विदेश की नौकरी छोड़ने वाले विवेक कुमार, अब अपने देश के सरकारी विद्यालयों को बना रहे ‘क्षमतालय’

By Vishal Jaiswal
July 31, 2022, Updated on : Mon Aug 01 2022 06:39:49 GMT+0000
विदेश की नौकरी छोड़ने वाले विवेक कुमार, अब अपने देश के सरकारी विद्यालयों को बना रहे ‘क्षमतालय’
गांधी फेलोशिप के साथ काम करने वाले विवेक कुमार ने देश के सरकारी स्कूलों के साथ जुड़ी समस्याओं से मुंह मोड़ने के बजाय उन्हें दुरुस्त करने का मन बना लिया. आज वह अपने NGO क्षमतालय फाउंडेशन के माध्यम से सरकारी स्कूलों के बच्चों के जीवन में बदलाव लाने के लिए काम कर रहे हैं.
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भारत जैसे विकासशील देश में आर्थिक रूप से कमजोर होने के कारण अधिकतर पैरेंट्स अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में ही पढ़ने के लिए भेजते हैं. हालांकि, देश के सरकारी स्कूलों में बच्चों को न तो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल पा रही है और न ही वे पढ़ाई के अलावा अन्य गतिविधियों में भाग ले पा रहे हैं.


ऐसे में गांधी फेलोशिप के साथ काम करने वाले विवेक कुमार ने देश के सरकारी स्कूलों के साथ जुड़ी इन समस्याओं से मुंह मोड़ने के बजाय उन्हें दुरुस्त करने का मन बना लिया. आज वह अपने गैर-सरकारी संगठन (NGO) क्षमतालय फाउंडेशन के माध्यम से सरकारी स्कूलों के बच्चों के जीवन में बदलाव लाने के लिए काम करने के साथ ऐसे स्कूलों को स्कूल ऑफ एक्सीलेंस बनाने पर काम कर रहे हैं.

कुमार ने साल 2016 में अपने को-फाउंडिंग सदस्यों आलोकेश, पूजा और अंजनि के साथ क्षमतालय की शुरुआत की थी. बाद में उनके फाउंडिंग सदस्यों में सौम्या जुड़ीं जो कि आज फाउंडेशन की डायरेक्टर हैं.


क्षमतालय का मुख्य उद्देश्य हर बच्चे को एक मीनिंगफुल, करुणामय और रेलिवेंट शिक्षा मुहैया कराना है. इसके साथ ही स्थानीय लेवल पर लोकल लीडरशिप खड़ा करने का भी उद्देश्य था.


साल 2016 में एक ब्लॉक के 3 स्कूलों से क्षमतालय की शुरुआत हुई थी. आज क्षमतालय 7 ब्लॉक के 60 स्कूलों में चल रहा है. क्षमतालय दिल्ली के एक, राजस्थान के दो और बिहार के एक जिले में काम कर रहा है.

कौन हैं विवेक कुमार?

क्षमतालय के फाउंडर विवेक कुमार बिहार के बेगुसराय जिले के रहने वाले हैं. उनके पिताजी इंडियन ऑयल में थे तो उनकी प्राथमिक शिक्षा रिफाइनरी टाउनशिप में हुई. उसके बाद उनकी 10वीं तक की पढ़ाई पटना से हुई. 10वीं के बाद वे दिल्ली आ गए थे.


कुमार को फिल्मों का बहुत शौक था और वह थिएटर करना चाहते थे लेकिन पैरेंट्स के दबाव के कारण उन्हें इंजीनियरिंग करनी पड़ी. हालांकि, इस दौरान वह जी सिने स्टार की खोज और रोडीज जैसे ऑडिशनों में गए. चेन्नई में इंजीनियरिंग के दौरान वह बेंगलुरु जाकर शॉर्ट फिल्में भी बनाते थे.

50 हजार घंटे क्लासरूम में बिताने के बाद युवाओं को नहीं मिल रही दिशा

YourStory से बात करते हुए विवेक कुमार ने कहा कि इंजीनियरिंग करने के दौरान ही उनके मन में सवाल आने शुरू हो गए कि वह अपने सपनों को पूरा क्यों नहीं कर पाए.


वह कहते हैं, एक सामान्य छात्र अपनी जिंदगी के करीब 50 हजार घंटे क्लासरूम में बिताता है. मैं तो एक अच्छे-खासे स्कूल में गया था. 50 हजार घंटे क्लासरूम में बिताने के बाद भी बच्चे को यह नहीं पता होता है कि उसे क्या करना है और कैसे करना है. तो मेरे ख्याल से केवल माता-पिता या समाज पर दोषारोपण करने से काम नहीं चलेगा बल्कि पूरी व्यवस्था ही ऐसी है जो आपको तैयार ही नहीं करती है. पूरी व्यवस्था बच्चे के लिए है लेकिन उसमें बच्चे की आवाज कहीं नहीं है.

