खेत नहीं, कमरे में उगाई कश्मीरी केसर, भाई-बहन ने कमाए 17 लाख रुपये
पंजाब के लुधियाना में भाई-बहन आस्थिका और शंकर नारूला ने अपने पिता के साथ मिलकर कमरे के अंदर कश्मीरी केसर उगाने का अनोखा मॉडल बनाया. इस वेंचर ने पहले ही सीजन में 17 लाख रुपये का रेवेन्यू हासिल कर खेती में टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल की नई मिसाल पेश की.
कश्मीर से करीब 500 किलोमीटर दूर पंजाब के लुधियाना में एक ऐसा कमरा है, जहां मौसम कैलेंडर से नहीं, मशीनों से तय होता है. यहां न बर्फ पड़ती है, न ठंडी हवाएं चलती हैं, फिर भी हर साल कश्मीरी केसर (Kashmiri Kesar) के फूल खिलते हैं. पहली नजर में यह किसी वैज्ञानिक प्रयोग जैसा लगता है, लेकिन इसके पीछे एक परिवार का सपना, वर्षों की मेहनत और कुछ अलग करने का जुनून छिपा है.
आस्थिका नारूला (Asthika Narula) और उनके भाई शंकर नारूला (Shankar Narula) ने वह रास्ता चुना, जिसके बारे में बहुत कम लोग सोचते हैं. खेती से कोई पारिवारिक संबंध न होने के बावजूद उन्होंने अपने पिता विकास नारूला (Vikas Narula) के साथ मिलकर इनडोर केसर की खेती की दुनिया में कदम रखा.
कई सालों तक रिसर्च की, विशेषज्ञों से सीखा और फिर एक ऐसे मॉडल पर काम किया जिसने पारंपरिक खेती की परिभाषा को ही बदल दिया. आज उनका यह प्रयास न केवल लाखों रुपये का रेवेन्यू दे रहा है, बल्कि यह भी दिखा रहा है कि खेती का भविष्य टेक्नोलॉजी और इनोवेशन के साथ कितना अलग हो सकता है.
एक बैंकर की जिज्ञासा से शुरू हुई कहानी
इस कहानी की शुरुआत आस्थिका (25 वर्ष) और शंकर (23 वर्ष) से नहीं, बल्कि उनके पिता विकास नारूला से होती है. पेशे से बैंकर रहे विकास नारूला का खेती से कोई सीधा संबंध नहीं था. लेकिन उन्हें हमेशा नई चीजें सीखने और अलग प्रयोग करने का शौक था. कोविड-19 महामारी के दौरान जब अधिकांश लोग घरों में बंद थे, तब विकास नारूला दुनिया भर में हो रहे कृषि नवाचारों के बारे में पढ़ रहे थे.
इसी दौरान उनकी नजर इनडोर केसर की खेती पर पड़ी. उन्होंने ईरान और अमेरिका जैसे देशों में नियंत्रित वातावरण में केसर उत्पादन की तकनीकों के बारे में अध्ययन किया. उन्हें एहसास हुआ कि दुनिया भर में केसर की मांग तेजी से बढ़ रही है, जबकि उच्च गुणवत्ता वाले कश्मीरी केसर की उपलब्धता सीमित होती जा रही है.
यहीं से उनके मन में एक सवाल पैदा हुआ. यदि दूसरे देश कमरे के अंदर केसर उगा सकते हैं तो भारत में ऐसा क्यों नहीं हो सकता.
बच्चों ने भी छोड़ा पारंपरिक सोच का रास्ता
शुरुआत में आस्थिका और शंकर इस विचार को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं थे. आस्थिका राजनीतिक विज्ञान की छात्रा थीं, जबकि शंकर बैचलर ऑफ कंप्यूटर एप्लीकेशन की पढ़ाई कर रहे थे. दोनों की अपनी अलग करियर योजनाएं थीं.
लेकिन जैसे-जैसे उन्होंने बाजार और मांग का अध्ययन किया, उन्हें इस क्षेत्र की संभावनाएं समझ आने लगीं.
