पिछले दो वर्षों में सब्जियों पर मासिक घरेलू खर्च हुआ दोगुना

By Rajat Pandey
November 05, 2022, Updated on : Sat Nov 05 2022 09:53:46 GMT+0000
पिछले दो वर्षों में सब्जियों पर मासिक घरेलू खर्च हुआ दोगुना
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सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म लोकलसर्किल (LocalCircles) ने पूरे भारत के लोगों के बीच एक सर्वे करवाया है. सर्वे के दौरान भारत के 307 जिलों के लगभग 22,000 से अधिक घरेलू उपभोक्ताओं की प्रतिक्रियाएं दर्ज की गयी है.


लोकलसर्किल के सर्वे के आकड़े बताते हैं कि बड़ी संख्या में लोगों का कहना है कि पिछले दो वर्षों में सब्जियों पर मासिक घरेलू खर्च लगभग दोगुना हो गया है. सर्वेक्षण के अनुसार 76 प्रतिशत लोगों ने पिछले दो वर्षों में अपने मासिक सब्जी खरीदने के बजट में 25-100% के बीच वृद्धि देखी गयी है.


सर्वे खाने की लगातार बढती महंगाई दर की ओर इशारा कर रहा है, जिसके चलते लोगों का घरेलू बजट को खासा प्रभावित हुआ है. लोकलसर्किल के सर्वे के आकड़ों के अनुसार  लगभग 76 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वह 2020 की तुलना में सब्जियों पर 25 प्रतिशत या उससे अधिक पैसे खर्च कर रहे हैं और 76% लोगों में से 40% ने कहा कि सब्जियों पर उनका मासिक खर्च पिछले दो वर्षों में 50% से अधिक बढ़ गया है.


सर्वे रिपोर्ट ने चालू वित्तीय वर्ष के दौरान टमाटर, प्याज और आलू जैसी सब्जियों की कीमतों में वृद्धि के आकड़ों को भी शामिल करने की कोशिश की है. प्रतिक्रियाओं से पता चलता है कि सर्वे में शामिल 2 में से 1 परिवारों ने 2022 में टमाटर के लिए औसतन ₹50/किलोग्राम, प्याज के लिए ₹30/किलोग्राम और आलू के लिए ₹25/किलोग्राम से अधिक का खर्च किया है. सर्वे के दौरान जब लोगों से पुछा गया कि "आपके परिवार ने इस वर्ष टमाटर, प्याज और आलू पर औसतन कितना खर्च किया”, सर्वे में 27% लोगों ने कहा कि उन्होंने प्रति किलोग्राम टमाटर की खरीद पर ₹60,  प्रति किलोग्राम प्याज की खरीद पर ₹35 और प्रति किलोग्राम आलू की खरीद पर ₹30 खर्च किए. 23% लोगों का कहना है कि उन्होंने टमाटर के लिए ₹50-60, प्याज के लिए ₹30-35 और आलू के लिए ₹25-30 खर्च किए हैं. 7% ऐसे हैं, जिन्होंने कहा कि टमाटर की कीमत ₹40-50, प्याज के लिए ₹25-30 और आलू के लिए ₹20-25 के बीच थी.


लोकलसर्किल ने बुधवार को सर्वे  के निष्कर्षों को जारी करते हुए कहा कि “विस्तारित मानसून, पेस्ट की समस्या, जल भराव जैसे कारकों ने उत्पादन और उपलब्धता को प्रभावित किया है, यह नीति निर्माताओं द्वारा आगे के लिए सोचने का समय है क्योंकि मानसून के दौरान पैदावार में कमी और मूल्य वृद्धि की समस्या खासा अहम है. 2020 की तुलना में किसानों को अपनी पैदावार को मंडियों या अन्य बिक्री केन्द्रों तक पहुंचने के लिए अधिक खर्च करना पड़ रहा है.”

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