ब्लाइंड स्कूल ने दिखाई नई राह

इन्हीं सब सवालों से जूझते हुए अपनी इंजीनियरिंग ग्रेजुएशन के चौथे साल में कुमार IVolunteer के साथ वालंटियर करने लगे. वालंटियरिंग के दौरान वह एक ब्लाइंड स्कूल जाते थे. वहां ब्लाइंड बच्चों के संघर्ष और लगन को देखकर कुमार के मन में सैकड़ों सवाल पैदा होने लगे और कुछ कर गुजरने की इच्छा होने लगी.

गांधी फेलोशिप से मंजिल की ओर रखा पहला कदम

कुमार बताते हैं कि इन सब समस्याओं को देखते हुए मैंने 2010 में अहमदाबाद में गांधी फेलोशिप ज्वाइन किया. वहां मेरा काम स्कूल के हेडमास्टर के साथ मिलकर स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता और हेडमास्टर के नेतृत्व को बढ़ाना था. सबसे बड़ी चीज जो हम सिखाते हैं, वह है पर्सनल ट्रांसफॉर्मेशन. उस समय मैंने देखा कि एक स्कूल में हेडमास्टर के साथ अगर समुदाय की भागीदारी हो तो एक अच्छी शिक्षा मिल सकती है.


इस तरह गांधी फेलोशिप के दौरान उन्हें समझ में आ गया था कि बदलाव लाया जा सकता है. विद्यालय को क्षमतालय के रूप में विकसित किया जा सकता है.


वह कहते हैं कि ग्रेजुएशन के बाद हम कॉलेज से प्लेसमेंट की रिस्पांसबिलिटी तो चाहते हैं लेकिन उसके पहले के स्कूल और कॉलेज की जवाबदेही नहीं तय करते हैं. अगर 17-20 करोड़ बच्चे सरकारी स्कूल जाते हैं लेकिन वह व्यवस्था ठीक नहीं हो तो हम राष्ट्र निर्माण में कहां रह जाएंगे.


हालांकि, इस जिम्मेदारी को उठाने के पीछे कुमार के निजी कारण भी हैं. कुमार बताते हैं कि मैं अपने सपनों को पूरा इसलिए नहीं कर पाया कि मुझमें प्रतिभा की कमी है बल्कि इसलिए नहीं कर पाया क्योंकि मुझे उस प्रतिभा को निखारने का पर्याप्त मंच नहीं मिल पाया.

मल्टी नेशनल कंपनी में नहीं लगा मन

गांधी फेलोशिप में दो साल बिताने के बाद कुमार एक मल्टी नेशनल कंपनी से भी जुड़े उनका काम मॉनिटरिंग और इवैल्यूएशन आदि था. हालांकि, देश के एजुकेशन सिस्टम के खिलाफ उनके मन में बैठे आक्रोश ने उन्हें वहां टिकने नहीं दिया.


इसके बाद कुमार ने टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS) से एजुकेशन की पढ़ाई की. वहां उन्हें एकेडमिक एक्सीलेंस के लिए सिल्वर मेडर और बेस्ट थीसिस के लिए गोल्ड मेडल मिला था. इस तरह से गांधी फेलोशिप से शिक्षा की एक समझ विकसित करने के बाद कुमार ने TISS से शिक्षा के इतिहास, सोशियोलॉजी और फिलॉसफी के बारे में गहरी समझ विकसित की.

राजस्थान के कोटड़ा से की शुरुआत

अक्टूबर, 2012 में कुमार ने राजस्थान के कोटड़ा जाने का फैसला किया. कुमार बताते हैं कि कोटड़ा देश के मानव विकास सूचकांक (Human Development Index) में सबसे नीचे है. कोटड़ा को आज भी काला पानी कहा जाता है. आजादी के 70 साल बाद भी वहां फ्रेश वाटर का कॉन्सेप्ट नहीं है.


वहां, जाकर कुमार ने 'हुनरघर' नाम के एक स्कूल में दो साल काम किया. उन्होंने वहां जाकर समझना चाहा कि क्या स्कूल एक सामुदायिक रिसोर्स सेंटर के रूप में काम कर सकता है. उनका मानना है कि स्कूल एक ऐसी जगह हो जहां बच्चे तो सीखें ही लेकिन साथ समुदाय भी भागीदारी करें.


Kotra

उन्होंने कहा कि प्राइवेट स्कूलों की जवाबदेही तय होती है जबकि सरकारी स्कूलों की कोई जवाबदेही तय नहीं होती है. टीचर के आने और बच्चों को पढ़ाने की कोई सीधी जवाबदेही नहीं है. जब समुदाय मांग नहीं करेगा कि हमें अच्छी शिक्षा चाहिए तब तक ऐसी जगहों पर अच्छी शिक्षा मिलना मुश्किल है.


