराजिता अमेरिका में असिस्टेंट प्रोफेसर और देबल एक कंपनी में सॉफ्टवेयर डेवलपर थे। दोनो को वहां की हाईटेक, हाईफाई जिंदगी रास नहीं आ रही थी। वहां की फल-सब्ज़ियाँ तो उन्हे बिल्कुल भी पसंद नहीं आती थीं क्योंकि उनमें रासायनिक खादों और दवाओं का बेतरह इस्तेमाल होता है। सच कहें तो सबसे पहले उन्हे इसी बात ने भारत लौटने के लिए उकसाया और वे आखिरकार देश लौट ही आए।


इस दंपति ने भारतीय और अमेरिकी कृषि की बारीकियों को आपस में एक-दूसरे से लंबे समय तक साझा करने के बाद तय किया कि बेहतर लाइफस्टाइल के लिए अब अपने देश लौट जाने में ही भलाई है। उसके लगभग एक दशक पहले 2011 में दोनो भारत लौट आए और कोलकाता के पास ठाकुरपुर में दो एकड़ ज़मीन खरीद कर वहीं अपना घर बनवा लिया।


उसके बाद वे ‘स्मेल ऑफ़ द अर्थ’ नाम से प्राकृतिक तरीके की खेती करने लगे। उससे पहले वे परमाकल्चर आदि कृषि का अच्छा-खासा प्रशिक्षण ले चुके थे।


25 वर्षीय अपराजिता और 31 वर्षीय देबल बताते हैं कि अब तो सप्ताहांत में खरीदारी और प्यूबिंग के बजाय, वे खाद और फसलों की कटाई करते हैं। वह देश में अपनी तरह की पहली ऐसी खेती कर रहे हैं, जो दूसरो किसानों के लिए भी एक नई लाभदायक राह हो सकती है। इस समय दोनो अपनी खेती के साथ ही 29 फरवरी से 9 मार्च तक नैचुरल फार्मिंग की लोगों को ट्रेनिंग दे रहे हैं। यदि कोई भी जैविक और प्राकृतिक खेती सीखना और करना चाहता है तो उनका ट्रेनिंग कोर्स जॉइन कर सकता है।


पश्चिम बंगाल के शांति निकेतन में रह रहीं अपराजिता सेनगुप्ता और देबल बताते हैं कि वे दोनो खुदाई और कटाई में तो समर्थ हैं, लेकिन टीलिंग में नहीं क्योंकि इसमें एक बैल और एक हल की जरूरत होती है, जिसे वे अभी भी नहीं जानते हैं कि कैसे संभाला जाता है। वे बताते हैं कि अपनी खेती तो दुर्लभ माटी-मानुष कथा जैसी है।


अमेरिका में उनके जीवन की शुरुआत भी अन्य युवा आप्रवासी जोड़ों की तरह हुई थी, जैसे उनके छोटे-छोटे अमेरिकी सपने होते हैं। वह भी छोटे छोटे सुखों के पीछे भाग रहे थे। बस एक साधारण सा अहसास उन्हे खाए जा रहा था कि वह आखिर कब तक अमेरिकी भोजन के रूप में जहरीले खाद्य को सेवन करते रहें। हमने अमेरिका में देखा कि किसानों के बाजार किस दिशा में दौड़ लगा रहे हैं। वह सब देखकर तय किया कि हमे भारत लौटकर अपने देश के लोगों को इससे समय रहते आगाह कर देना चाहिए। खुद अपनी सभी जरूरतें पूरी करते हुए पर्यावरण के प्रति भी अपनी ज़िम्मेदारी निभाने के लिए लौट पड़े।


अपनी बेटी को महंगे से महंगे खिलौने या फिर गैजेट्स दिलाने का कोई फायदा नहीं अगर हम उसे शुद्ध खाना-पीना और वातावरण नहीं दे सकते। देबल और अपराजिता अपने खेत में चार किस्म के चावल उगाते हैं। इसके अलावा वे अब तो मसूर, तुअर, मूंग, चना, सभी तरह की सब्ज़ियाँ जैसे आलू, बैंगन, प्याज, लहसुन, हल्दी के साथ-साथ केला और अमरुद जैसे फल भी पैदा कर रहे हैं।


अपराजिता और देबल कहते हैं कि यह हमारे ऊपर रहता है कि अपनी ज़िंदगी को कैसे जिया जा सकता है। हमारा घर भले ही बहुत बड़ा नहीं लेकिन हर ज़रूरत की चीज़ यहाँ मौजूद हैं। वे अपनी ही तरह अपने गांव के लोगों की भी जिंदगी बदल देना चाहते हैं। वह आसपास के किसानों को रासायनिक खेती से अलग करने में जुटे हैं।


जैविक कृषि में वह किसानो का रुझान विकसित कर रहे हैं। अब उनके गांव के किसान देसी बीजों से खेती करने लगे हैं। वे गाँव के बच्चों को पढ़ाते भी हैं। अब उनके लगाएं एक दशक पुराने पेड़ों पर फल आने लगे हैं। वह जरूरत भर अपनी उपज अपने पास रख लेने के बाद बाकी अन्य जरूरतमंद लोगों में बांट देते हैं।


इस समय उनके यहां बड़ी संख्या में ऐसे लोग कृषि प्रशिक्षण लेने पहुंच रहे हैं, जो शहरों में रहने से उकता गए हैं और अपने पुरखों की खेती-बाड़ी में जीवन यापन करना चाहते हैं।