संस्करणों
दिलचस्प

किसान ही नहीं, कंपनियों को भी मक्के ने किया मालामाल

12th Feb 2019
Add to
Shares
427
Comments
Share This
Add to
Shares
427
Comments
Share

सांकेतिक तस्वीर

पूर्णिया (बिहार) के किसान घनश्याम शेड नेट लगवाकर मक्के की खेती से भारी कमाई कर रहे हैं। यूपी के एक किसान अश्वनी बेमौसम अपने खेत में आधा-आधा किलो का मक्का उगाकर दोगुने से भी ज्यादा दाम पर बेच रहे हैं। उधर, कई बड़ी कंपनियां मक्के की प्रोसेसिंग कर स्टार्च, कॉर्न फ्लोर, कॉर्न ऑयल, कॉर्न फ्लैक्स, पशुहार, बेबी कार्न आदि बेचकर दस गुना तक मुनाफा कमा रही हैं। 


आजकल खेती के तौर-तरीके बदलकर, किसान मेरठ के हों या पूर्णिया के, बाराबंकी के हों या हरियाणा के, उन्हीं पारंपरिक फसलों से दोगुना, तीन गुना मुनाफे कमा रहे हैं। अब देखिए न कि बिजनौर (उ.प्र.) से करीब आठ किमी दूर अपने लालपुर गांव में समरपाल सिंह अपने खेत के गन्ने से तैयार गुण एक अलग अंदाज में (पैकेट बंद बिस्किट की शेप में) बाजार में उतार रहे हैं, जिससे वह दिल्ली, मुंबई, लखनऊ, भोपाल, मेरठ, कानपुर जैसे शहरों को दोगुने दाम पर बेचते हुए भी आपूर्ती नहीं कर पा रहे हैं। उनका गुड़ चाहने वालों को उन्हे करीब एक महीना पहले ऑर्डर करना पड़ता है। 


इसी तरह बाराबंकी (उ.प्र.) के किसान अश्वनी वर्मा के मक्के की पूरे देश में दुंदभी बज रही है। उनके खेत में एक एक मक्का आधा-आधा किलो ग्राम का। पूर्णिया के गांव नोनियापट्टी के किसान घनश्याम शेड नेट लगवाकर मक्का और शिमला मिर्च की खेती कर रहे हैं। पहले वह एक नौकरी से महीने में पचास हजार भी नहीं कमा पाते थे, अब अपनी मात्र डेढ़ बीघा जमीन में मक्का और शिमला मिर्च से उन्हें हर महीने लाखों की कमाई हो रही है। घनश्याम दूसरे किसानों को उन्नत किस्म के मक्का बीज की पहचान का तरीका भी बताते हैं। खेती में वे ऐसे रम गए हैं कि मक्का सुखाने वाली मशीन भी लगा ली है। इसकी सुविधा अन्य किसानों को भी मिल रही है।  


बाजार में मक्का का सबसे ज्यादा इस्तेमाल पॉपकार्न में हो रहा है। इसके अलावा इसके आटे से विभिन्न प्रकार के उत्पाद मट्ठी, कुरकुरे, पापड़ आदि भी भारी मात्रा में बाजार में उतारे जा रहे हैं। मक्के के फैलते बाजार को इस रूप में भी देखा जा सकता है कि हमारे देश में टेक्सटाइल इंडस्ट्री स्टार्च के लिए मुख्य तौर पर मक्का पर ही निर्भर है। मक्के की प्रोसेसिंग कर स्टार्च, कॉर्न फ्लोर, कॉर्न ऑयल, कॉर्न फ्लैक्स, पशुहार, बेबी कार्न आदि उत्पाद बनाए जा रहे हैं। हमारे देश में आंध्रप्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र भी मक्का उत्पादन के प्रमुख राज्य हैं। मौजूदा समय में मक्के का लगभग 55 प्रतिशत उपयोग भोजन, 14 प्रतिशत पशुहार, 18 प्रतिशत मुर्गीदाना, 12 प्रतिशत स्टार्च और करीब डेढ़ प्रतिशत का उपयोग बीज के रूप में किया जा रहा है। 