हालांकि, इससे भी वह संतुष्ट नहीं हुए. वहां से उन्हें लगा कि केवल एक स्कूल को बदलने से काम नहीं चलेगा क्योंकि कोटड़ा में 351 स्कूल हैं. यहीं से उन्हें क्षमतालय का आइडिया आया. क्षमतालय के माध्यम से उन्होंने तीन मुख्य बिंदुओं पर काम करने के बारे में सोचा जिसमें ओवरऑल लर्निंग, बच्चों का सामाजिक और सामुदायिक स्वास्थ्य और गवर्नेंस शामिल हों. उन्होंने इन्हीं तीन पिलर पर काम कर लोकल लीडरशिप को उभारने के बारे में योजना तैयार की.


हालांकि, इस काम को पूरा काम करने के लिए उन्हें एक संस्था बनानी थी. उसके लिए पैसे की आवश्यकता थी. वह कोटड़ा के लोगों से यह कहकर निकले कि दो साल बाद मैं वापस आऊंगा. इसी दौरान उन्हें युगांडा में नौकरी का अवसर मिला.

युगांडा में नौकरी छोड़ वापस लौटे

कुमार बताते हैं कि गांधी फेलोशिप के फाउंडर आदित्य और डायरेक्टर विवेक ने मुझे युगांडा की ‘बिल्डिंग टुमॉरो’ संस्था के अधिकारी जॉर्ज से मिलाया. वह युगांडा में स्कूल बनाने का काम करते थे क्योंकि वहां अभी बड़े पैमाने पर स्कूल ही नहीं हैं. वह वहां भी गांधी फेलोशिप जैसा प्रोग्राम शुरू करना चाहते थे.


इसके बाद साल 2014 में कुमार वहां गए और वहां जाकर स्कूलों में पढ़ाई का स्तर बढ़ाने वाला प्रोग्राम लागू किया, फंड भी जुटाया और अपनी सैलरी भी खुद तय की. इस तरह युगांडा में उन्हें वही अनुभव मिला जिसकी उन्हें जरूरत थी. उन्हें किसी संस्था को शुरू करने, उसके लिए फंड जुटाने और उसे चलाने का फर्स्ट-हैंड अनुभव मिल गया. अपने इसी अनुभव का इस्तेमाल उन्हें क्षमतालय को शुरू करने में किया.

... फिर ऐसे हुई क्षमतालय की शुरुआत

वह यहीं से कहानी बदल गई. कुमार युगांडा से अपनी लाखों रुपये की नौकरी छोड़कर वापस वतन आ गए. साल 2016 में उन्होंने क्षमतालय शुरू कर दिया. इसमें उनके साथ उनके को-फाउंडर्स आलोकेश, पूजा, अंजनि और सौम्या थीं.  


क्षमतालय का मुख्य उद्देश्य हर बच्चे को एक मीनिंगफुल, करुणामय और रेलिवेंट शिक्षा मुहैया कराना है. इसके साथ ही वहां लोकल लीडरशिप खड़ा करने का भी उद्देश्य था.


कुमार बताते हैं कि पहले 18 महीने मैंने कोई सैलरी नहीं ली. हमने कोटड़ा के ही तीन स्कूलों के साथ इसकी शुरुआत की. वहां हम एक फेलो को लगाते हैं. फेलो वहां पहले क्लासरूम में बेहतर शिक्षा मुहैया कराने के बारे में बताता है. इसके बाद वह टीचर और फिर समुदाय के साथ जुड़कर इस दिशा में काम करता है.


Vivek Kumar

वह कहते हैं, टीचर को जहां बच्चों को बेहतर और उनके अनुरूप शिक्षा प्रदान करने के बारे में जानकारी दी जाती है तो वहीं, समुदाय के लोगों को बताया जाता है कि कैसे वह अपने बच्चों की शिक्षा पर ध्यान दें, स्कूल पर दबाव बनाएं और बच्चों की पढ़ाई के बार में टीचर से बात करें.


उन्होंने 90 मिनट तक बच्चों को सामाजिक विज्ञान, गणित और भाषा को मिलाकर इंटीग्रेटेड शिक्षा देने की शुरुआत की. यह शिक्षा हम उन्हें स्टोरीटेलिंग पेडोलॉजी या कहानी, स्पोर्ट्स या आर्ट्स के माध्यम से देनी शुरू की. इससे बच्चों का आउटकम और स्कूल से जुड़ाव बढ़ने लगा.

3 स्कूलों से 60 स्कूलों तक का सफर तय किया

कुमार ने कहा, हमने एक ब्लॉक के 3 स्कूलों से क्षमतालय की शुरुआत की थी. आज हम 7 ब्लॉक के 60 स्कूलों में काम कर रहे हैं. क्षमतालय दिल्ली, राजस्थान और बिहार में काम कर रहा है. दिल्ली में एक, राजस्थान में दो और बिहार में एक जिले में हम काम कर रहे हैं.