परिवार ने जल्दबाजी नहीं की. उन्होंने करीब पांच साल तक लगातार रिसर्च की. वैज्ञानिक शोध पत्र पढ़े. कृषि विशेषज्ञों से बातचीत की. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और अन्य संस्थानों की सामग्री का अध्ययन किया.
उन्होंने कश्मीर में एक महीने से अधिक समय बिताया ताकि पारंपरिक केसर खेती को करीब से समझ सकें. इस दौरान उन्होंने किसानों से बातचीत की और खेती की बारीकियां सीखीं.
परिवार ने अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक डॉ. घिलाविजादेह अर्दलान (Dr Ghilavizadeh Ardalan) से भी ऑनलाइन बातचीत की और तकनीकी मार्गदर्शन लिया. उनका मानना था कि वैज्ञानिक समझ के बिना इस क्षेत्र में सफलता संभव नहीं है.

क्यों चुनी केसर की खेती?
केसर को दुनिया का सबसे महंगा मसाला माना जाता है. इसे अक्सर "रेड गोल्ड" यानी लाल सोना कहा जाता है.
एक किलोग्राम केसर तैयार करने के लिए लगभग डेढ़ लाख फूलों की जरूरत पड़ती है. इसकी कीमत गुणवत्ता के आधार पर लाखों रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच सकती है.
कश्मीरी केसर अपनी गहरी रंगत, तेज खुशबू और औषधीय गुणों के कारण पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में कश्मीर में जलवायु परिवर्तन और अन्य चुनौतियों के कारण उत्पादन प्रभावित हुआ है.
यही कारण था कि बाजार में मांग और आपूर्ति के बीच बड़ा अंतर पैदा हो गया. नारूला परिवार ने इसी अवसर को पहचाना और केसर को अपना मुख्य उत्पाद बनाने का फैसला किया.
कमरे में बनाया कश्मीर जैसा मौसम
लुधियाना में बना उनका फार्म पारंपरिक खेत जैसा बिल्कुल नहीं दिखता. यह किसी आधुनिक प्रयोगशाला जैसा नजर आता है.
उन्होंने एयरोपोनिक तकनीक का उपयोग किया है. इस तकनीक में पौधे मिट्टी के बिना नियंत्रित वातावरण में उगाए जाते हैं.
कमरे के भीतर तापमान, नमी, कार्बन डाइऑक्साइड और प्रकाश को लगातार नियंत्रित किया जाता है. चिलर तापमान को स्थिर रखते हैं. विशेष ग्रो लाइट्स सूरज की रोशनी का काम करती हैं. सेंसर हर समय वातावरण पर नजर रखते हैं.
शंकर कहते हैं कि उनका लक्ष्य कमरे के अंदर कश्मीर जैसा वातावरण तैयार करना था. इसी वजह से केसर का प्राकृतिक विकास चक्र यहां भी सफलतापूर्वक दोहराया जा सका.
निवेश और शुरुआती चुनौतियां
इस पूरी परियोजना को खड़ा करने में परिवार ने लगभग 55 लाख रुपये का निवेश किया. इसमें कश्मीर से लाए गए कॉर्म्स यानी बीज, क्लाइमेट कंट्रोल सिस्टम, इन्फ्रास्ट्रक्चर और वर्टिकल फार्मिंग यूनिट्स शामिल थीं.
शुरुआती दिनों में उन्हें कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा. कश्मीर से लाए गए लगभग 20 प्रतिशत बीज गर्मी के कारण खराब हो गए. इसके बाद परिवार ने एंटीफंगल उपचार और संरक्षण के नए तरीके विकसित किए.
विकास नारूला बताते हैं कि पहले वर्ष में तकनीक को समझना, फूलों की देखभाल करना और पूरे सिस्टम को स्थिर रखना सबसे बड़ी चुनौती थी.