इसके दाने में करीब 30 प्रतिशत तेल, 18 प्रतिशत प्रोटीन और बड़ी मात्रा में स्टार्च पाया जाता है। मक्का की प्रोसेसिंग कर जहां इसके विभिन्न प्रकार के स्नैक्स बनाए जा रहे हैं, वही अच्छी मात्रा में प्रोटीन होने के कारण इसके बिस्किट सहित अन्य बेकिंग उत्पाद भी बन रहे हैं। इसके अलावा रेडी टू ईट प्रोडक्ट के रूप में भी मक्का के विभिन्न उत्पाद इन दिनों प्रचलन में है। इस काम में देश-विदेश की कई बड़ी कंपनियां एक ब्रांड के रूप मक्के से दस गुना तक मुनाफे कमा रही हैं। 


बाराबंकी के गाँव गंगापुर के किसान अश्वनी वर्मा सीजन से हटकर मक्के की खेती कर रहे हैं। उन्होंने विनर कंपनी की 4226 किस्म के बीज से मक्के की बुआई की थी जिसमें करीब ढाई हजार रूपए प्रति बीघे की लागत आई। प्रति बीघा करीब 25 कुंतल मक्का हुआ। बाजार में इस समय मक्के की कीमत डेढ़ हजार रुपए प्रति कुंतल चल रही है। जाड़े के मौसम में उनके खेत में आधा-आधा किलो के मक्के ने उन्हें मालामाल कर दिया है। उनका कहना है कि वैसे तो मक्के की फसल जुलाई-अगस्त में होती है। उस समय बाजार में इस फसल की भरमार होती है, जिससे वाजिब दाम नहीं मिल पाता है। उन्होंने सीजन से हटकर मक्के की खेती की तो पिछले महीने जनवरी में फसल तैयार हो गई। उन्हें इस समय अपनी मक्के की फसल का दोगुना दाम मिल रहा है। उनके खेत में पैदा हुई मक्के की एक-एक बाल आधा-आधा किलो की हो गई। 


गौरतलब है कि खाने के अलावा आजकल मक्के का स्टार्च, अल्कोहल, एसिटिक व लेक्टिक एसिड, ग्लूकोज, रेयान, गोंद (लेई), चमड़े की पालिश, खाद्यान्न तेल (कार्न ऑइल), पेकिंग पदार्थ आदि में इस्तेमाल होने लगा है, जिससे हर समय इसकी बाजार में मांग रहती है। इसीलिए सीजन से हटकर जो उन्नत किसान मक्के की खेती कर ले रहे हैं, मालामाल हो जा रहे हैं। मक्के का उत्पादन वैसे तो कमोबेश देश के ज्यादातर राज्यों में हो रहा है लेकिन बिहार को मक्के का मक्का कहा जाता है। यहां के समस्तीपुर ज़िले में प्रति हेक्टेयर साढ़े सात से नौ सौ टन तक मक्के का उत्पादन हो रहा है। 


रबी वाले मक्के की फ़सल खरीफ मक्के की फ़सल से अधिक इसलिए होती है क्योंकि रबी वाले फल को कीट-पतंगों और बीमारी से कम ख़तरा होता है। बिहार में मानसून में आने वाली बाढ़ से जमा कीचड़ का भी फायदा रबी फ़सल को मिलता है लेकिन इस राज्य में मक्के के अधिक उत्पादन के और भी कई वजहें हैं। दुनिया में सबसे ज्यादा संयुक्त राज्य अमेरिका में मक्के की पूरे विश्व की कुल फसल का 35 प्रतिशत से अधिक उत्पादन होता है। 


यह भी पढ़ें: अपने खर्च पर पक्षियों का इलाज कर नई जिंदगी देने वाले दिल्ली के दो भाई

Add to
Shares
427
Comments
Share This
Add to
Shares
427
Comments
Share
Report an issue
Authors

Related Tags

Latest Stories

हमारे दैनिक समाचार पत्र के लिए साइन अप करें