उन्होंने बताया कि क्षमतालय में 200 के करीब वालंटियर हैं. 25 फेलो सहित 80 लोग फुल टाइम या पार्ट टाइम सदस्य हैं, जिन्हें सैलरी मिलती है. उनकी 13 लोगों की कोर टीम है.

लर्निंग फेस्टिवल प्रोग्राम

गुणवत्तापूर्ण पढ़ाई नहीं होने के कारण बच्चे स्कूल ही नहीं आते थे. इसके लिए कुमार ने एक 10 दिन का लर्निंग फेस्टिवल प्रोग्राम शुरू किया. इसमें बच्चों को आर्ट एंड स्टोरीटेलिंग, म्यूजिक प्रोडक्शन, थिएटर, स्टिचिंग एंड इम्ब्रॉयडरी, इलेक्ट्रॉनिक्स एंड टिंकरिंग, रिसाइकलिंग और डांस जैसे लर्गिंग मीडिया को सिखाया जाता है.


Learning Festival

लर्निंग फेस्टिवल प्रोग्राम में बच्चे जो सीखते हैं, वे उसका प्रयोग करते हैं. एक छोटे मंच पर वे अपना डांस, गाना या अन्य हुनर दिखाते हैं.

कुमार बताते हैं कि एक छठी क्लास की छात्रा ने पूरे गांव के लिए सोलर सिस्टम बना दिया. लर्निंग फेस्टिवल के आखिरी दिन पूरा गांव, सरपंच, एसडीएम सभी देखने आ गए थे कि स्कूल में ऐसा भी हो सकता है. आज तक हम लोगों ने 300 से अधिक लर्निंग फेस्टिवल आय़ोजित किए हैं. इसमें 15 हजार से अधिक बच्चे जुड़े हैं.

फेलो की हायरिंग के लिए शुरू किया IDiscover फेलोशिप

कुमार ने क्षमतालय प्रोग्राम को लागू करने के लिए शुरु में गांव के सरपंच से मंजूरी लेनी शुरू की थी. अब इसका दायरा बड़ा होने के कारण वे सरकार के एमओयू साइन करते हैं और उसके बाद चुने हुए स्कूलों में इसे लागू करते हैं.


वहीं, पूरे प्रोग्राम को बड़े स्तर पर शुरू करने के लिए उन्होंने IDiscover नाम का फेलोशिप शुरू किया. यह एक दो साल की फेलोशिप स्थानीय युवाओं के लिए होती है. इसमें सबसे पहले वे फेलो के पर्सनल ट्रांसफॉर्मेशन पर काम करते हैं. एक फेलो को वे दो स्कूल देते हैं. वे वहां जाकर 3 से 5 तक के बच्चों को पढ़ाते हैं. वे टीचर के साथ भी जुड़ते हैं. अपने क्लासरूम में नवाचार को लागू करते हैं. इसके सात ही शाम को वे समुदाय से मिलकर उनकी भागीदारी को बढ़ाने का काम करते हैं.


इस तरह वहां काम करने वाले फेलो, फेलोशिप पूरा करने के बाद या तो वे वहां पर टीचर बन सकते हैं या फिर अपनी संस्था की शुरुआत कर सकते हैं. इससे एजुकेशन के सेक्टर में एक लोकल लीडरशिप बनता है जो कि लंबे समय में स्थानीय शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त करने में बहुत काम आएगा.

6 लाख रुपये की फंडिंग से की थी शुरुआत, आज 3.5 करोड़ रुपये का है बजट

विवेक कुमार ने बताया कि क्षमतालय की शुरुआत हमने 6 लाख रुपये की फंडिंग से की थी जो कि एजुकेट फॉर लाइफ ने दिया था. आज हमारा कुल बजट 3.5 करोड़ रुपये है. पिछले फाइनेंशियल ईयर में हमारा कुल बजट 2.3 करोड़ था. हमारा कंटेंट कुल 2 लाख बच्चों तक पहुंचा है. इसके साथ ही हम सीधे 10-15 हजार बच्चों के साथ फिजिकली जुड़कर काम करते हैं.


उन्होंने कहा कि हमारा उद्देश्य सरकारी स्कूल को 'स्कूल ऑफ एक्सीलेंस' बनाना है. इसके साथ ही लोकल लीडरशिप तैयार करना हमारा उद्देश्य है जो कि लंबे समय तक स्थानीय मुद्दों पर काम कर सके. हमारा लक्ष्य है कि अगले 8-10 साल में 4 जिलों में 100 स्कूल ऑफ एक्सीलेंस बनाएं.