जब खिला पहला फूल
हर उद्यमी के जीवन में एक ऐसा पल आता है जब उसकी मेहनत का पहला परिणाम सामने आता है. नारूला परिवार के लिए वह पल तब आया जब उनके फार्म में पहली बार केसर का फूल खिला.
विकास नारूला आज भी उस दिन को याद करते हुए भावुक हो जाते हैं. उनके बेटे ने फोन करके पहली सफलता की खबर दी थी. फोन पर बेटे की खुशी और भावुकता साफ महसूस हो रही थी.
वह सिर्फ एक फूल नहीं था. वह वर्षों की मेहनत, रिसर्च और विश्वास का परिणाम था. उस एक फूल ने साबित कर दिया कि उनका सपना हकीकत बन चुका है.
पहले ही सीजन में 17 लाख की कमाई
साल 2024 से 2025 के पहले उत्पादन चक्र में Grow Grower ने लगभग 1.3 किलोग्राम केसर का उत्पादन किया. इससे कंपनी को करीब 17 लाख रुपये का रेवेन्यू प्राप्त हुआ. केसर को ऑस्ट्रेलिया और कनाडा जैसे देशों में भी निर्यात किया गया.
वर्तमान सीजन में कंपनी लगभग 500 ग्राम केसर बेच चुकी है और करीब 9 लाख रुपये की आय अर्जित कर चुकी है. कंपनी को उम्मीद है कि सीजन समाप्त होने तक यह आंकड़ा और बढ़ेगा.
दो सीजन में कुल मिलाकर उनका कारोबार लगभग 26 लाख रुपये का रेवेन्यू हासिल कर चुका है.
आज Grow Grower केवल एक फार्म तक सीमित नहीं है. कंपनी ने देशभर में लगभग 30 पार्टनर फार्म का नेटवर्क तैयार किया है. यह मॉडल किसानों को तकनीकी सहायता और मार्गदर्शन प्रदान करता है. उत्पादन का विस्तार भी इसी नेटवर्क के जरिए किया जा रहा है.
आस्थिका मार्केटिंग, निर्यात और डिजिटल रणनीति संभालती हैं. शंकर उत्पादन और तकनीकी संचालन की जिम्मेदारी निभाते हैं. वहीं विकास नारूला पूरे वेंचर के मार्गदर्शक की भूमिका में हैं.
खेती का भविष्य बदल सकती है टेक्नोलॉजी
विशेषज्ञ मानते हैं कि जलवायु परिवर्तन के कारण पारंपरिक खेती लगातार चुनौतियों का सामना कर रही है. ऐसे समय में नियंत्रित वातावरण वाली खेती कई फसलों के लिए नया विकल्प बनकर उभर रही है.
हाल के वर्षों में कई मीडिया रिपोर्ट्स में भी इनडोर केसर खेती को कृषि क्षेत्र की उभरती हुई संभावना बताया गया है. नियंत्रित वातावरण में उत्पादन होने से मौसम पर निर्भरता कम होती है और गुणवत्ता में स्थिरता बनी रहती है.
नारूला परिवार का सपना केवल अपना कारोबार बढ़ाना नहीं है. वे चाहते हैं कि भारत वैश्विक केसर उत्पादन में बड़ी भूमिका निभाए और किसानों के लिए आधुनिक तकनीक आधारित नए अवसर पैदा हों.
आस्थिका, शंकर और विकास नारूला की कहानी बताती है कि बड़े सपने देखने के लिए हमेशा बड़े संसाधनों की जरूरत नहीं होती. जरूरत होती है सीखने की इच्छा, धैर्य और लगातार मेहनत की.
जिस केसर को लोग केवल कश्मीर की घाटियों से जोड़कर देखते थे, आज वह पंजाब के एक कमरे में भी खिल रहा है.
यह कहानी केवल खेती की नहीं है. यह उस सोच की कहानी है जो सीमाओं को चुनौती देती है. यह उस परिवार की कहानी है जिसने यह साबित कर दिया कि अगर इरादे मजबूत हों तो खेतों के बिना भी खेती की जा सकती है और सपनों को हकीकत में बदला जा सकता है.





